दुनिया मेरे आगेः कसौटी पर इंसानियत

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काम करने की जगह ऐसी हो, जहां उसकी क्षमताओं में वृद्धि हो; जो उसे एक खुले मैदान जैसी लगे, न कि चारदिवारी की कैद जैसी। वहां आत्मसम्मान मिले जहां जाकर वह खुश हो। जहां जाकर उसे लगे कि वह अपने सीखे हुए का सार्थक इस्तेमाल कर सकता है और उसके किए कामों को सिर्फ उसकी जिम्मेदारी मान कर अनदेखा नहीं कर दिया जाएगा, बल्कि उसे उसका श्रेय भी मिलेगा।

जब हम अपनी बचपन की स्मृतियों में लौट कर जाते हैं तो वहां बहुत कुछ पाते हैं याद करने को। उन दिनों बीता हुआ हर दिन नया-सा था, अपने में बहुत कुछ संजोए हुए। उसमें खेल थे, रंग थे, रंगोली थी, पेड़ थे, पेड़ों की छांव थी। इमली, जंगल जलेबी, गूलर जैसे न जाने कितने फलदार पेड़-पौधे अब आधुनिकता की बलि चढ़ गए हैं। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

आशा सागर

जो लोग अस्सी के दशक में पैदा हुए वे जानते समझते हैं कि कैसे एक छोटे-से काल में हमारी पूरी संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था, मान्यताओं और चिर-परिचित वातावरण ने करवट बदल ली। जब हम अपनी बचपन की स्मृतियों में लौट कर जाते हैं तो वहां बहुत कुछ पाते हैं याद करने को। उन दिनों बीता हुआ हर दिन नया-सा था, अपने में बहुत कुछ संजोए हुए। उसमें खेल थे, रंग थे, रंगोली थी, पेड़ थे, पेड़ों की छांव थी। इमली, जंगल जलेबी, गूलर जैसे न जाने कितने फलदार पेड़-पौधे अब आधुनिकता की बलि चढ़ गए हैं। इन पेड़ों के साथ थी इनके फलों के तोड़े जाने की बहुत सारी कहानियां। या फिर कहानियां दादी और नानी की जो हर रात हमें सोने से पहले सुनने को मिलती थीं। तब बहुत सारे दोस्त होते थे, सचमुच वाले दोस्त, फेसबुक जैसे नहीं। वे हमें रोज मिलते थे। हम बहुत सारी बातें करते थे आमने-सामने बैठ कर, घंटों। तब हमें धूप नहीं चुभती थी और न ही बारिश में छाता लेकर जाने की आदत थी। ‘सनस्क्रीन’ जैसी किसी चीज के बारे में हम जानते तक नहीं थे। अपने पड़ोस के सब लोगों को जानते थे और वे सब हमें।

आज इतने सालों बाद जब हम अपने आसपास देखते हैं तो पाते हैं कि हर पल बीतता जीवन हर रोज लगभग एक जैसा ही हो गया है। नौकरी में आने से पहले नौकरी को लेकर एक अलग तरह की अवधारणा मन में होती है। नौकरी एक तमगा लगती है जो हमारे ज्ञान और हमारी क्षमता को जैसे ‘प्रमाण-पत्र’ देती है। वह हमें एक नया आयाम लगती है, जिससे हम अपनी क्षमताओं को एक नया रूप, नया आकार और नई ऊंचाई दे सकते हैं। मगर आज नौकरी के कोई आठ साल बीत जाने पर मैं यह कह सकती हूं कि वह कोई तमगा नहीं है, कोई उपलब्धि भी नहीं है। ये जीविकोपार्जन और हमारे द्वारा किए जाने वाले कुछ निश्चित क्रियाकलापों का लेखा-जोखा भर है।

इस नौकरी को और नीरस करता है वहां का वातावरण। इस वातावरण में ही जैसे कुछ अलग और अप्राकृतिक है जो वहां काम करने वालों को थोड़ा कम मानवीय बनाता है। वहां एक अलग तरह का दबाव-सा है- अदृश्य-सा, एक डर है- हमेशा पुकारे जाने का। शायद पुकारे जाने का भी नहीं, बल्कि उसके बाद कहे या सुने जाने वाले शब्दों का! शायद शब्दों का भी नहीं, बल्कि उन शब्दों को कहे जाने के लहजे का! क्या कोई भी काम, कोई भी लक्ष्य इतना जरूरी हो सकता है कि उसे करते हुए मानवीय संवेदनाओं की उपेक्षा को उचित ठहराया जा सके?

लोक प्रशासन का अध्ययन करते हुए हम अनेक सिद्धांत पढ़ते हैं जो उत्साह, सकारात्मकता, उत्पादन और कार्यक्षमता को बढ़ाने, संगठन को चलाने के न जाने कितने नियम हमें बताती है। इन सिद्धांतों को समय-समय पर कार्यशाला या सेमिनार के नाम पर हमारे आपके सामने परोसा जाता है, जहां बड़े-बड़े संवाद होते हैं, मीमांसा की जाती है, नए ढांचे बनते हैं और शुरू होती है एक नई कवायद। पर ध्यान देने वाली बात ये है कि ढांचा बदलने से नींव नहीं बदलती और न ही नींव में पड़ी दरार। काम करने वाले लोग वही रहते हैं।

लोग केवल हाड़-मांस का ढांचा भर नहीं हैं जो सिर्फ काली-पीली किताबों से मिले अपने ज्ञान के साथ किसी दफ्तर द्वारा दिए गए लक्ष्य को पूरा करने के लिए इस धरती पर आए हैं। उसे पूरा करने से आगे भी एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी हमारे ऊपर है- मानव बने रहने की जिम्मेदारी। ऊपर लोक प्रशासन के जिन सिद्धांतों की मैंने चर्चा की, उन सभी में यह अध्याय नहीं लिखा गया। काम करने की जगह सिर्फ कुछ जरूरी कहे जाने वाले कामों को पूरा करने के लिए नहीं होनी चाहिए और न ही ये केवल जीविकोपार्जन के लिए होनी चाहिए। यह एक ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां हर व्यक्ति कल के मुकाबले आज ज्यादा भरा हुआ हो। भरा हुआ होना एक भारी और महत्त्वपूर्ण शब्द है।

काम करने की जगह ऐसी हो, जहां उसकी क्षमताओं में वृद्धि हो; जो उसे एक खुले मैदान जैसी लगे, न कि चारदिवारी की कैद जैसी। वहां आत्मसम्मान मिले जहां जाकर वह खुश हो। जहां जाकर उसे लगे कि वह अपने सीखे हुए का सार्थक इस्तेमाल कर सकता है और उसके किए कामों को सिर्फ उसकी जिम्मेदारी मान कर अनदेखा नहीं कर दिया जाएगा, बल्कि उसे उसका श्रेय भी मिलेगा।
दरअसल, हम इस पूरी व्यवस्था में कहीं उत्पीड़ित हैं तो कहीं उत्पीड़क भी। तो अगली बार अपने सहयोगियों और सहकर्मियों से मिलते हुए सबसे पहले मुस्कुराना और उनका हालचाल पूछना मत भूलिएगा। हम सबकी यह कोशिश शायद इस दुनिया को रहने लायक एक बेहतर जगह बना सके। हम मनुष्य एक लंबी यात्रा पर हैं जिसमें मशाल एक से दूसरे को देने पर ही हम आगे बढ़ सकते हैं।

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