दुनिया मेरे आगे: निज भाषा की जगह

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आज अनुवाद की जटिल हिंदी ने ही हिंदी के प्रचार और प्रसार के अभियान को रोका है।

सांकेतिक तस्वीर।

अतुल चतुर्वेदी

आज की युवा पीढ़ी को जब भाषिक थिगड़े लगा कर बोलते हुए देखता हूं तो कई बार मन बहुत दुखी होता है। जानकारी के क्षेत्र में भले ही वे पुरानी पीढ़ी से आगे हों, लेकिन भाषागत रूप से उनके पास न केवल शब्दों की कमी है, बल्कि वैचारिकता का भी भारी अभाव है। कुछ साल पहले प्रतिभावान छात्र-छात्राओं के एक शिविर को व्यक्तित्व विकास की दृष्टि से संबोधित करने का कुछ दिन तक अवसर मिला। मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि उन मेधावी विद्यार्थियों से जब साफ-सफाई के लिए एक पत्र प्रशासन के नाम लिखने को कहा गया तो उनके लिखे में हिज्जे और वाक्य विन्यास की काफी गलतियां थीं। जब बातचीत की गई तो पता चला कि उन्होंने पाठ्यक्रम के अलावा बरसों से कोई अन्य पुस्तक नहीं पढ़ी है, जिसमें साहित्य की किसी कृति को पढ़ने का तो प्रश्न ही नहीं। एक समर्थ भाषा का निरंतर ज्ञान और अध्ययन न केवल आपको संवेदनशील बनाता है, बल्कि अनुभव को व्यक्त करने लायक उपयुक्त शब्दावली भी देता है। उन शब्दों के माध्यम से कल्पना शक्ति को पंख लगते हैं।

दरअसल, भाषा न केवल संस्कृति का सेतु है, बल्कि हमारी परंपराओं और समृद्ध विरासत से भी हमें जोड़ती है। यही कारण है कि आज हिंदी की अशुद्धियों को कोई गंभीरता से नहीं लेता है। वैवाहिक महंगे कार्ड में भाषिक त्रुटियों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता, बल्कि हमारा अवसरवादी मध्य वर्ग अंग्रेजी में कार्ड छपवा कर खुद को धन्य समझता है। आप संसार की जितनी भी समर्थ भाषाएं सीखें, कोई गुरेज नहीं है, लेकिन यह अपनी मातृभाषा की उपेक्षा की कीमत पर नहीं होना चाहिए। हिंदी के चैनलों पर भाषिक अशुद्धि से लबरेज पट्टियां चलती रहती हैं।

महाविद्यालय, विद्यालय, कार्यालय, आयोजन जैसे शब्द तो लगभग गायब हो गए हैं। वहां ‘इवेंट’, ‘फेयर’ और ‘मेगाफेयर’ जैसे उपभोक्तावादी शब्दों ने जड़ें जमा ली हैं। नतीजतन, युवा पीढ़ी में भारतीय समाज की विसंगतियों और समस्याओं को समझने की सामर्थ्य नहीं पैदा हो रही है। वे अंग्रेजीदां नजरिए से देश को देख रहे हैं। यही कारण है कि मूल्यहीनता सर्वत्र हावी है। हिंदी को बाजार ने तो अपना लिया है, लेकिन सिर्फ अपने स्वार्थों और माल बेचने की दृष्टि से। हिंदी पेट की भाषा आज तक नहीं बन सकी। हालांकि बेहतर और समर्थ हिंदी बोलने और लिखने वालों की आज भी भारी मांग है।

कुछ राजनीतिक स्वार्थों के लिए हिंदी का बीच-बीच में विरोध भी किया जाता रहा है, लेकिन आज वैश्विक रूप से हिंदी का परचम फहरा रहा है। एक सरल और सहज वैज्ञानिक भाषा के रूप में हिंदी आज अत्यंत समृद्ध भाषा है। बस जरूरत है तो मात्र स्वाभिमान और चेतना के साथ उसके प्रयोग, व्यवहार और उन्नयन के लिए सार्थक प्रयासों की। आज हिंदी के लगभग पचास करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ता विश्व भर में हैं। हिंदी के लाखों ब्लॉग और सैकड़ों पत्रिकाएं उपलब्ध हैं जिन पर प्रतिदिन लाखों हिट होते हैं। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और याहू जैसी कंपनियों को हिंदी में सॉफ्टवेयर बाजार की मांग को देखते हुए उतारने पड़े हैं।

जरूरत है तो विज्ञान और तकनीकी जैसे विषयों पर हिंदी के तंग हाथ को खोलने की। आज हमें महावीर प्रसाद द्विवेदी और गुणाकर मुले जैसे लेखकों की आवश्यकता है, जिन्होंने विज्ञान और साहित्येतर विषयों के द्वार भी हिंदी के लिए खोले थे। एक अनुमान के अनुसार हिंदी के पास लगभग पच्चीस लाख शब्दों की विराट संपदा है, जिससे वह अपनी प्राणवायु पाती है। विश्व के छह सौ विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है। तब हिंदी को लेकर हमारे तथाकथित नव धनाढ्य वर्ग में कैसा संकोच विद्यमान है, यह शोचनीय है?

आज अनुवाद की जटिल हिंदी ने ही हिंदी के प्रचार और प्रसार के अभियान को रोका है। विज्ञान में विभवांतर, परासरण दाब, विवर्तन और व्यतिकरण जैसे भारी-भरकम शब्द हिंदी को दुरूह बना रहे हैं। अगर उनके साथ-साथ पाठ्यक्रमों की पुस्तकों में साथ में प्रचलित अंग्रेजी शब्द भी दे दिए जाएं या इन हिंदी अनूदित शब्दों का एक उच्च स्तरीय समिति सरलीकरण कर सके, तो यह हिंदी के प्रचार-प्रसार अभियान पर महती कृपा होगी। हिंदी को हम व्यवहार की भाषा बनाएं, जटिल और किताबी भाषा नहीं। उसे अपनी बोलियों से लड़ाएं नहीं, बल्कि उनके शब्दों की नई ऊर्जा देकर उसे मूल भाषा से जोड़ें तो हमारी बोलियां भी बची रहेंगी।

हिंदी को उसकी बोलियों से विरत करने, उसे संकुचित करने और बोलियों को भाषा बनाने की यह महत्त्वाकांक्षा आखिरकार हिंदी का ही नुकसान करेगी। हिंदी की यह चुनौती घरेलू स्तर पर उन अड़तीस बोलियों से भी होगी, जो भाषिक दर्जा प्राप्त करने के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची का दरवाजा खटखटा रही हैं। इससे न केवल हिंदी का दायरा संकुचित होगा, बल्कि उसका फायदा अंग्रेजी को मिलेगा। हमारे पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग को हिंदी को लेकर अपने दोहरे आचरण को छोड़ना पड़ेगा और उसे एक समर्थ, जीवंत संपर्क भाषा के रूप में आत्मसात करना पड़ेगा।

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