केजरीवाल बदल गए या उनकी सियासत का अंदाज? नहीं कर रहे एलजी या पीएम मोदी की बुराई, गा रहे सिर्फ आप सरकार के तराने

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अरविंद केजरीवाल जहां दिल्ली के अलावा अन्य राज्यों में अपना जनाधार बढ़ाने के बारे में सोच रहे थे, अब उन्हें दिल्ली में भी हार का डर सता रहा है।

दिल्ली के CM अरविंद केजरीवाल। (फाइल फोटोः पीटीआई)

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल केन्द्र की भाजपा सरकार के खिलाफ काफी मुखर रहे हैं। वह कई बार भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साध चुके हैं। लेकिन गौर करने वाली बात है कि बीते कुछ समय से वह विरोधियों पर निशाना साधने के बजाय सिर्फ जनकल्याण के कामों पर फोकस कर रहे हैं। इतना ही नहीं वह विरोधी पार्टियों के बारे में नकारात्मक बातें नहीं कर रहे हैं और सिर्फ आम आदमी पार्टी के अच्छे कामों को गिनाने में लगे हैं। राजनैतिक जानकार इसे अरविंद केजरीवाल की सियासत के अंदाज में आए बदलाव के तौर पर देख रहे हैं।

केन्द्र सरकार के साथ अपना रहे सहयोगात्मक रवैया: आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल पहले केन्द्र की बीजेपी सरकार से विभिन्न मुद्दों पर उलझते रहे हैं। यहां तक कि एक बार तो केजरीवाल ने पीएम मोदी को ‘कायर और मानसिक रोगी’ भी बता दिया था। इसके अलावा वह यदा-कदा एलजी अनिल बैजल के साथ भी बयानबाजी में उलझते नजर आते और एलजी और केन्द्र की भाजपा सरकार पर हमलावर रहे हैं। लेकिन बीते कुछ समय से उन्होंने विरोधी पार्टियों के खिलाफ कोई नकारात्मक बयानबाजी नहीं की है और सिर्फ अपनी सरकार के सकारात्मक कामों पर बात कर रहे हैं।

अक्टूबर माह में जब केन्द्र सरकार ने दिल्ली की कई अनियमित कॉलोनियों को नियमित करने का प्रस्ताव पास किया था, उस वक्त भी केजरीवाल ने केन्द्र सरकार को इसके लिए धन्यवाद कहा था। हाल ही में प्रदूषण के मामले में भी उन्होंने कहा था कि केन्द्र और दिल्ली की विभिन्न एजेंसियां प्रदूषण को कम करने के लिए मिलकर काम कर रही हैं। साथ ही दिल्ली में दिपावली के मौके पर कनॉट प्लेस में हुई लेजर दिवाली के आयोजन के लिए भी एलजी अनिल बैजल को धन्यवाद दिया था।

दिल्ली की राजनीति पर फोकसः अरविंद केजरीवाल, भारतीय राजनीति में जिस तरह से उभरे थे, उससे वह राजनीति के राष्ट्रीय परिदृश्य में आ गए थे। इसके बाद दिल्ली में सरकार बनाने के बाद आम आदमी पार्टी ने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली के बाहर कुछ अन्य राज्यों में भी अपनी पकड़ बनाने की कोशिश की, लेकिन उसमें उन्हें खास सफलता नहीं मिली और अधिकतर चुनावों में आम आदमी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही अरविंद केजरीवाल कुछ समय पहले तक केन्द्र सरकार के विरोधी माने जाने वाले नेताओं के साथ मंच साझा करते नजर आते थे। लेकिन अब उनका फोकस सिर्फ दिल्ली के चुनावों पर है और यही वजह है कि वह विरोधी पार्टियों के खिलाफ बयानबाजी नहीं कर रहे हैं और राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर भी बड़ी सावधानी से बयान दे रहे हैं।

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आक्रामक राजनीति का हुआ नुकसानः द प्रिंट की एक खबर के अनुसार, थिंक टैंक सेंटर के फेलो राहुल वर्मा के अनुसार, कई क्षेत्रीय नेताओं को इस बात का अहसास हो चुका है कि चुनावों के दौरान सकारात्मक प्रचार और अपनी सरकार की उपलब्धियों के बारे में बात करने का फायदा मिलता है। जैसा कि महाराष्ट्र में शरद पवार को मिला। वर्मा के अनुसार, पीएम मोदी आज देश में सबसे लोकप्रिय नेता हैं। ऐसे में उनके खिलाफ आक्रामक रहने वाले नेताओं को चुनावों में इसका खामियाजा उठाना पड़ता है। अरविंद केजरीवाल जहां दिल्ली के अलावा अन्य राज्यों में अपना जनाधार बढ़ाने के बारे में सोच रहे थे, अब उन्हें दिल्ली में भी हार का डर सता रहा है। ऐसा लग रहा है कि अरविंद केजरीवाल को भी इसका अहसास हो गया है और उन्होंने सिर्फ अपनी सरकार की उपलब्धियों के बारे में ही बात करना शुरु कर दिया है।

वोटबैंक की राजनीति में हुए माहिरः हालिया लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन काफी खराब रहा था। इसके बाद ही अरविंद केजरीवाल के स्टैंड में बदलाव देखा जा रहा है। जानकार बता रहे हैं कि बीते पांच साल का कार्यकाल अरविंद केजरीवाल के लिए सीखने का समय रहा है और केजरीवाल भी अब वोटबैंक की राजनीति के माहिर खिलाड़ी होते जा रहे हैं। जिस आक्रामक तरीके से वह अपनी सरकार की उपलब्धियों को प्रचारित कर रहे हैं, यह दिखाता है कि वह भी राजनीति के प्रचलित तरीकों को सीख चुके हैं।

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