संपादकीयः ताक पर सुरक्षा

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तेलांगाना राज्य के अब्दुल्लापुरपेट में तहसीलदार विजया रेड्डी दोपहर को जब अपने दफ्तर में अकेले काम कर रही थीं, उस समय एक व्यक्ति ने उन पर पेट्रोल डाल कर आग लगा दी। उनकी मौके पर ही उनकी मौत हो गई और उन्हें बचाने की कोशिश में उनका कार चालक भी बुरी तरह झुलस गया।

किसी अफसर के खिलाफ इस तरह के अपराध को आसानी से अंजाम दिया जा सकता है तो साधारण लोग कितने सुरक्षित होंगे? क्या आम लोग ऐसे अपराधों की चपेट में आने से इसलिए बच जाते हैं कि वे अपराधियों के निशाने पर नहीं होते?

तेलंगाना में एक महिला अधिकारी को जिंदा जला देने की जैसी घटना सामने आई है, वह दहला देने वाली है। राज्य के अब्दुल्लापुरपेट में तहसीलदार विजया रेड्डी दोपहर को जब अपने दफ्तर में अकेले काम कर रही थीं, उस समय एक व्यक्ति ने उन पर पेट्रोल डाल कर आग लगा दी। उनकी मौके पर ही उनकी मौत हो गई और उन्हें बचाने की कोशिश में उनका कार चालक भी बुरी तरह झुलस गया। बाद में उसकी भी मौत हो गई। खबरों के मुताबिक फिलहाल यही वजह सामने आई है कि आरोपी व्यक्ति संपत्ति विवाद को सुलझाने के क्रम में तहसील कार्यालय में गया था। लेकिन किसी अधिकारी के दफ्तर में घुस कर आसानी से पेट्रोल डाल कर आग लगा देने की घटना से यही साफ होता है कि वहां सुरक्षा-व्यवस्था के स्तर पर किस कदर लापरवाही बरती गई थी। सवाल है कि जब किसी अफसर के खिलाफ इस तरह के अपराध को आसानी से अंजाम दिया जा सकता है तो साधारण लोग कितने सुरक्षित होंगे? क्या आम लोग ऐसे अपराधों की चपेट में आने से इसलिए बच जाते हैं कि वे अपराधियों के निशाने पर नहीं होते?

हैरानी की बात यह है कि तहसील स्तर के कार्यालय में ड्यूटी पर तैनात अफसर के कक्ष में किसी भी काम से जाने वाले व्यक्ति के अलावा कोई सुरक्षाकर्मी या अन्य कर्मचारी नहीं था। गौरतलब है कि जब महिला अधिकारी को आग लगाई गई तो कक्ष को अंदर से बंद कर दिया गया था, जिसे वे किसी तरह खोलने में कामयाब रहीं। बाहर कुछ लोगों को बाद में पता चला और अधिकारी का ड्राइवर और एक अन्य कर्मचारी बचाने की कोशिश में दौड़े। यह किस तरह की व्यवस्था है कि जिस दफ्तर में संपत्ति विवाद जैसी संवेदनशील समस्याओं के हल के लिए आम लोगों का आना-जाना हो, और वहां कोई सुरक्षाकर्मी मौजूद नहीं हो? जबकि हाल के दिनों में आम लोगों के बीच हिंसक और अराजक हो जाने के कई मामले सामने आ चुके हैं और उसमें अधिकारियों को निशाना बनाया गया। करीब चार महीने पहले तेलंगाना के कोमराम भीम आसिफाबाद में एक महिला वन अधिकारी जब अतिक्रमण हटाने गई थीं तो स्थानीय लोगों ने उन पर हमला कर दिया था। इस तरह की घटनाओं के बावजूद अगर किसी दफ्तर में सुरक्षा-व्यवस्था के मामले में लापरवाही बरती जाती है तो इसकी जिम्मेदारी किस पर आनी चाहिए?

विडंबना यह है कि हाल के वर्षों में आम लोगों के बीच प्रतिक्रिया के तौर-तरीके में कई बार विवेक का अभाव देखा जा रहा है। इस बात की पहचान किए जाने की जरूरत है कि आखिर लोगों के व्यवहार में इस तरह की आक्रामकता और धीरज का अभाव क्यों सामने आ रहा है। क्या शासन-तंत्र और उससे जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के कामकाज का तौर-तरीका ऐसा है जिसमें लोगों की जरूरतों और अपेक्षाओं के मुताबिक कुछ सुधार या बदलाव किए जाने की जरूरत है? या फिर लोगों के बीच प्रशासनिक कामकाज की जटिलताओं को लेकर जागरूकता की कमी है और वे बेवजह ही आक्रामक और हिंसक हो रहे हैं? अगर इस तरह की समस्याएं हैं तो सरकार और शासन को इसमें सुधार करने या नए तौर-तरीके विकसित करने की जरूरत है। लेकिन इससे ज्यादा जरूरी यह है कि हर स्तर पर सुरक्षा-व्यवस्था को चाक-चौबंद किया जाए, ताकि अगर कभी कोई व्यक्ति, समूह या भीड़ किन्हीं स्थितियों में बेलगाम और अराजक होकर हिंसा करने पर उतारू हो तो समय रहते उसे रोका जा सके। वरना जब किसी कार्यालय में एक महिला तहसीलदार को जिंदा जला दिया जा सकता है तो इससे खराब स्थिति और क्या हो सकती है!

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