कुदरत का कहर या इंसानी भूल

digamberbisht

समुद्र में लगातार बढ़ रही नमी की वजह से भी बारिश की मात्रा बढ़ जाती है। यह तब और भयावह रूप में सामने आती है जब लोगों के फेंके गए प्लास्टिक और कचरे की वजह से जल निकासी प्रणाली अवरुद्ध हो जाती है।

1996 के बाद पहली बार अगस्त में इतनी बारिश दर्ज की गई।

इस साल बरसात का कहर देश के लगभग सभी हिस्सों में देखा गया। हजारों गांवों की फसलें बाढ़ की वजह से चौपट हो गर्इं, तो सैकड़ों लोगों की मौत हो गई। बहुत सारे मवेशी बह गए, अनेक लोगों के घर-बार उजड़ गए और उन्हें राहत शिविरों में पनाह लेनी पड़ी। विकसित कहे जाने वाले मुंबई, पटना, वाराणसी जैसे शहरों में लोगों को हफ्तों जलप्लावन से जूझना पड़ा। ऐसे में यह सवाल एक बार फिर गाढ़ा होकर उभरा कि बाढ़ जैसी आपदा कुदरत का कहर है या फिर इसके लिए मनुष्य की गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं। अनेक अध्ययनों से ऐसी आपदा की पोल खुल चुकी है। बाढ़ से पैदा हुए संकट का विश्लेषण कर रही हैं नाज खान।

इस बार की औसत से अधिक हुई बारिश करीब एक हजार नौ सौ लोगों की जिंदगी लील गई। पचीस लाख लोग बाढ़ और भूस्खलन जैसी समस्याओं से प्रभावित हुए और अब जब बारिश रुकी है, तो बाढ़ग्रस्त इलाकों के ज्यादातर लोग डेंगू-चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के खतरे से जूझ रहे हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि इस बार देरी से लौट रहे मानसून की बारिश ने न सिर्फ आधे भारत को तर किया, बल्कि अपना रौद्र रूप दिखा कर जान-माल को भारी नुकसान पहुंचाया, जिसका असर लंबे समय तक रहने वाला है। यह तो साफ है कि यह प्रकृति से लगातार किए जा रहे खिलवाड़ का नतीजा है कि मौसम में लगातार बदलाव हो रहा है और इसके एवज में जब-तब प्राकृतिक आपदाओं की सूरत में अंजाम भी भुगतना पड़ रहा है। इसे व्यवस्था की नाकामी और संबंधित विभागों की खामी के चश्मे से तो देखा ही जाएगा, मगर इसके लिए सिर्फ यही जिम्मेदार हों, ऐसा नहीं है।

समुद्र में लगातार बढ़ रही नमी की वजह से भी बारिश की मात्रा बढ़ जाती है। यह तब और भयावह रूप में सामने आती है जब लोगों के फेंके गए प्लास्टिक और कचरे की वजह से जल निकासी प्रणाली अवरुद्ध हो जाती है। इससे जल निकासी बाधित होती है और नतीजा जलजमाव के तौर पर सामने आता है। 1960 के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि मानसून देरी से लौट रहा है। हालांकि हर साल अपने निर्धारित समय के अनुसार मानसून एक जून से तीस सितंबर तक खत्म हो जाता है। मगर इस बार मानसून न सिर्फ देरी से लौट रहा है, बल्कि लौटते मानसून में भी बारिश का भयावह रूप सामने आ रहा है। मौसम विभाग के मुताबिक इस साल जुलाई और अगस्त में हुई बरसात अनुमान से ढाई गुना ज्यादा दर्ज की गई। वहीं 1996 के बाद पहली बार अगस्त में इतनी बारिश दर्ज की गई। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार देश में बीते कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन, वनों की अंधाधुंध कटाई और तालाबों पर अतिक्रमण की वजह से बाढ़ की घटनाओं में इजाफा हुआ है।

अप्रत्याशित तौर पर इतनी अधिक हुई बारिश की वजह से हालत यह है कि स्मार्ट सिटी बनाए जा रहे पटना में भी सब कुछ जलमग्न हो गया और पानी सड़कों पर है। दरअसल, पटना को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए योजना तो बनी, पर यहां की जल निकासी व्यवस्था पर काम पूरी तरह किया ही नहीं गया। फिर पटना से सटी कई नदियां पहले ही खतरे के निशान से ऊपर बह रही थीं और जब लगातार कई दिनों तक भारी बारिश हुई तो ऐसे में शहर के ड्रेनेज सिस्टम की क्षमता भी जवाब दे गई। हालात यह है कि यहां बाढ़ से आम आदमी तो क्या सरकार के मंत्री भी इसके प्रकोप से बच नहीं सके हैं। डिप्टी सीएम सुशील मोदी का सरकारी आवास बाढ़ के पानी की चपेट में आ गया और उनको उनके सरकारी आवास से निकालने के लिए एनडीआरएफ को आपदा प्रबंधन करना पड़ा। वहीं प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र वाराणसी भी बाढ़ का दंश झेल रहा है। करीब दो दशक बाद वाराणसी में भी इस तरह की बारिश हुई है। इससे पहले अगस्त 2009 में इस शहर ने ऐसी भीषण बारिश देखी थी।

कभी न सोने वाला शहर मुंबई भी बाढ़ से त्रस्त रहा। सड़कें बाधित रहीं और रास्ते सुनसान रहे। हालांकि 2005 और 2017 में भी मुंबई नगरी ऐसी ही बाढ़ का सामना कर चुकी है। 2005 में यहां चौबीस घंटों में 944 मिमी बारिश हुई थी और इसकी वजह से पांच सौ से ज्यादा लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। वहीं दक्षिणी राज्य केरल इस बार भी बाढ़ की चपेट में है। केरल में पिछले साल भी बाढ़ से हुए हादसों में करीब साढ़े तीन सौ लोग मारे गए थे और करीब सवा तीन लाख लोगों को राहत शिविरों में रहने पर मजबूर होना पड़ा था।

ऐसा नहीं कि देश में पहली बार बाढ़ का प्रकोप छाया हो या सरकारी तंत्र की व्यवस्था के दावों की पोल खुली हो, लेकिन इस बार जलजमाव की भयावह स्थिति इस ओर संकेत जरूर कर रही है कि जिम्मेदार कोई भी हो, लेकिन प्रकृति अब बिल्कुल सहने के मूड में नहीं है। हर साल बाढ़ से प्रभावित होते क्षेत्रों की स्थिति को देखते हुए ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नदियों को जोड़ने की योजना बनाई थी। समस्या के मद्देनजर लगभग हर राज्य में आपदा प्रबंधन बल का गठन किया गया है। मगर अक्सर इसकी भूमिका बाढ़ के भयावह रूप दिखाने के बाद ही देखी गई है। वहीं सरकारें भी बाढ़ की स्थिति में काफी सक्रियता दिखाती हैं, लेकिन अक्सर देखा यही गया है कि बाढ़ नियंत्रण संबंधी योजनाएं लंबे समय के लिए ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं या फिर इनका काम ही बहुत ढुलमुल तरीके से चलता रहता है।

प्लास्टिक कचरा अहम वजह

लगातार लोगों का फेंका हुआ प्लास्टिक कचरा नदियों, नालों से होता हुआ समुद्र में पहुंच रहा है। नदियों में डाला जा रहा यही प्लास्टिक कचरा नदियों के उफान के लिए भी जिम्मेदार है। हर साल समुद्रों में करीब अस्सी लाख टन प्लास्टिक कचरा मिलता है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रति मिनट एक ट्रक प्लास्टिक कचरा समुद्र में जा रहा है। यही स्थिति रही तो 2050 तक प्रति मिनट चार ट्रक कूड़ा समुद्र में जाने लगेगा। दरअसल, प्लास्टिक के साथ समस्या यह है कि यह नष्ट नहीं होता। इस वजह से यह पूरी तरह निष्क्रिय भी नहीं हो पाता। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि समुद्रों में पंद्रह करोड़ टन प्लास्टिक कचरा मौजूद है। हमारे देश में हर दिन करीब छब्बीस हजार टन कचरा पैदा होता है, यह नालियों, नदियों, कूड़े में फेंक दिया जाता है। यह भयावह सत्य है कि दुनिया भर में जो दस नदियां समुद्र में नब्बे फीसद से अधिक प्लास्टिक कचरा बहा कर ले जाती हैं, उनमें से तीन नदियां गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु भारत में बहती हैं। अकेले गंगा नदी ही लगभग बारह लाख टन सालाना कचरा समुद्र में डाल देती है। यह कचरा नालियों से होता हुआ नदियों के जरिए समुद्र में बह रहा है। शहरों में इस कचरे से नालियां जाम हो रही हैं, जल निकासी बाधित हो रही है और जलजमाव हो रहा है। वहीं इससे वायु प्रदूषण भी बढ़ रहा है।

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