एक विश्व एक परिवार

digamberbisht

सही सोच-विचार रखने वालों का स्पष्ट मत है कि पृथ्वी पर तब तक शांति और न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकती जब तक कि लोगों के बीच धर्म आधारित असमानता और लोगों के बीच आपसी अविश्वास को दूर नहीं किया जाता है।

भीड़ की धार्मिक कट्टरता ईश्वर के विचार का मजाक उड़ाती है।प्रतीकात्मक तस्वीर।

स्वामी अग्निवेश

आज विश्व हिंसा की चपेट में है। धर्म, संप्रदाय, नस्ल और जाति के झगड़े में दिन-प्रतिदन मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। विश्व के अधिकांश देशों में राजनीति को धार्मिक कट््टरता और कॉरपोरेट की काली छाया ने ढंक लिया है। धार्मिक कट््टरपंथियों का मकसद लोगों को अंधविश्वास और पाखंड के मकड़जाल में फंसा कर अपना उल्लू सीधा करना है, तो विकास के नाम पर कॉरपोरेट का मकसद ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना है।

आज समूचे विश्व में सत्ता और कॉर्पोरेट की मिलीभगत से प्राकृतिक संसाधनों की लूट मची है। जंगलों में रहने वाले आदिवासी समूहों को बेदखल किया जा रहा है। अफ्रीकी देशों और दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों के साथ ही विकसित अमेरिकी और यूरोपीय देशों के मूल निवासियों के साथ बर्बरता का व्यवहार किया जा रहा है। उन्हें विकास की सबसे अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। इस समय विश्व पर्यावरण भारी संकट में है, तो सदियों से प्रकृति के सहारे अपना जीवन यापन कर रहा आदिवासी समाज दर दर की ठोकरें खा रहा है।

एक और बात पूरे विश्व में आम है। यह है अपने पड़ोसियों के साथ वैर भाव। देशों में पड़ोसी मुल्कों के साथ परस्पर सहयोग और शांति की भावना न होकर शत्रुतापूर्ण व्यवहार देखने को मिल रहा है। इसके कारण आज विश्व के अधिकांश देशों में छद्म राष्टÑवाद का जोर है, जो शासकों को बुनियादी मुद्दों को छोड़ कर हथियारों की खरीद की तरफ ले जा रहा है। जबकि यह सच्चाई है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ‘नेशन स्टेट’ यानी ‘राष्ट्र-राज्य’ का कोई मतलब नहीं रह गया है। सब बाजार की शक्तियां तय कर रही हैं। आज बहुराष्ट्रीय कंपनियां इतनी शक्तिशाली हो गई हैं कि वे यह तय करती हैं कि अमुक देश का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कौन होगा। इसके बाद भी उस देश को गुमान रहता है कि हम राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री चुन रहे हैं।

ऐसी सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक परिस्थिति में विश्व भर में निराशा के गहरे बादल मंडरा रहे हैं। आम जनता बेबस है, तो युवा निराश हैं। बेरोजगारी से जूझ रहे युवा हिंसक और अतिवादी संगठनों के लिए आसान चारा बन गए हैं। ये संगठन उन्हें उकसा या उनका भावनात्मक दोहन कर उनके जरिए अपना मकसद साध रहे हैं। इसके अलावा विश्व भर में स्थापित सत्ता प्रतिष्ठानों के खिलाफ आक्रोश बढ़ रहा है। उसमें भी युवाओं की सहभागिता सबसे ज्यादा है। इस परिस्थिति से दुनिया भर के लोग बाहर निकलना चाह रहे हैं, लेकिन किसी साफ और स्पष्ट नीति के अभाव में पूरा विश्व समुदाय खुद को असहाय पा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र प्रति वर्ष इक्कीस सितंबर को विश्व शांति दिवस मनाता है। इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु संकट से जूझ रहे विश्व के लिए दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों को चुनौती स्वीकार करने का आह्वान किया। लेकिन यह सिर्फ आह्वान से संभव नहीं है। जब तक संयुक्त राष्ट्र एक सौ तिरानबे देशों का, राष्ट्र-राज्यों का क्लब बना रहेगा, तब तक इन समस्याओं का कोई समुचित समाधान नहीं हो सकेगा और न ही युद्ध की विभीषिका से और युद्ध सामग्री पर होने वाले प्रति वर्ष दो हजार अरब डॉलर के अत्यंत नुकसानदायक खर्चे से निजात मिलेगी। इसके लिए सारे राष्ट्र-राज्यों को मिल कर पृथ्वी पर मानवता के एक आदर्श सपने को साकार करने की जरूरत है। क्योंकि इस तरह विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति के अतर्कित दोहन और शक्तिशाली बनने की होड़ में हथियारों का जखीरा जमा करते जाने से पूरी मानवता ही खतरे में है।

मैंने कोलकाता के सेंट जेवियर कॉलेज में प्रोफेसर की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़ कर संन्यास लिया। स्वामी दयानंद सरस्वती के आदर्शों और विचारों ने मुझे एक जीवन-दृष्टि दी। जिसके कारण संन्यासी जीवन स्वीकार करने के बाद मैं किसी मठ और मंदिर में रह कर विलासिता का जीवन जीने के बजाय गरीबों की सेवा में अपना जीवन लगा दिया। आजीवन धार्मिक कट््टरता, पाखंड, अंधविश्वास, सामाजिक ऊंच-नीच और गैर-बराबरी के लिए संघर्ष करता रहा। अपने लंबे सामाजिक-अध्यात्मिक जीवन में मैंने देश-विदेश भर में भ्रमण किया। यात्रा के दौरान विभिन्न धर्मों, संप्रदायों और नस्लों के लोगों के जीवन और अनुभव से सीखने के बाद यह कह सकता हूं कि लंबे समय से संसार में सांप्रदायिकता और नस्लवाद साम्राज्यवादी शक्तियों के हाथ का सबसे मजबूत हथियार रहा है। साम्राज्यवादी ताकतों ने सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। भारत की आजादी की लड़ाई में गांधीजी ने सर्व धर्म समभाव की वकालत की थी।

आज संपूर्ण धरती पर धर्म, संप्रदाय, जातिवाद को लेकर बढ़ती राजनीति और अमीर-गरीब के बीच चौड़ी होती खार्इं को देखा और महसूस किया जा सकता है। राजनीतिक और धार्मिक लोगों के पास इस समस्या का कोई समाधान नहीं है। ऐसे में वेद के आदर्श वसुधैव कुटुंबकम् की भावना से घृणा और हिंसा की अमानवीय राजनीति को समाप्त किया जा सकता है। अंधविश्वास और पाखंड की इस परिस्थिति में वैदिक आदर्शों को लेकर एक नया समाज बनाने के लिए और शिक्षा में जागतिक मूल्यों को प्रतिष्ठित करने के लिए एक आध्यात्मिक क्रांति का प्रयास किया जा सकता है। वसुधैव कुटुंबकम् का सनातन वाक्य एक न्यायसंगत और शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था के निर्माण और सार्वभौमिक मानव एकता का आध्यात्मिक आंदोलन बन सकता है।

एक ईश्वर, एक ब्रह्मांड और एक विश्व परिवार- वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना और न्याय के साथ शांति हर मनुष्य की जिम्मेदारी है। यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय और ईशोपनिषद में कहा गया है कि ‘ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्/ तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्यस्विद्धनम्।’ जिसका अर्थ है कि ‘ईश्वर प्रदत्त इन संसाधनों का अपनी आवश्यकतानुसार और त्यागपूर्वक उपभोग करो, न कि अपने लालच और उपभोक्तावाद के वशीभूत होकर।’

सही सोच-विचार रखने वालों का स्पष्ट मत है कि पृथ्वी पर तब तक शांति और न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकती जब तक कि लोगों के बीच धर्म आधारित असमानता और लोगों के बीच आपसी अविश्वास को दूर नहीं किया जाता है। आध्यात्मिक आंदोलन के रूप में वसुधैव कुटुम्बकम्, इस तरह के परिवर्तन का उद्घोष करता है। यह अवधारणा भले ही वेदों से ली गई है, लेकिन यह हर तरह उप-पहचानों और बाधाओं के बिना एक दुनिया की कल्पना करता है; जिसमें सभी धर्म, संप्रदाय, जाति और क्षेत्र के लोग एक परिवार की तरह रह सकें।

हर इंसान इस विचार-दृष्टि को आसानी से ग्रहण कर सकता है, क्योंकि यह सभी धर्मों के आध्यात्मिक मूल में मौजूद है। यह वह प्रकाश है जो सांप्रदायिकता, धार्मिक कट््टरवाद और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धर्म के दुरुपयोग से बाहर है। सभी धर्म अलग-अलग तरीकों से एक सृष्टिकर्ता ईश्वर में विश्वास करते हैं। लेकिन वे जोर देकर कहते हैं कि उनका भगवान ही एकमात्र सच्चा भगवान है। ऐसा करने के लिए वे परमेश्वर के विचार को विकृत करते हैं। विडंबना यह है कि ऐसा भगवान मनुष्यों के बीच भेदभाव, घृणा, अन्याय और हिंसा का स्रोत बनता है। इस तरह की धार्मिक कट्टरता ईश्वर के विचार का मजाक उड़ाती है।

इस प्रकार एक ईश्वर का विचार मानवीय एकता की बुनियाद है। वसुधैव कुटुम्बकम् का विचार हमें धार्मिक कट््टरता से दूर तटस्थ दृष्टि और आध्यात्मिक विचार प्रदान करता है, जिसमें स्वामी दयानंद सरस्वती की सांप्रदायिक सद्भाव की विरासत, कार्ल मार्क्स का चिंतन, महात्मा गांधी का सत्याग्रह और आंबेडकर का संघर्ष समाहित है। इस विचार को लोगों में रोप कर ही विश्व शांति की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

<!–

–>

No posts found.
Uttarakhand News Latest and breaking Hindi News , Uttarakhand weather, Places to visit in Uttarakhand जानने के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें ।
Next Post

बाखबर: वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति

Hindi News रविवारीय स्तम्भ बाखबर: वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति एक दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत ने ‘लिंचिग’ शब्द के ‘भारतीय’ न होने पर आपत्ति जता कर चैनलों में विवाद पैदा कर दिया। जवाब में एक ने कहा कि ‘लिंचिंग’ अंग्रेजी का हो या किसी का, ‘हिंसा’ तो ‘हिंसा’ है। पीएमसी […]