संपादकीय: दोमुंहा रुख

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विडंबना यह है कि करतारपुर गलियारे से सिख श्रद्धालुओं को दरबार साहिब जाने की सुविधा मुहैया कराने का श्रेय लेकर पाकिस्तान जहां खुद को एक उदार देश के रूप में दुनिया के सामने पेश करना चाहता है, वहीं उसकी कोशिश शायद यह भी है कि इसी को मौका बना कर अपनी राजनीति भी साध ली जाए।

यूएनजीए में बोलते हुए इमरान खान (फोटो सोर्स: AP)

हालांकि भारत से संबंधित लगभग सभी मामलों में पाकिस्तान का रुख शायद ही कभी ऐसा रहा, जिस पर भरोसा किया जा सके, लेकिन करतारपुर गलियारे का समूचा संदर्भ जिस भावना से जुड़ा है, उसमें उम्मीद की गई थी कि उसकी ओर से ऐसा कुछ न हो जो सुधरने वाले माहौल को बाधित कर दे। खासतौर पर आज करतारपुर गलियारे की शुरुआत होने के ठीक पहले जो बातें सामने आ रही हैं, वे कतई इस बात की पुष्टि नहीं करतीं कि पाकिस्तान इस मौके को संबंध सुधार का कोई जरिया बनाना चाहता। वरना यह कैसे मुमकिन है कि एक ओर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का बयान आता है कि करतारपुर में दरबार साहिब की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों को पासपोर्ट की जरूरत नहीं होगी, केवल वैध पहचान-पत्र ही काफी होगा, तो अगले ही दिन उसकी सेना की ओर से कहा जाता है कि श्रद्धालुओं के लिए पासपोर्ट जरूरी होगा। क्या इसे पाकिस्तान के अपने वादे से मुकरने के तौर पर देखा जाए या फिर यह एक गंभीर स्थिति का संकेत है कि वहां सरकार के नुमाइंदों और सेना के बीच अंतरराष्ट्रीय मसलों पर भी कोई तालमेल नहीं है!

एक देश के नागरिकों का दूसरे देश की सीमा में प्रवेश का एक कायदा है और वह सख्त नियमों में बंधा होता है। भारत-पाकिस्तान के बीच फिलहाल यह व्यवस्था है कि दोनों देशों के नागरिकों के सीमापार जाने के लिए लिए पासपोर्ट और वीजा अनिवार्य है। करतारपुर में दरबार साहिब की यात्रा के लिए इस बात पर सहमति बनी थी कि वहां जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए फिलहाल वीजा की जरूरत नहीं होगी। लेकिन पासपोर्ट को लेकर स्थिति स्पष्ट थी और उस पर एकतरफा तरीके से फैसला नहीं लिया जा सकता था। हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ट्विटर पर यह घोषणा कर दी कि करतारपुर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पासपोर्ट की बाध्यता नहीं होगी। हो सकता है कि यह दिखावा ही सही, सद्भावना के लिहाज से की गई घोषणा हो, लेकिन इसके पहले यह सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिए था कि इस मसले पर सेना और सरकार के बीच पूरी सहमति हो और किसी घोषणा से पहले पर्याप्त तालमेल कायम हो जाए। ऐसा नहीं होने की वजह से ही अब पाकिस्तान की सरकार के सामने एक असुविधाजनक और असहज स्थिति आ खड़ी हुई कि पासपोर्ट को लेकर वह अपनी पूर्व घोषणा का क्या करे! जाहिर है, ऐसी स्थिति में अंतिम तौर पर समझौते की शर्तें ही लागू होंगी और एक तरह से यह पाकिस्तान सरकार के अपनी घोषणा से मुकरने के तौर पर देखा जाएगा।

विडंबना यह है कि करतारपुर गलियारे से सिख श्रद्धालुओं को दरबार साहिब जाने की सुविधा मुहैया कराने का श्रेय लेकर पाकिस्तान जहां खुद को एक उदार देश के रूप में दुनिया के सामने पेश करना चाहता है, वहीं उसकी कोशिश शायद यह भी है कि इसी को मौका बना कर अपनी राजनीति भी साध ली जाए। मगर दो दिन पहले करतारपुर आने के लिए तैयार किए गए एक प्रचार-गीत में कुछ खालिस्तानी अलगाववादी रहे लोगों की तस्वीरें दिखाई गई या फिर अब झूठ पर आधारित कई बातें प्रचारित की जा रही हैं, उससे साफ है कि वह करतापुर गलियारे के बहाने अपनी मनमानी चलाने की फिराक में है। पिछले कुछ दिनों के दौरान पाकिस्तान की ओर से जिस तरह के बयान सामने आए हैं, ऐसा लगता है कि उसके पीछे कोई सुविचारित योजना नहीं है। जबकि उसे इस बात का खयाल रखना चाहिए कि उसकी ऐसी गैरजिम्मेदाराना और लापरवाह हरकतों की वजह से एक गैरभरोसेमंद देश के रूप में उसकी कैसी छवि बनेगी!

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