कविता: आए कबूतर

digamberbisht

फिर आते हैं उड़ जाते… फिर आते हैं दौड़ लगाते… रुकते हैं फिर हैं सुस्ताते… आए कई कबूतर आए।

प्रयाग शुक्ल

उड़ उड़ इधर कबूतर आए
दो ठो घर के भीतर आए
कुछ बाहर कुछ छत पर आए
आए कई कबूतर आए।

पानी पीते चुगते दाने
आए अपनी दौड़ दिखाने
धीरे चल कर कुछ सुस्ताते
बैठे बैठे ही सो जाते
उड़ कर आए पंख खोल कर
जाने क्या कुछ बोल बोल कर
उड़ जाते हैं फिर आते हैं
फिर आते हैं उड़ जाते
फिर आते हैं दौड़ लगाते
रुकते हैं फिर हैं सुस्ताते
आए कई कबूतर आए
दो ठो घर के भीतर आए।

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