चौपालः कुर्सी का मोह

digamberbisht

शिवसेना ने मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वाकई ये उन्हीं बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना पार्टी है जिन्होंने अपने खून-पसीने से इसे खड़ा किया था और कहा था कि हम कभी कुर्सी का मोह नही करेंगे।

महाराष्ट्र में सीएम की कुर्सी को लेकर शिवसेना और बीजेपी में तनातनी

महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के बीच चल रही रार थमती नजर नहीं आ रही है। यह दोनों दलों की महत्त्वाकांक्षा ही है कि चुनाव नतीजे आए हफ्ते भर से ज्यादा हो चुका है, लेकिन अभी तक मुख्यमंत्री तय नहीं हो पाया है। सत्ता लोलुपता का ये जीता-जागता उदाहरण है। दोनों दलों ने ठान लिया है कि कुर्सी के लिए अगर जनता पिस रही है तो पिसने दिया जाए, हमारी कुर्सी बची रहनी चाहिए। ढाई-ढाई साल के फार्मूले का नियम लेकर शिवसेना ने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है, क्योंकि चुनाव से पहले उसने जनता से वादा किया था कि हम सिर्फ देश और जनता के लिए काम करेंगे।

लेकिन अब शिवसेना ने मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वाकई ये उन्हीं बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना पार्टी है जिन्होंने अपने खून-पसीने से इसे खड़ा किया था और कहा था कि हम कभी कुर्सी का मोह नही करेंगे। हमारे साथ गठबंधन वाली पार्टी को हमारी शर्तें भी माननी पड़ेंगी। लेकिन आज की शिवसेना का तो रंग ही कुछ और है।

आज इन दोनों पार्टियों का जनाधार एक जैसा ही है। शिवसेना को डर सता रहा है कि कहीं भाजपा उसके वोट बैंक को निगल न ले। शिवसेना को लगता है कि वह भाजपा के खिलाफ जितनी मुखर होगी, उसका वोट बैंक उतना ही बढ़ेगा। शिवसेना अगर शरद पवार से हाथ मिलाती है तो वह अपनी हिंदुत्व वाली छवि खो देगी और जनता की नजरों में गिर जाएगी।
’ब्रजेश सैनी, फतेहपुर (उप्र)

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