नए लिफाफे में पुरानी घोषणाएं

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उत्तरी पूर्वी दिल्ली से दूसरी बार सांसद और भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी। भोजपुरी गायक और अभिनेता के रूप में जाना-पहचाना नाम हैं। जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में कबीर चौरा में एक फरवरी, 1971 को हुआ। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से शारीरिक शिक्षा में परास्नातक करने वाले मनोज तिवारी ने कांग्रेस की दिवंगत नेता और दिल्ली की तीन बार की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को हराकर 2019 के लोकसभा चुनाव में अपना परचम लहराया। मौजूदा दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार को लेकर हमलावर हैं और विभिन्न मंचों पर भाजपा के दमदार चेहरे के रूप में सक्रिय हैं।

भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी

दिल्ली भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी का कहना है कि सरकारें पांच साल के लिए बनती हैं, पांच महीने के लिए नहीं। आम आदमी पार्टी की सरकार ने पूरे कार्यकाल में कुछ नहीं किया और अब चुनाव नजदीक देख जनता को गुमराह करने वाले वादों का पिटारा लेकर आ गई है। उन्होंने कहा कि जो सरकार पहले अपनी सारी नाकामियों का ठीकरा केंद्र पर फोड़ कर काम न करने देने का आरोप लगाती थी, अब उन्हें काम कौन करने दे रहा है? उन्होंने दावा किया कि जनता हमें पांच साल के लिए चुने, हम तीन साल में दिल्ली की सूरत बदल देंगे। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र : दिल्ली विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। अगर जनता ने भाजपा को जीत दिलाई तो क्या दिल्ली की कमान किसी पूर्वांचल के चेहरे को मिल सकती है?
मनोज तिवारी : एक तो अच्छी बात यह हुई है कि हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जी और प्रधानमंत्री मोदी जी और दिल्ली के हमारे वरिष्ठ नेताओं ने माना कि हमें पूर्वांचल को एक मौका देना चाहिए। इसलिए मुझे मौका मिला। मुझे जो जिम्मेदारी सौंपी गई, उसे मैंने पूरा करने का भी प्रयास किया। सब कहते थे कि हम नगर निगम हार जाएंगे, पर हमने ऐतिहासिक जीत हासिल की। लोकसभा के चुनाव में हमने पिछली बार की तुलना में काफी अंतर से विजय हासिल की। अब निश्चित रूप से पूर्वांचल के लोगों को जो सम्मान भाजपा ने दिया है, उसका प्रतिफल तो उसे मिलेगा। दिल्ली इस नेतृत्व को बहुत प्यार देती है। इसलिए हमने दिल्ली को सजाने की एक योजना बनाई है। उसमें ‘यमुनोसा’ भी है, जिसे हमने सिंगापुर के सिंटोसा से लिया है। हमें पूरा विश्वास है कि दो-ढाई साल में दिल्ली को ऐसा रूप दे दें, जो विश्वस्तरीय हो। इलेक्ट्रॉनिक बसें चलेंगी, लोगों को सुरक्षित रखने के लिए एनआरसी लागू होना बहुत जरूरी है।

पंकज रोहिला : इस समय प्रदूषण एक बड़ा मुद्दा है। अभी दिल्ली की सरकार ने दावा किया है कि वह प्रदूषण के स्तर में काफी कमी लाने में कामयाब हुई है। इसके साथ ही उन्होंने सतर्क भी कर दिया है कि पराली का धुआं आने वाला है। इसे आप किस तरह देखते हैं?
’प्रदूषण कोई नया मुद्दा नहीं है। यह हर साल अक्तूबर-नवंबर में आता है। पराली की बात भी हर साल आती है। फिर वे किसकी आंख में धूल झोंकने का प्रयास कर रहे हैं? सवाल है कि प्रदूषण से तो दिल्ली जूझ रही है, पर अरविंद केजरीवाल सरकार ने क्या किया? प्रदूषण को कम करने के लिए यातायात की सघनता को कम करना चाहिए। इसके लिए हम मेट्रो के चौथे चरण को जल्दी से जल्दी पूरा करना चाहते हैं, मगर अरविंद केजरीवाल ने जानबूझ कर इसे रोका। इसके चलते मेट्रो का बीस हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। जितने पैसे में पहले छह योजनाएं पूरी होनी थीं, अब उतने में तीन हो पा रही हैं। ऐसे में केंद्र सरकार को आखिरकार इनको किनारे करते हुए इसे खुद पूरा करने का निर्णय किया। बवाना की मेट्रो को जानबूझ कर इन्होंने रोका। दिल्ली में ग्रीन टैक्स के जो अठारह सौ रुपए इकट्ठा हुए, उसमें से एक पैसा दिल्ली में खर्च नहीं हुआ। इसके अलावा, जब पेरीफेरी रोड बनाने की बात आई, तो केंद्र ने तो अपने हिस्से का पैसा भुगतान कर दिया पर दिल्ली सरकार ने उसका चार सौ चौरासी करोड़ रुपए अब तक नहीं दिया। इसी तरह बवाना-नरेला यूवीआर सड़क के निर्माण में इन्होंने अड़ंगा डाला। सीलमपुर रोड बनाने के लिए हमें आमरण अनशन पर बैठना पड़ा। सो, सवाल है कि किस तरह अरविंद केजरीवाल प्रदूषण कम करना चाहते हैं! आप पराली को दोष दे रहे हैं। हरियाणा सरकार ने पराली खरीदनी शुरू कर दी है, उससे बिजली बनती है। अगर दिल्ली सरकार भी अपने विज्ञापन का दस फीसद पैसा भी पराली खरीदने में लगाती, तो यह समस्या नहीं पैदा होती।

अजय पांडेय : केजरीवाल सरकार ने पिछले दिनों जो कुछ फैसले किए, कुछ हद तक मुफ्त बिजली, महिलाओं की मुफ्त बस यात्रा आदि, वे आपके लिए कितने चुनौतीपूर्ण हैं?
’ये फैसले हमारे लिए बहुत फायदेमंद हैं। अरविंद केजरीवाल की नकारात्मक सोच को जनता में बताने के लिए, उन्होंने जो लालचपूर्ण काम किए हैं, उनके बारे में बताने के लिए कि इन्हें काम करने का मौका था, पर इन्होंने किया नहीं। साढ़े चार साल इन्होंने कुछ नहीं किया। जो कर सकते थे, वह भी नहीं किया, क्योंकि सिर्फ मोदी जी को दोष देना है, तो अब पांच महीने में क्या कर पाएंगे? यही केजरीवाल हैं, जो साढ़े चार साल तक यह कहते रहे कि मोदी जी कुछ करने नहीं दे रहे। फिर अब कैसे कर रहे हैं, अब भी तो मोदी जी की सरकार है? इसका मतलब है कि इनकी काम करने की नीयत नहीं थी। जब हम यह बात लोगों को समझाते हैं, तो लोग ताली बजाते हैं कि हां, बात तो सही है। सरकार पांच साल की होती है, पांच महीने की नहीं। इसलिए उन्होंने जो इधर अपना बहुरूपियापन दिखाते हुए कुछ फैसले किए हैं, वह हमें बताने में मदद करेगा कि केजरीवाल जनता के हितैषी नहीं हैं, सिर्फ भ्रम, साजिश और काम रोक कर राजनीति चमकाने के पक्षधर हैं।

मुकेश भारद्वाज : अभी अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि लोग पांच सौ रुपए का टिकट खरीद कर दिल्ली आते हैं और पांच लाख रुपए का मुफ्त इलाज करवा कर चले जाते हैं। तो क्या इसे दिल्ली सरकार के खजाने पर बोझ की तरह देखा जा रहा है?
’बोझ तो तब देखा जाता है न, जब आपका पैसा कम पड़ जाए! पिछले चार सालों में नौ सौ से तेरह सौ करोड़ रुपए हर साल बिना खर्च किए वापस हुआ है दिल्ली सरकार का। फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि हम पर बोझ पड़ रहा है! यह जो नफरत की भाषा उन्होंने बोली, उसका लोगों पर बुरा असर पड़ा है। एक मुख्यमंत्री के स्तर से जब ऐसी बातें कही जाती हैं, तो उससे गलत संदेश जाता है। यहां देश के सारे बड़े अस्पताल हैं, तो लोग तो आएंगे ही। अस्पताल वालों को इससे कोई परेशानी नहीं है, वे तो पैसा लेकर ही इलाज करते हैं। मगर उस मुख्यमंत्री ने एतराज जताया, जिसने आयुष्मान योजना अब तक लागू नहीं की है।

निर्भय पांडेय : दिल्ली सरकार ने खेल विश्वविद्यालय खोलने की बात कही है। कहीं यह भी चुनावी मसला भर तो नहीं है?
’यह तो विचित्र बात है! साहिब सिंह वर्मा के समय में इस विश्वविद्यालय का शिलान्यास हुआ था। इसकी सारी प्रक्रिया उसी समय पूरी हो गई थी। मगर इतने समय तक कांग्रेस दबाए रही, ये लोग भी दबाए रहे। मगर चुनाव आया, तो इन्हें होश आया। या तो इनकी पूरी मशीनरी फेल है कि कहां, क्या योजना बनी हुई है या तो इन्हें पता था, ये करना चाहते थे और अब सिर्फ चुनावी मुद्दा बनाने के लिए इसे उठा लिया है। मुझे आश्चर्य है कि जितने स्कूल और कॉलेज बने हुए हैं सब भाजपा के समय के हैं, जितनी कॉलोनियां अधिकृत करने की बात है, वे सब मदनलाल खुराना के समय की हैं, मगर उन सबका श्रेय कांग्रेस और केजरीवाल सरकार ले रही हैं। एक भी ऐसा काम नहीं है, जिसे केजरीवाल सरकार ने शुरू किया और पूरा किया हो। सिग्नेचर ब्रिज पर क्या-क्या लफड़े हुए, सबको पता है। दुख है कि दिल्ली में आज भी लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं, यहां बसों की संख्या मात्र अट्ठाईस सौ रह गई है। आठ हजार तो केजरीवाल जी के समय में थी। दिल्ली के अस्पतालों की हालत दयनीय है। कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां केजरीवाल सरकार की उपलब्धियां गिनाई जा सकें।

अजय पांडेय : केजरीवाल ने तो यहां तक कहा कि अगर एनआरसी लागू होगा, तो मनोज तिवारी को भी दिल्ली छोड़ कर जाना पड़ सकता है।
’अब इसे मैं उनकी नासमझी कहूं या फिर परप्रांतीयों से उनकी नफरत कहूं! क्या एनआरसी का मतलब अपने देश के लोगों को हटाना है! इसके तहत बाहरी देशों से आए अवैध घुसपैठियों को हटाना है। हम तो अब जान चुके हैं कि केजरीवालजी के मन में नफरत है। यह नफरत देश की प्रगति के प्रति भी है।

गजेंद्र सिंह : क्या आप केजरीवाल सरकार द्वारा जनता को मुफ्त सुविधाएं देने की योजनाओं का विरोध करते हैं? अगर करते हैं, तो क्यों?
’हमने विरोध नहीं किया। हम उसका समर्थन कर रहे हैं। मगर हम तो कहते हैं कि पांच महीना क्यों, पांच साल क्यों नहीं? इनका नारा तो पांच साल का था न, फिर पांच महीना क्यों? अगर यह सरकार देने में सक्षम है, तो उसे देना ही चाहिए। 2015 में उनका नारा था-बिजली हाफ, पानी माफ। फिर 2019 में पानी का बिल माफ करने की नौबत क्यों आई? यह तो स्पष्ट है सबके सामने कि कहा, पर किया नहीं। इसलिए यह इनका धोखा है। अब बताइए कि किराएदारों को कैसे बिजली मुफ्त मिलेगी? इसलिए हम उनकी इस नीयत का विरोध कर रहे हैं कि उन्होंने चुनाव को ध्यान में रख कर सुविधाएं मुफ्त देने की घोषणा क्यों की।

सूर्यनाथ सिंह : इस बात से तो कोई इनकार नहीं करेगा कि दिल्ली में पिछले पांच सालों में बिजली की दरें नहीं बढ़ीं। इसी तरह स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार आया है। मगर दिल्ली से सटे हरियाणा और उत्तर प्रदेश में स्थिति इसके उलट है। भाजपा शासित राज्यों की सरकारों ने केजरीवाल सरकार से प्रेरणा क्यों नहीं ली?
’आपकी जानकारी बिल्कुल गलत है। दिल्ली में बिजली का फिक्स रेट बढ़ाया गया है और पांच गुना बढ़ाया गया है। जिन लोगों का बिल पहले एक हजार रुपए आता था, उनका बिल छब्बीस सौ, अट्ठाईस सौ रुपए आया है। फिक्स रेट से साढ़े नौ हजार करोड़ रुपए अतिरिक्त वसूले गए। इस संदर्भ में आरटीआइ से मिली सूचना में जानकारी मिली है कि बिजली के नाम पर पूरी दिल्ली से तेईस हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त वसूली हुई है। हम पूछना चाहते हैं कि वह पैसा कहां गया? दिल्ली में किसान और व्यवसायियों के बिजली की दरें अलग हैं। अब जिसका मकान है, उसकी दुकान भी तो है! यह धोखा क्यों? हमारे जितने भाजपा शासित प्रदेश हैं वहां बिजली की दरें सबके लिए समान हैं।

आयेंद्र उपाध्याय : अगर दिल्ली में आपकी सरकार आती है, तो क्या इन मुफ्त की सेवाओं को लागू रखेंगे या बंद कर देंगे?
’हमें जो भी करना है, पांच साल के लिए करना है, पांच महीने के लिए नहीं। हम इनकी सारी राहत यंोजनाओं का हिसाब निकाल रहे हैं। जितनी राहत ये दे रहे हैं, उससे पांच गुना अधिक राहत भाजपा देने वाली है। यह हमारा दावा है।

पंकज रोहिला : पिछले बीस सालों से भाजपा सत्ता से बाहर है। यहां लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मत फीसद में भारी अंतर है। उस अंतर को कैसे पाटेंगे?
’अभी भाजपा को जो बढ़त मिली है, इसलिए मिली है कि अरविंद केजरीवाल की सारी बातें थोथी हैं। नहीं तो 2019 के चुनाव में वे कम से कम अपनी विधानसभा में तो बढ़त ले लिए होते! वहां भी उनकी पार्टी ग्यारह हजार वोटों से पीछे रही। मेरा मानना है कि हम पचपन से पैंसठ फीसद तक बढ़त लिए हुए हैं। इसमें हम झुग्गी बस्तियों, अनधिकृत कॉलोनियों आदि में रहने वाले लोगों की भावनाओं का भी अध्ययन कर रहे हैं। उनके लिए योजना बना रहे हैं। हम उन लोगों के दिलों में भी जगह बना चुके हैं, जो हमारे साथ नहीं थे। हम मान रहे हैं कि पचास के आसपास सीटें मिलेंगी।

अजय पांडेय : क्या आने वाले दिनों में अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की दिशा में कोई फैसला आएगा?
’सौ प्रतिशत। जिस ढंग से हमने पूरी तैयारी कर रखी है और एलजी के नेतृत्व में एक समिति भी गठित है, उनकी सहमति भी मिल चुकी है। इसमें छह महीने से ज्यादा समय नहीं लगने वाला है, जब अनधिकृत कॉलोनियों को उनका मालिकाना हक मिलेगा। फिर बाकी सुविधाएं देने में थोड़ा वक्त जरूर लग सकता है।

मृणाल वल्लरी : दिल्ली में नगर नियोजन खस्ता हाल है। कोई हादसा होता है, तो उससे निपटना पहले ही चुनौतीपूर्ण है, फिर भी अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करना सभी राजनीतिक दलों के एजंडे में रहता है। पहले उन्हें नियमित किया जाता है, फिर उसमें सुविधाएं देने का प्रयास किया जाता है। इस पर पहले ही विचार क्यों नहीं कर लिया जाता?
’हम तो इस पर लगातार दबाव बनाने का प्रयास करते रहे हैं, पर हम पिछले बीस सालों से सत्ता में हैं ही नहीं और जो समस्याएं आप बता रही हैं, वे इन्हीं बीस सालों में पैदा हुई हैं। हमारी सरकारें जो भी कॉलोनियों की योजनाएं तैयार करती हैं, उसे व्यवस्थित तरीके से करती है। कोटपुतली में झुग्गी बस्तियों के लिए एक व्यवस्थित कॉलोनी बना कर दे रहे हैं।

सूर्यनाथ सिंह : भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने में कहां अड़चन आ रही है?
’इसमें कुछ प्रगति हुई है। सरकार ने विदेशों में भी व्यवहृत होने वाली तीन भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का फैसला कर लिया है-भोजपुरी, राजस्थानी और भोटी। यह हो जाता पिछले साल ही, पर ब्रज ने भी दावा ठोक दिया। इसलिए कुछ विवाद हो गया है। मुझे लगता है कि अगले सत्र में इसका कुछ न कुछ फैसला हो जाएगा।

अजय पांडेय : दिल्ली विधानसभा के अगले चुनाव में आपका मुकाबला कांग्रेस से है या आम आदमी पार्टी से?
’जो अखबार बोल रहे हैं, उसमें तो आम आदमी पार्टी बहुत पीछे चली गई है। मैं मानता हूं कि कांग्रेस और आप मिल कर पैंतीस फीसद में सिमट गई हैं। अब वे आपस में फैसला कर लें कि कौन बीस पर रहेगा और कौन पंद्रह पर। हमारा तो पैंसठ प्रतिशत है।

मृणाल वल्लरी : अभी तो विधानसभा में आपके तीन लोग हैं, फिर पचास तक कैसे पहुंचेंगे?
’इस समय हमारी पार्टी बहुत मुस्तैदी से काम कर रही है। अगर हममें एकजुटता नहीं होती, तो शायद हम इतनी बड़ी-बड़ी विजय हासिल नहीं कर पाते। जावडेकर जी हमारे प्रभारी हैं, उनके साथ मिल कर हमारे सभी वरिष्ठ नेता काम कर रहे हैं, इसलिए यह कामयाबी हमसे दूर नहीं है।

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