पहाड़ और पीड़ा: देखभाल की उम्र में ‘खाली’ आशियानों की पहरेदारी कर रहीं ये बूढ़ी आंखें

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रैना पालीवाल, अमर उजाला, रतूड़ा (कर्णप्रयाग)
Updated Mon, 02 Dec 2019 03:00 AM IST

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  • कर्णप्रयाग के 250-300 परिवारों वाले गांव रतूड़ा में आज सिर्फ 90 लोग 

देखभाल की उम्र में खुद पहरेदार बने हैं। जवानी घरों पर ताले डालकर चली गई, गांव बूढ़ों के हवाले रह गया। 250-300 परिवारों में से सिर्फ90 लोग रह गए। सभी  बुजुर्ग हैं। ये वे लोग हैं जो मैदानी इलाकों की प्रदूषित हवा-पानी में सांस नहीं ले पाते, इसलिए बच्चों के बिना अपने गांव में पड़े हैं। कर्णप्रयाग के रतूड़ा गांव की भयावह स्थिति है। बुजुर्ग बीमार हो जाएं तो राम ही उन्हें बचाए। कोई इमरजेंसी आ जाए तो डंडी के सहारे ले जाना पड़ता है।

वहां गाड़ी का इंतजार करना पड़ता है। घरों में अकेले रह रहीं बुजुर्ग महिलाएं खुद घास लाने को मजबूर हैं। कुछ दिन पहले एक वृद्धा घास लेने गई। वही पोखर में गिर गईं। कंधे पर बोझा था। कई घंटे बाद उन पर किसी की नजर पड़ी। तब तक उनकी मृत्यु हो चुकी थी। रतूड़ा और इस जैसे गांवों में रह रहे बुजुर्गों की यही पुकार है, जो बचे हैं, उन्हें तो बचा लो।

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सभी मूलभूत सुविधाओं से कटा हुआ गांव है रतूड़ा। कर्णप्रयाग से करीब 18 किमी दूर इस गांव में पानी भी इसी साल आया है। सिलेंडर भी रोड हेड तक ही आता है। वहां से बुजुर्ग नेपाली लोगों को पैसे देकर सिलेंडर घर पर मंगाते हैं। राशन या अन्य चीजों के लिए भी वे उन्हीं पर आश्रित हैं। बीमारी-तकलीफ  में भी उन्हें इलाज नहीं मिल पाता। बिस्तर में पड़े-पड़े कुछ चमत्कार होने की उम्मीद करते हैं। आधे से ज्यादा लोग बीमार हैं। 

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यहां बस हवा-पानी है और कोई सुविधा नहीं

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