संपादकीय: सत्ता और सवाल

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विवाद का केंद्र बिंदु इसी बात को लेकर है कि ढाई साल भाजपा राज करे और बाकी के अगले ढाई साल शिवसेना। लेकिन भाजपा ने इससे साफ इनकार कर दिया है, जबकि शिवसेना इससे कम पर मानने को तैयार नहीं है।

महाराष्ट्र में सीएम की कुर्सी को लेकर शिवसेना और बीजेपी में तनातनी

महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन को लेकर दो हफ्ते से जिस तरह का गतिरोध चल रहा है, वह लोकतंत्र व्यवस्था के लिए किसी आघात से कम नहीं है। चुनाव नतीजे आने के बाद भी सरकार का गठन नहीं हो पाना हैरान करने वाला घटनाक्रम है। ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री रहने को लेकर भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना जिस तरह से अपने-अपने रुख पर अड़ गए हैं, उससे यह तो साफ है कि जो दल अभी से ही इतने गंभीर विवाद में उलझ गए हैं, अगर वे सरकार बना भी लेते हैं तब भी क्या तो वे सरकार चलाएंगे और किस तरह का प्रशासन लोगों को देंगे। निर्वाचित सरकार का दायित्व जनता की सेवा करना है, उसके लिए कल्याण योजनाएं चलाना है, लेकिन जो दल सरकार बनाने के मुद्दे पर किसी सहमति पर नहीं पहुंच पा रहे हैं, उनसे ये उम्मीदें करना व्यर्थ ही है। महाराष्ट्र में विधानसभा के लिए 21 अक्तूबर को वोट पड़े थे और 24 अक्तूबर को नतीजे आए थे। उसके बाद से ही राज्य की जनता नई सरकार की उम्मीदें लगाए बैठी है, लेकिन मौजूदा हालात बता रहे हैं कि नई सरकार बनने के फिलहाल कोई आसार नहीं है और राज्य एक बार फिर से राष्ट्रपति शासन देखने को मजबूर हो सकता है। सवाल है कि जिन दलों को जनता ने सरकार बनाने के लिए जनादेश दिया है, वे आखिर क्यों अपनी जिद पर अड़े हुए हैं? क्या इसे मतदाताओं के साथ विश्वासघात नहीं माना जाना चाहिए?

विवाद का केंद्र बिंदु इसी बात को लेकर है कि ढाई साल भाजपा राज करे और बाकी के अगले ढाई साल शिवसेना। लेकिन भाजपा ने इससे साफ इनकार कर दिया है, जबकि शिवसेना इससे कम पर मानने को तैयार नहीं है। दोनों ने साथ मिल कर चुनाव लड़ा, इसलिए सरकार भी इस महायुति की ही बननी है। पर बने कैसे, यह दोनों दलों के लिए नाक का सवाल बन गया है। न तो भाजपा झुकने को तैयार है, न ही शिवसेना टस से मस हो रही है। शिवसेना का कहना है कि सहमति यही बनी थी कि दोनों दलों से ढाई-ढाई साल का मुख्यमंत्री बनेगा। पर भाजपा इसे झूठ करार दे रही है कि ऐसी कोई सहमति बनी थी। ऐसे में कौन सच बोल रहा है, कौन झूठ, तय कर पाना आसान नहीं है। शिवसेना का तर्क है कि वह जितनी सीटों पर लड़ी है और जितने उम्मीदवार उसके जीते हैं उसके हिसाब से उसकी शक्ति भाजपा से कहीं कम नहीं है और ऐसे में सत्ता में बराबर की भागीदारी का उसका हक बनता है। सत्ता के लिए राजनीतिक दल किस सीमा तक जा सकते हैं और किस स्तर तक गिर सकते हैं, इसे लेकर लोगों में जो धारणा बन रही है, वह गंभीर विषय है।

इस वक्त जो हालात हैं, उसमें राष्ट्रपति शासन ही एकमात्र विकल्प बचता है। अगर ऐसा होता है तो महाराष्ट्र के इतिहास में यह तीसरा मौका होगा जब वहां राष्ट्रपति राज होगा। राज्यपाल तमाम कानूनी पहलुओं और विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, लेकिन कोई भी प्रयास कामयाब नहीं हो नहीं रहा। इस बीच शिवसेना ने अपने विधायकों को एक होटल में रख दिया है ताकि कोई भी विधायक किसी दूसरे दल का हाथ न थाम ले। इससे विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंकाओं को भी बल मिलता है। ये सब घटनाएं बता रही हैं कि राज्य राजनीतिक अनिश्चितता के भंवर में फंस चुका है। ऐसे में जनता अपने को ठगा-सा महसूस कर रही है।

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