गुजरात का आतंक निरोधक कानून: सुरक्षा एजेंसियां की टैपिंग अब कोर्ट में सबूत! विवादास्पद कानून को राष्ट्रपति ने दी मंजूरी

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विधेयक में सबसे विवादास्पद प्रावधान के तहत जांच एजेंसियां ‘मौखिक’, वायर या इलेक्ट्रॉनिक बातचीत में अवरोध कर सकती हैं और उन्हें अदालत में सबूत के रूप में पेश कर सकती हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: November 6, 2019 9:29 AM
गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने एक विवादास्पद आतंकवाद निरोधक कानून ‘गुजरात आतंकवाद और संगठित अपराध नियंत्रण (जीसीटीओसी) विधेयक’ को अपनी अनुमति दे दी। भाजपा शासित इस राज्य में इस विधेयक को मार्च 2015 में पारित किया गया था। इस नए अधिनियम की प्रमुख विशेषताओं में से एक यह है कि टैप की हुई टेलीफोन बातचीत को अब एक वैध सबूत माना जाएगा। मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के नेतृत्व वाली सरकार में गृह राज्यमंत्री प्रदीप सिंह ने गांधीनगर में मंगलवार (5 नवंबर, 2019) को इस विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के संबंध में घोषणा की।

उन्होंने कहा, ‘आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना पूरा हो गया है।’ पहले इस विधेयक को गुजरात संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक (जीयूजेसीओसी) नाम दिया गया था। साल 2003 से, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे, इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिल पा रही थी। गुजरात सरकार 2015 में इस विधेयक को फिर लेकर आई और इसका नाम बदलकर जीसीटीओसी किया गया लेकिन पुलिस को टेलीफोन बातचीत टैप करने और सबूत के तौर पर उसे अदालत में सौंपने जैसे विवादास्पद प्रावधानों को इसमें बनाए रखा।

जडेजा ने कहा कि विधेयक के प्रावधान आतंकवाद और संगठित अपराधों से निपटने में महत्वपूर्ण साबित होंगे। जडेजा ने कहा, ‘इस विधेयक की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक टेलीफोन बातचीत को अब वैध सबूत समझा जाएगा। इस विधेयक में एक विशेष न्यायालय के निर्माण के साथ-साथ विशेष सरकारी अभियोजकों की नियुक्ति का भी प्रावधान है। अब हम संगठित अपराधों के माध्यम से अर्जित संपत्तियों को कुर्क कर सकते हैं। हम संपत्तियों के हस्तांतरण को भी रद्द कर सकते हैं।’

बता दें कि विधेयक में सबसे विवादास्पद प्रावधान के तहत जांच एजेंसियां ‘मौखिक’, वायर या इलेक्ट्रॉनिक बातचीत में अवरोध कर सकती हैं और उन्हें अदालत में सबूत के रूप में पेश कर सकती हैं। (भाषा इनपुट)

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