चौपालः डाटा की सुरक्षा

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सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल दरअसल कुछ लोग सरकार, व्यक्तियों और संस्थानों को अपनी पसंद और नापसंद के आधार पर बेलगाम आलोचना के लिए भी करने लगे हैं जिसमें कई बार बिना तथ्यों की तह में गए किसी भी मुद्दे पर ट्रोल या गालीगलौज तक की जाने लगी है।

सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल दरअसल कुछ लोग सरकार, व्यक्तियों और संस्थानों को अपनी पसंद और नापसंद के आधार पर बेलगाम आलोचना के लिए भी करने लगे हैं जिसमें कई बार बिना तथ्यों की तह में गए किसी भी मुद्दे पर ट्रोल या गालीगलौज तक की जाने लगी है।

दुनिया भर में सोशल नेटवर्किंग साइट के प्रसार ने लोगों को अभिव्यक्ति का जो मंच दिया है, उसका निरंतर दुरुपयोग हो रहा है। उपयोगकर्ताओं के डाटा लीक होने और निजी अधिकार हनन की तेजी से बढ़ती घटनाएं सरकारों, समाज, जांच एजेंसियों सभी के लिए चिंता का विषय बनती जा रही हैं। सोशल नेटवर्किंग साइटों के व्यावसायीकरण, जासूसी और अनियंत्रित व्यक्तिगत निंदा अभियान से भारत भी अछूता नहीं रहा है। सरकार के स्तर पर चिंतन होने लगा है कि किस तरह इन सोशल नेटवर्किंग कंपनियों को नियमन के द्वारा नियंत्रित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट भी इस संदर्भ में कई बार अपनी चिंता जाहिर कर चुका है।

सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल दरअसल कुछ लोग सरकार, व्यक्तियों और संस्थानों को अपनी पसंद और नापसंद के आधार पर बेलगाम आलोचना के लिए भी करने लगे हैं जिसमें कई बार बिना तथ्यों की तह में गए किसी भी मुद्दे पर ट्रोल या गालीगलौज तक की जाने लगी है। इससे सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति की साख प्रभावित होती है। इससे व्यक्ति के निजता के अधिकार का भी हनन होता है। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के फोन टैपिंग मामले में टिप्पणी करते हुए कहा भी है कि किसी के लिए निजता बची कहां है।

जाहिर है, निजता हनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट लगातार चिंता व्यक्त कर रहा है, लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइटें इससे बेपरवाह नजर आती हैं। सर्वोच्च अदालत ने 2017 में ही कह दिया था कि निजता मूल अधिकार है। निजता की रक्षा और डेटा संरक्षण को लेकर सरकार ने 2017 में एक विशेषज्ञ समिति भी बनाई थी। इस समिति ने एक साल के भीतर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी।

इस कमेटी की प्रमुख सिफारिशों में निजी डेटा जमा करने और उसकी प्रोसेसिंग पर प्रतिबंध, राज्य के कामकाज के लिए निजी डेटा की प्रोसेसिंग, भुलाए जाने के अधिकार, डाटा लोकलाइजेशन, संवेदनशील निजी डेटा की प्रोसेसिंग के लिए स्पष्ट सहमति, डाटा संरक्षण प्राधिकार, आधार और आरटीआइ एक्ट में संशोधन जैसे मुद्दों पर विचार करते हुए सुझाव दिए हैं। अब यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह डाटा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर इस समिति की सिफारिशों को कानून की शक्ल देकर कितनी जल्द निजता के अधिकार को कानूनी जामा पहनाती है।
’बिजेंद्र कुमार, आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विवि

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