वक़्त की नब्ज़: लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र

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नुकसान हुआ है अगर तो भारत की लोकतांत्रिक छवि को, क्योंकि लोकतंत्र का आधार है कानून-व्यवस्था। जिन देशों में लोग आदत डाल लेते हैं कानून को अपने हाथों में लेने की, उन देशों में लोकतंत्र धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है।

मोहन भागवत (फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस)

तवलीन सिंह

कभी वे दिन थे जब मेरे जैसे लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गंभीरता से नहीं लिया करते थे। उनकी शाखाओं में मैं भी जाती थी दिल्ली के झंडेवाला इलाके के एक मैदान में, तो सिर्फ समझने के लिए कि इस संस्था में कौन-सी चीज है, जो अच्छे-खासे समझदार लोग इसमें शामिल हो जाते हैं बचपन में और फिर इससे जुड़े रहते हैं उमर भर। इस खोज में मेरी अच्छी दोस्ती एक सरसंघचालक से भी हुई थी, जिनको रज्जू भैया कहते थे। शाखा देखने के बाद मैं उनके साथ उनके कमरे के बाहर एक बरामदे में बैठ कर चाय पर चर्चा करती थी। देशभक्ति की बातें हुआ करती थीं, लेकिन राजनीति की बहुत कम।

जबसे संघ के एक प्रचारक भारत के प्रधानमंत्री बन गए हैं, मैंने देखा है कि इस तथाकथित सांस्कृतिक संस्था ने अपना भेस बदल कर राजनीतिक बना लिया है। यह भी देखने को मिला है कि देश के महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर बात करने लगे हैं संघ के सरसंघचालक। पिछले साल उन्होंने दिल्ली के विज्ञान भवन में एक विशाल पत्रकार सम्मेलन बुलाया था, जिसमें शामिल होने गए थे दिल्ली के जाने-माने पत्रकार और टीवी एंकर। याद है मुझे कि उस सम्मेलन में मोहन भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि गुरु गोलवलकर ने जो कभी सुझाव दिया था कि भारत की मुसलिम समस्या को खत्म करने के लिए हमको वही करना चाहिए जो हिटलर ने यहूदियों के साथ किया था, उसको अब आरएसएस नहीं मानता है। दौर के साथ सोच भी बदल गई है। लेकिन पिछले हफ्ते भागवत का दशहरा वाला भाषण सुन कर मेरे दिल में वही पुराने सवाल उठने लगे।

इन सवालों में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या अरएसएस के हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों के लिए बराबर का दर्जा मिलेगा या क्या उनको आदत डालनी होगी दूसरे दर्जे के नागरिक होने की? यह सवाल तब उठा जब भागवत ने स्पष्ट किया कि किसी भी भारतीय भाषा में लिंचिंग शब्द है ही नहीं, सो जो लोग भारत को लिंचिंग्स के लिए बदनाम कर रहे हैं उनका मकसद ही गलत है। इशारा किया सरसंघचालक ने कि ये इल्जाम लग रहे हैं पश्चिमी देशों की एक सोची-समझी साजिश के तहत।

ऐसा बिल्कुल नहीं है भागवतजी। कोई साजिश नहीं है। बदनाम भारतीय जरूर हुआ है, इन भीड़ हिंसाओं के कारण और वह इसलिए कि किसी सभ्य देश में जब किसी निहत्थे आदमी को सरेआम पीट-पीट कर मारा जाता है और उसके गर्व से विडियो बनाते हैं लोग, तो एक देश अपने आप को सभ्य कहने का अधिकार खो देता है। मैंने कुछ ऐसी बातें ट्वीट करके कही भागवत के भाषण के बाद, तो मेरे पीछे पड़ गए मोदी के सोशल मीडिया समर्थक। गालियां खूब सुनाई और बार-बार पूछा मुझसे कि मेरा दिल सिर्फ मुसलमानों के लिए क्यों दुखता है। आंकड़े पेश किए गए, साबित करने के लिए कि इस साल मुसलमानों से कितने ज्यादा हिंदू मारे गए हैं भीड़ों द्वारा।

ऐसा हुआ भी होगा, लेकिन क्या ऐसा कोई हादसा हुआ है, जिसमें किसी हिंदू युवक को खंभे से घंटों बांध कर उससे अल्लाह-ओ-अकबर कहलाया गया हो? और वह भी डंडों और लाठियों से पीट-पीट कर? ऐसा झारखंड में हुआ था, तबरेज अंसारी के साथ। उससे जय श्रीराम कहलाया गया और उसने बार-बार कहा, लेकिन भीड़ का अत्याचार बंद नहीं हुआ। जोर-जोर से पड़ती रहीं उस गरीब पर लाठियां और सरिए। फिर पुलिसकर्मी को बुला कर उसे गिरफ्तार करवाया गया। चार दिन बाद अंदरूनी जख्मों के कारण हिरासत में उसकी मौत हो गई।

लिंचिंग इसको कहते हैं। कुछ दिनों पहले जब दो दलित बच्चों को मार डाला गया था, इसलिए कि वे खुले में शौच कर रहे थे, उसको लिंचिंग नहीं कह सकते। वह निर्मम हत्या थी। दंगों को लिंचिंग नहीं कह सकते हैं और न ही उसको लिंचिंग कह सकते हैं, जब किसी संघ कार्यकर्ता के घर पर मुसलमान हमला करके जान से मार डालते हैं पूरे परिवार को। वह भी हत्या होती है सिर्फ। लिंचिंग उसी हिंसा का नाम है, जो की जाती है सरेआम लोगों में भय पैदा करने के लिए। ऐसा करते आए हैं गोरक्षक गायों की तस्करी रोकने के बहाने। लेकिन संदेश यह गया है मुसलमानों को कि पशुपालन करना अब मुश्किल है। और वृद्ध गायों को मारना भी। नतीजा यह कि पुष्कर के पशु मेले में बिक्री सत्तानबे फीसद कम रही। नतीजा यह भी देखने को मिल रहा है कि वृद्ध गायों को इतनी बड़ी तादाद में खुला छोड़ा जा रहा है कि फसलें खाने लगी हैं।

ऐसा होना शुरू है जब से सितंबर, 2015 में दादरी के बिसाहड़ा गांव में मोहम्मद अखलाक और उसके बेटे को उनके घर के अंदर से घसीट कर मारा गया था इस शक पर कि उन्होंने अपने घर की फ्रिज में बीफ रखी हुई थी। अखलाक वहीं मर गया, उसका बेटा दानिश जिंदा है, अस्पताल में इलाज करवाने के बाद।

इसके बाद शुरू हुआ वह लिंचिंग का दौर, जो अब तक चला आ रहा है। आम आदमियों को जब इजाजत मिल जाती है कानून को अपने हाथ में लेने की, तो इस तरह की हिंसा बढ़ती रहती है। सो, कई हादसे हुए हैं, जिनमें भीड़ ने बच्चा चोरी के शक पर लोगों को मार डाला है। नुकसान हुआ है अगर तो भारत की लोकतांत्रिक छवि को, क्योंकि लोकतंत्र का आधार है कानून-व्यवस्था। जिन देशों में लोग आदत डाल लेते हैं कानून को अपने हाथों में लेने की, उन देशों में लोकतंत्र धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है। इसलिए भागवतजी, बहुत जरूरी है कि आप लिंचिंग का असली मतलब समझ जाएं ताकि आप अपने कार्यकर्ताओं को लगा दें इस शर्मनाक, कायर हिंसा को रोकने में।

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