दुनिया मेरे आगे: शहर का चेहरा

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आश्चर्य की बात है कि सफाई में सख्ती और स्मार्ट सिटी के नाम पर सड़क चौड़ी करने के बहाने सैकड़ों मकान तोड़ने का साहस करने वाला प्रशासन यातायात बाधित करने वाली ट्रालियों को जब्त करने का साहस क्यों नहीं कर पाता!

इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

एक अच्छे शहर की पहचान तीन गुणों के आधार पर होती है। पहला है साफ-सफाई की स्थिति, दूसरा, यातायात और आवागमन की सुविधा और तीसरा गुण है पर्यावरण और प्रदूषण की हालत। जो शहर इन तीनों कसौटियों पर खरा उतरता है, उसे आदर्श माना जाता है। इंदौर सफाई में तो श्रेष्ठ है, पर आवागमन और प्रदूषण के मामले मे अभी बहुत कुछ किया जाना है। हालांकि इंदौर पिछले चार वर्षों से देश के सर्वाधिक साफ-सुथरे शहर के रूप में स्थापित है। मुझे याद है कि होलकर कालीन युग में भी काफी समय तक शहर साफ-सुथरा था। लेकिन फिर स्थिति बदलती गई। लोग लापरवाह, गैरजवाबदेह और तेजी से बदलती जीवन-शैली की आपाधापी में अपनी जिम्मेदारी भूलते गए। आबादी बढ़ी और उसी के साथ गंदगी भी। लेकिन जो इंदौर में पिछले पांच वर्षों में हुआ, वह अकस्मात नहीं हुआ। उसके पीछे निरंतर प्रयास और परिवर्तन की तलब की पृष्ठभूमि है। धीरे-धीरे यह तय किया गया कि हिम्मत करके सफाई अभियान की शुरुआत की जाए। सफाई का वातावरण, चेतना और सामूहिक जवाबदेही के साथ-साथ निजी संकल्प का माहौल तैयार किया गया। विशेष कचरा गाड़ियां तैयार की गर्इं जो वायलिन के वादन की पृष्ठभूमि में संगीत सुना कर अलसुबह लोगों को सफाई के प्रति सचेत करती नगर में घूमती हैं और उनमें गीले और सूखे कचरे के लिए अलग-अलग स्थान है, वे गाड़ियां हर घर से कचरा इकट्ठा करती हैं और सुबह-शाम घूम कर शहर को साफ-सुथरा रखती हैं। नागरिकों ने भी मुस्तैदी से अपनी जिम्मेदारी निभाई और वे रोज अपना कचरा अलग-अलग थैलियों में भर कर कचरा गाड़ी में डालते हैं।

जो हुआ है वह अधिकारियों, जन प्रतिनिधियों, नागरिकों और सफाईकर्मियों की मिलीजुली मेहनत और कर्तव्य निष्ठा का परिणाम है। आज लोग सड़क पर कचरा फेंकने के पहले इधर-उधर देखते हैं। बल्कि अधिकतर लोग तो कागज या अन्य कचरा जेब में और पास ही रखने लगे हैं, ताकि वे उसे कचरा पेटी में डाल दें। जाहिर है, आप जो करना चाहते हैं, उसकी शुरुआत करने का साहस और उसके लिए आवश्यक निष्ठा और उसे पूरा करने का जुनून हो तो सब कुछ संभव है। हालांकि यह सच है कि अभी भी कुछ लोग सड़क पर गुटका और पान खाकर थूकते और बीड़ी सिगरेट में बचे हुए अंश को सड़क पर ही फेंकते नजर आ जाते हैं। कानून बनाना आसान है, पर उसका पालन मुश्किल और चुनौतीपूर्ण है। इंदौर की सफलता में इस बात का ध्यान रखा गया कि लोग कानून के प्रति आदरभाव भी रखें और उनमें उसे तोड़े जाने का भय भी हो। एक बार मैंने खुद देखा कि कैसे अमेरिका में एक कार ड्राइवर को जुर्माने की रसीद दी गई और उसने कुछ दूर जाकर उसे फेंकी तो उसका पीछा करते हुए अधिकारी ने उस पर फिर से जुर्माना तो किया ही, कागज बाहर फेंकने का शुल्क भी वसूला!

सफाई की तरह ही उतना ही महत्त्वपूर्ण मुद्दा यातायात और प्रदूषण की भी है। दरअसल, ये तीनों ही एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। क्या यह हास्यास्पद नहीं होगा कि शहर तो साफ-सुथरा हो, लेकिन उसकी यातायात व्यवस्था बेतरतीब हो और वह शोरगुल और धुंध-धुएं से ग्रस्त हो? लोग सभी काम सड़कों पर करते है। गणेश स्थापना भी सड़कों पर, गरबे भी सड़कों पर, रोजा इफ्तार भी सड़कों पर और बैंड-बाजा-बारात और शोरगुल के साथ नाच गाना भी सड़कों, धार्मिक और राजनीतिक जुलूस भी सड़कों पर। मानो सड़क चलने और आवागमन के लिए नहीं, इन आयोजनों के लिए हो। यातायात के नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जाती हैं। बिना हेलमेट के तीन और चार सवारी दुपहिया वाहनों पर बैठाना, स्कूटर और कार चलाते हुए भी मोबाइल पर बात करना, ट्रैफिक सिग्नल की परवाह न करना, आम बात है। शादियों में बाजों के साथ ट्रक के आकार की ट्रॉली और उसमें कई-कई बड़े साउंड बॉक्स या डीजे लगा होना आम हो चुका है। तेज गति से बजते गाने ध्वनि प्रदूषण तो बढ़ाते ही हैं, लोगों को परेशान भी करते हैं। यातायात भी बाधित होता ही है। जबकि ये सभी बातें कानूनी तौर पर अपराध हैं। पुलिस देख कर भी शिकायत करने वाले का इंतजार करती है और खुद संज्ञान नहीं लेती। चूंकि कोई किसी को कुछ भी करने से रोकता नहीं, इसलिए ये घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

आश्चर्य की बात है कि सफाई में सख्ती और स्मार्ट सिटी के नाम पर सड़क चौड़ी करने के बहाने सैकड़ों मकान तोड़ने का साहस करने वाला प्रशासन यातायात बाधित करने वाली ट्रालियों को जब्त करने का साहस क्यों नहीं कर पाता! जब सुप्रीम कोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण पर रोक लगाने का निर्देश दिया हुआ है तो उसे रोकना स्थानीय प्रशासन का ही काम है। सही काम करने के लिए संकोच और डर कैसा? मजबूत इरादे से जनहित में किसी नेक काम की शुरुआत करने की हिम्मत जरूरी है।

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