रोज दो घंटे स्मार्टफोन चलाकर अकड़ रही बच्चों की पीठ

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एम्स रूमेटोलॉजी विभाग की मुखिया डॉ उमा कुमार ने बताया कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 1600 बच्चों पर पिछले साल अप्रैल से लेकर इस साल मार्च के बीच अध्ययन किया गया।

खास कर लड़कियों में इस बीमारी का खतरा अधिक है।

बच्चों में स्कूल बैग के बोझ, स्मार्ट फोन के उपयोग, टीवी व कंप्यूटर के आगे बैठे रहने की आदत और शारीरिक गतिविधियों की कमी से पीठ दर्द व मांसपेशियों में जकड़न की समस्या बढ़ रही है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों के बच्चों पर एम्स रूमेटोलॉजी विभाग की ओर से किए अध्ययन से खुलासा हुआ है कि 63 फीसद बच्चों में पीठ की मांसपेशियों व हड्डी में दर्द की समस्या पिछले एक साल से अभी तक है।

1600 बच्चों पर किए अध्ययन में पाया गया कि हफ्ते में पांच दिन और हर दिन दो घंटे स्मार्ट फोन चलाने वाले व रोजाना 60 मिनट से कम शारीरिक गतिविधि वाले बच्चों में खास कर लड़कियों में इस बीमारी का खतरा अधिक है। डॉ कुमार ने बस्तों का बोझ कम करने व शारीरिक गतिविधियां बढ़ाने के साथ खानपान में सुधार व फोन या टीवी का उपयोग कम करने की सिफारिश की है।

एम्स रूमेटोलॉजी विभाग की मुखिया डॉ उमा कुमार ने बताया कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 1600 बच्चों पर पिछले साल अप्रैल से लेकर इस साल मार्च के बीच अध्ययन किया गया। 10 से 19 साल के बच्चों पर किए इस अध्ययन में 53 फीसद लड़के व 47 फीसद लड़कियां थीं। दक्षिणी दिल्ली के 100 स्कूलों में से केवल 10 स्कूल ही अध्ययन में शामिल होने के लिए तैयार हुए। इन बच्चों में से 63 फीसद बच्चों ने बताया कि उनको पिछले एक साल से हफ्ते में सातों दिन मासपेशियों व हड्डी में दर्द की समस्या बनी हुई है। उनमें से 32 फीसद बच्चों में दर्द पीठ के निचले हिस्से में रहता है। डॉ कुमार ने बताया कि यह देखा गया कि जिन बच्चों ने हफ्ते में पांच दिन और हर दिन दो घंटे या उससे अधिक समय फोन पर बिताया उनमें इस बीमारी का खतरा अधिक रहा। या फिर जिन बच्चों की रोजाना की शारीरिक गतिविधि एक घंटे से कम है अथवा वे टीवी देखते बैठे रहते हैं उनमें भी इस तरह की दिक्कत अधिक है।

डॉ कुमार ने बताया कि पीठ दर्द की यह समस्या या हड्डी व मांसपेशियों में सूजन लंबे समय तक बनी रहे तो उसके गठिया के रूप में बदलने का खतरा रहता है। उन्होंने कहा कि बच्चों में तनाव, घबराहट व अवसाद का भी हड्डी व मांसपेशियों के दर्द से कोई न कोई संबंध भी है। डॉ उमा ने बताया कि बस्ते के बोझ से भी इस बीमारी का सीधा व गहरा संबंध देखा गया। डॉ कुमार के मुताबिक, बच्चे के शारीरिक वजन के 10 फीसद से कम वजन का बैग उठाने वाले बच्चों की तुलना में ऐसे बच्चों में पीठ दर्द की समस्या दो गुना अधिक थी जिनके बस्ते का बोझ दस फीसद अधिक था। जिन बच्चों में खानपान ठीक रहा उनकी तुलना में खराब खानपान वाले बच्चों में भी इस बीमारी की समस्या अधिक रही।

बस्तों के वजन के निर्देशों का पालन हो
डॉ कुमार ने कहा कि बस्ते के बोझ से होने वाली दिक्कतों क ो देखते हुए केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के उस निर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाना अनिवार्य हो, जिसमें बच्चों का बोझ कम करने की बात कही गई है। मंत्रालय ने कहा था कि कक्षा एक और दो के बच्चों के बस्ते का वजन डेढ़ किलो, कक्षा तीन से पांचवें दर्जे तक के बस्ते का वजन तीन किलों, कक्षा छह और सतवीं के बच्चों के बस्ते चार किलो से अधिक वजनी नहीं होने चाहिए। इसी तरह कक्षा आठ-नौ के बच्चों के बैग साढेÞ चार किलो और दसवीं के बच्चों के बैग पांच किलो से अधिक बिल्कुल नहीं होने चाहिए।

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