राजनीतिः बचाना होगा हिमखंडों को

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बढ़ते तापमान को रोकना आसान काम नहीं है, बावजूद इसके हम अपने हिमखंडों को टूटने और पिघलने से बचाने के उपाय औद्योगिक गतिविधियों को विराम देकर कर सकते हैं। पर्यटन के रूप में मानव समुदाय की जो आवाजाही बढ़ रही है, उस पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है। इसके अलावा वाकई हम अपनी बर्फीली शिलाओं को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो हमारी ज्ञान परंपरा में हिमखंडों की सुरक्षा के जो उपाय उपलब्ध हैं, उन्हें भी महत्त्व देना होगा।

गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान के वनाधिकारी ने इस हिमखंड के टुकड़ों के चित्रों से इसके टूटने की पुष्टि की थी। ग्लेशियर वैज्ञानिक इन घटना की पृष्ठभूमि में कम बर्फबारी होना बता रहे हैं। इस कम बर्फबारी की वजह धरती का बढ़ता तापमान बताया जा रहा है। इससे हिमखंडों में दरारें पड़ गई थीं और इनमें बरसाती पानी भर जाने से हिमखंड टूटने लग गए।

दक्षिणी धु्रव के बर्फीले अंटार्कटिका में हजारों साल से बर्फ के विशाल हिमखंड के रूप में मौजूद हिमखंड का एक भाग पिछले दिनों टूट गया। हिमखंड का टूटा हिस्सा इतना विशालकाय था कि इस पर दिल्ली, मेरठ और गाजियाबाद को बसाया जा सकता है। वैज्ञानिक इसके टूटने की भविष्यवाणी पहले ही कर चुके थे। हालांकि हिमखंडों का टूटना कोई नई बात नहीं है। इनके टूटने और बनने का क्रम चलता रहता है। लेकिन पचास साल बाद किसी हिमखंड का इतना बड़ा हिस्सा पहली बार टूटा है। इसलिए इसे जलवायु परिवर्तन की चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। यह भी इत्तेफाक है कि यह हिमखंड उस समय टूटा, जब संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण सम्मेलन कुछ दिन पहले ही संपन्न हुआ है। इसी सम्मेलन में स्वीडिश किशोरी ग्रेटा थुनबर्ग ने अपने पंद्रह साथियों के साथ पृथ्वी के बढ़ते तापमान को लेकर तीखा गुस्सा जताया था।

ऐसा माना जाता रहा है कि किसी भारी हिमखंड के टूटने की घटना के बाद ही धर्मग्रंथों में दर्ज महाप्रलय की घटना घटी थी। इस घटना को ज्यादातर लोग काल्पनिक मानते हैं, क्योंकि हमारे पास इसके चित्र या अन्य प्रमाण नहीं हैं। परंतु अब जो हिमखंड टूटा है, उसकी उपग्रह से ली गई तस्वीरें और वीडियो भी बना लिए गए हैं। टाइटैनिक जहाज भी ऐसे ही हिमखंड के टुकड़े से टकरा कर नष्ट हो गया था। ये घटनाएं चिंता का सबब बन रही हैं, जिन्हें प्रलय की चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। भारत पहले से ही हिमालय के हिमखंडों के टूटने की घटनाओं से दो-चार हो रहा है। कुछ समय पहले ही गोमुख के विशाल हिमखंड का एक हिस्सा टूट कर भागीरथी यानी गंगा नदी के उद्गम स्थल पर गिरा था। इन टुकड़ों को गोमुख से अठारह किलोमीटर दूर भागीरथी के तेज प्रवाह में बहते देखा गया।

गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान के वनाधिकारी ने इस हिमखंड के टुकड़ों के चित्रों से इसके टूटने की पुष्टि की थी। ग्लेशियर वैज्ञानिक इन घटना की पृष्ठभूमि में कम बर्फबारी होना बता रहे हैं। इस कम बर्फबारी की वजह धरती का बढ़ता तापमान बताया जा रहा है। इससे हिमखंडों में दरारें पड़ गई थीं और इनमें बरसाती पानी भर जाने से हिमखंड टूटने लग गए। अभी गोमुख हिमखंड का बायीं तरफ का एक हिस्सा टूटा है। उत्तराखंड के जंगलों में हर साल लगने वाली आग ने भी हिमखंडों को कमजोर करने का काम किया है। आग और धुएं से बर्फीली शिलाओं के ऊपर जमी कच्ची बर्फ तेजी से पिघलती चली गई। इस कारण दरारें भर नहीं पाईं।

अब वैज्ञानिक यह आशंका भी जता रहे हैं कि धुएं से बना कार्बन यदि शिलाओं पर जमा रहा तो भविष्य में नई बर्फ जमना मुश्किल होगी। यदि कालांतर में धरती पर गर्मी इसी तरह बढ़ती रही और ग्लेशियर टूटते रहे तो इनका असर समुद्र का जलस्तर बढ़ने और नदियों के अस्तित्व पर पड़ना तय है। गरमाती पृथ्वी की वजह से हिमखंडों के टूटने का सिलसिला जारी रहा तो समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा, जिससे कई छोटे द्वीप और तटीय शहर डूब जाएंगे। हालांकि वैज्ञानिक अभी तक यह निश्चित नहीं कर पाए हैं कि इन घटनाओं को प्राकृतिक माना जाए या जलवायु संकट का परिणाम माना जाए।

कुछ समय पहले आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में बताया था कि बढ़ते तापमान से बढ़े समुद्र के जलस्तर ने प्रशांत महासागर के पांच द्वीपों को जलमग्न कर दिया है। इन द्वीपों पर मानव बस्तियां नहीं थीं। दुनिया के नक्शे से गायब हुए ये द्वीप थे- केल, रेपिता, कालातिना, झोलिम और रेहना। पापुआ न्यू गिनी के पूर्व में यह सालोमन द्वीप समूह का हिस्सा थे। पिछले दो दशकों में इस क्षेत्र में समुद्र के जलस्तर में सालाना दस मिली की दर से बढ़ोत्तरी हो रही है। ग्रीनलैंड के पिघलते ग्लेशियर समुद्री जलस्तर को कुछ सालों के भीतर ही आधा मीटर तक बढ़ा सकते हैं।

शताब्दियों से प्राकृतिक रूप में हिमखंड पिघल कर नदियों की अविरल जलधारा बनते रहे हैं। लेकिन भूमंडलीकरण के बाद प्राकृतिक संपदा के दोहन पर आधारित जो औद्योगिक विकास हुआ है, उससे उत्सर्जित कार्बन ने इनके पिघलने की तीव्रता को बढ़ा दिया है। एक शताब्दी पूर्व भी हिमखंड पिघलते थे, लेकिन बर्फ गिरने के बाद इनका दायरा निरंतर बढ़ता रहता था। इसीलिए गंगा और यमुना जैसी नदियों का प्रवाह बना रहा। किंतु 1950 के दशक से ही इनका दायरा तीन से चार मीटर प्रति वर्ष घटना शुरू हो गया था। गंगोत्री के हिमखंड अब हर साल तेजी से पिघल रहे हैं। कमोबेश यही स्थिति उत्तराखंड के पांच अन्य हिमखंडों- सतोपंथ, मिलाम, नीति, नंदादेवी और चोराबाड़ी की है। भारतीय हिमालय में कुल 9975 हिमखंड हैं। इनमें नौ सौ उत्तराखंड के क्षेत्र में आते हैं। इन हिमखंडों से ही ज्यादातर नदियां निकली हैं, जो देश की चालीस प्रतिशत आबादी को पेय, सिंचाई और आजीविका के अनेक संसाधन उपलब्ध कराती हैं। लेकिन हिमखंडों के पिघलने और टूटने का यही सिलसिला बना रहा तो देश के पास ऐसा कोई उपाय नहीं है कि वह इन नदियों से जीवन-यापन कर रही पचास करोड़ आबादी को रोजगार और आजीविका के वैकल्पिक संसाधन दे सके।

बढ़ते तापमान के कारण अंटार्कटिका का हिमखंड टूटा तो अब है, लेकिन इसके पिघलने और बर्फ के कम होने की खबरें निरंतर आ रही थीं। यूएस नेशनल एंड आइस डाटा सेंटर ने उपग्रह के जरिए जो चित्र हासिल किए हैं, उनसे ज्ञात हुआ है कि एक जून 2016 तक यहां एक करोड़ दस लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बर्फ थी, जबकि 2015 में यहां औसतन एक करोड़ सत्ताईस लाख वर्ग किमी क्षेत्र में बर्फ थी। सोलह लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जो समुद्री बर्फ कम हुई है, यह क्षेत्रफल ब्रिटेनको छह बार जोड़ने के बाद बनने वाले क्षेत्रफल के बराबर है। पृथ्वी के उत्तरी धु्रव के आसपास के इलाकों को आर्कटिक कहा जाता है। इस क्षेत्र में आर्कटिक महासागर, कनाडा का कुछ हिस्सा, डेनमार्क का ग्रीनलैंड, रूस का एक हिस्सा, संयुक्त राज्य अमेरिका का अलास्का, आइसलैंड, नार्वे, स्वीडन और फिनलैंड शामिल हैं। भारत से यह इलाका 9863 किलोमीटर दूर है। रूस के उत्तरी तटीय इलाकों में समुद्री बर्फ लुप्त हो रही है। इस क्षेत्र में समुद्री गर्मी निरंतर बढ़ने से अनुमान लगाया जा रहा है कि कुछ सालों में यह बर्फ भी पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

बढ़ते तापमान को रोकना आसान काम नहीं है, बावजूद इसके हम अपने हिमखंडों को टूटने और पिघलने से बचाने के उपाय औद्योगिक गतिविधियों को विराम देकर कर सकते हैं। पर्यटन के रूप में मानव समुदाय की जो आवाजाही बढ़ रही है, उस पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है। इसके अलावा वाकई हम अपनी बर्फीली शिलाओं को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो हमारी ज्ञान परंपरा में हिमखंडों की सुरक्षा के जो उपाय उपलब्ध हैं, उन्हें भी महत्त्व देना होगा। हिमालय के शिखरों पर रहने वाले लोग आजादी के दो दशक बाद तक बरसात के समय छोटी-छोटी क्यारियां बना कर पानी रोक देते थे। तापमान शून्य से नीचे जाने पर यह पानी जम कर बर्फ बन जाता था। इसके बाद इस पानी के ऊपर नमक डाल कर जैविक कचरे से इसे ढक देते थे। इस प्रयोग से लंबे समय तक यह बर्फ जमी रहती थी और गर्मियों में इसी बर्फ से पेयजल की आपूर्ती की होती थी। इस तकनीक को हम ‘वाटर हार्वेस्ंिटग’ की तरह ‘स्नो हार्वेस्टिंग’ भी कह सकते हैं। हालांकि पृथ्वी के धु्रवों में समुद्र के खारे पानी को बर्फ में बदलने की क्षमता प्राकृतिक रूप से होती है। बहरहाल, हिमखंडों के टूटने की घटनाओं को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

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