दुनिया मेरे आगे: रिवायत से आगे

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विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन भी वैश्विक स्तर पर हिंदी को बचाने की अगली कड़ी है।

सांकेतिक तस्वीर।

अनीता यादव

उस दिन महाविद्यालय में प्रवेश प्रक्रिया के बाद नए सत्र की शुरुआत थी। कक्षा ‘हिंदी विशेष’ के विद्यार्थियों की थी। कक्षा के दौरान एक दूसरे से परिचय का दौर चल रहा था। विद्यार्थी परिचय के रूप में अपना नाम, रुचियां, जन्म स्थान, जीवन में क्या बनना चाहते हैं और ‘हिंदी विशेष’ में ही प्रवेश क्यों लिया जैसी बातों के बारे में जानकारियां कक्षा में साझा कर रहे थे। हैरानी की बात यह थी कि विद्यार्थी ‘हिंदी विशेष’ के थे, इसके बावजूद अधिकतर ने परिचय देने के लिए अंग्रेजी भाषा को चुना। मैं सबको बड़े ध्यान से सुन और उनके हाव-भाव परख रही थी। जो विद्यार्थी हिंदी में बोल रहे थे, उनमें अंग्रेजी भाषा में परिचय देने वालों के मुकाबले एक हिचक थी। अनजाना-सा भय व्याप्त था आवाज में। जबकि अंग्रेजी में परिचय देने वाले विद्यार्थी भले ही गलत अंग्रेजी इस्तेमाल कर रहे थे, लेकिन आत्मविश्वास से लबरेज थे।

कुछ विद्यार्थी हिंदी मिश्रित अंग्रेजी यानी ‘हिंग्लिश’ का इस्तेमाल कर रहे थे। जबकि मैं उनसे हिंदी में बातचीत कर उनके हिंदी ज्ञान को परखना चाहती थी। साठ बच्चों की कक्षा में एकाध विद्यार्थी ही हिंदी में परिचय देने वाला निकला। मैं सोचने पर मजबूर थी कि हिंदी भाषा के प्रति यह हीन भाव आखिर कहां से आया उनमें? जवाब कठिन नहीं था! हिंदी भाषी समाज में हिंदी को लेकर जो नकारात्मक भाव व्याप्त है, उसी भाव से ग्रस्त वे विद्यार्थी भी थे। दरअसल, हमने अंग्रेजी को भाषा न मान कर उसे बुद्धिमता का पैमाना मान लिया है! आप हिंदी समेत कितनी ही भारतीय भाषाओं के ज्ञाता हो और आपने इन भाषाओं में कितना ही गूढ़ ज्ञान अर्जित किया हो, लेकिन अगर आपको अंग्रेजी नहीं आती तो आपका यह सब ज्ञान बेमानी है। यही ज्ञान अगर अंग्रेजी में प्राप्त किया है तो ऐसा व्यक्ति ही वास्तविक ‘इंटेलिजेंट’ यानी अपार बुद्धिमान है। यही सोच भारतीय परिवेश में पुख्ता है।

मेरा उद्देश्य यहां किसी भाषा विशेष को कमतर करके आंकना कतई नहीं है। मैं केवल इस ओर इंगित करना चाहती हूं कि हिंदी भाषा को लेकर हमारी सोच, हमारे मानस में इतना संकुचन और कुंठा क्यों है! अन्य देशों की ओर नजर डालें, फिर वह चीन हो, जापान, पाकिस्तान या फ्रांस, इटली या फिर जर्मनी जैसे यूरोपीय देश। पाएंगे कि भाषा को लेकर इन देशों में कोई द्वंद्व नहीं है। इन देशों के लोग भारतीयों की तरह अपनी भाषा का प्रयोग करते हुए हीनता का भाव नहीं महसूस करते। जबकि हम अंग्रेजी शासन से भले स्वतंत्र हो गए हों, लेकिन अंग्रेजी भाषा की मानसिक गुलामी का दौर अभी जारी है।

माना कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है और इसके ज्ञान से हम वैश्विक स्तर पर व्यावसायिक और आर्थिक मजबूती की राह पर आसानी से अग्रसर हो सकते हैं! लेकिन अपनी भाषा के प्रति दोयम दर्जे का व्यवहार निंदनीय है। हिंदी को संविधान में सन 1950 में राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ। तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए अंग्रेजी को सह-राजभाषा के रूप में मात्र पंद्रह वर्ष के लिए बनाया गया था। लेकिन विडंबना ही है कि आज भी अंग्रेजी को हम सह राजभाषा के पद से विरत नहीं कर पाए! क्यों नहीं कर पाए? जवाब ढूंढना होगा!

आज हिंदी न केवल राजनीति का शिकार है, बल्कि अपने अस्तित्व की लड़ाई भी लड़ रही है। ‘हिंदी दिवस’, ‘हिंदी पखवाड़ा’ या ‘हिंदी सप्ताह’ मनाना इसी अस्तित्व की लड़ाई के विभिन्न चरण हैं। साल भर में केवल सितंबर माह में हिंदी मानो जीवित हो उठती है। हिंदी दिवस को उत्सव का तरह मनाने के लिए सरकारी, अर्द्ध-सरकारी, गैर-सरकारी- सभी संस्थान अलग से बजट रखते हैं। अंग्रेजीदां बुद्धिजीवी हिंदी दिवस पर हिंदी में भाषण झाड़ कर हिंदी पर उपकार-सा करते हैं। इन दिनों सरकारी कार्यालयों समेत बैंकों तक में ‘हिंदी भाषा का प्रयोग करें’ की सीख देती पट्टी खिड़की पर सज जाती है।

विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन भी वैश्विक स्तर पर हिंदी को बचाने की अगली कड़ी है। यानी हिंदी दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा या फिर विश्व हिंदी सम्मेलन मात्र औपचारिकता भर हैं। क्या हम नहीं जानते कि किसी भी भाषा का विकास या उसकी अभिवृद्धि उसके व्यावहारिक प्रयोग से ही संभव है? एक दिन या एक सप्ताह या महीना भर कार्यक्रम के रूप में भाषणबाजी से भाषा का अस्तित्व नहीं बच सकता। उदाहरण के तौर पर हमारे सामने हिंदी साहित्य के इतिहास में ब्रज और अवधी हैं जो भक्ति काल में पठन-पाठन और साहित्य लेखन के कारण भाषा थीं।

लेकिन बाद में धीरे-धीरे साहित्य लिखा जाना कम हुआ और वे भाषाएं बोली के रूप में सिमट कर रह गईं। इसके विपरीत खड़ी बोली का विकसित रूप हिंदी वर्तमान में हमारे सामने है। यानी एक ‘भाषा’ सीमित व्यावहारिक प्रयोग के कारण ‘बोली’ बन उठती है और विस्तृत प्रयोग से ‘बोली’ भाषा बन जाती है। हिंदी भाषा ‘बोली’ न बन जाए, इसके लिए हिंदी का अधिकाधिक व्यावहारिक प्रयोग आवश्यक है, न कि औपचारिकता के रूप में दिवस मानना या भारी-भरकम बजट के सम्मेलन करना!

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