संपादकीयः घाटी में आतंक

digamberbisht

पिछले तीन महीने में घाटी में जिस तरह से घटनाक्रम बदले हैं, उसमें अभी तक जनजीवन सामान्य नहीं हो पाया है। उम्मीद की जा रही थी कि अनुच्छेद 370 के खात्मे और राज्य को विभाजित कर दो केंद्र शासित प्रदेश बना देने के बाद आतंकियों की कमर टूट जाएगी। लेकिन पिछले एक महीने में घाटी में जिस तरह से ट्रक ड्राइवरों को मारा गया और सुरक्षा बलों पर हमले हुए हैं, उनसे ये दावे हवा हो गए हैं।

इस वक्त घाटी में ज्यादातर धंधे ठप पड़े हैं। कश्मीर में पिछले तीन महीने के दौरान दस हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कारोबारी नुकसान हो चुका है। ले-देकर कुछ उम्मीदें सेब व्यापारियों को बनी थीं और सरकार ने कारोबारियों को पूरी सुरक्षा मुहैया कराने का भरोसा भी दिया था। लेकिन कारोबारी हों या आमजन, सब असुरक्षित ही हैं।

कश्मीर में आम लोगों और प्रवासी मजदूरों पर बढ़ते आतंकी हमले गंभीर चिंता का विषय हैं। ये हमले बता रहे हैं कि सेना, सुरक्षा बल, स्थानीय पुलिस और प्रशासन सब आतंकियों के आगे बौने साबित हो रहे हैं और आतंकियों का नेटवर्क घाटी में दहशत पैदा करने में कामयाब होता जा रहा है। सोमवार को आतंकियों ने एक बार फिर श्रीनगर के व्यस्त बाजार में हथगोले से हमला कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई और अड़तीस लोग घायल हो गए। कश्मीर में पिछले एक महीने में यह पांचवां आतंकी हमला है। इस दौरान आतंकियों ने हथगोलों से जितने हमले किए हैं उनमें सरकारी दफ्तरों और सुरक्षा बलों को ही निशाना बनाया गया है। इसके अलावा आतंकियों ने प्रवासी कामगारों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है। ये हमले बता रहे हैं कि आतंकी अपनी रणनीति कामयाब हो रहे हैं और इसका असर नजर आने भी लगा है।

लंबे समय से घाटी में काम कर रहे कामगारों ने घाटी छोड़नी शुरू कर दी है। पश्चिम बंगाल के एक सौ अड़तीस मजदूर तो अपने घरों को लौट गए हैं। भले सेना आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाने के दावे कर रही हो, लेकिन हकीकत यह है पिछले एक दशक में आतंकियों ने गांव-गांव तक गहरी पैठ बना ली है और उनका खुफिया तंत्र भी काफी मजबूत है। इसीलिए आतंकियों की पहचान कर पाना आसान काम नहीं है।

पिछले तीन महीने में घाटी में जिस तरह से घटनाक्रम बदले हैं, उसमें अभी तक जनजीवन सामान्य नहीं हो पाया है। उम्मीद की जा रही थी कि अनुच्छेद 370 के खात्मे और राज्य को विभाजित कर दो केंद्र शासित प्रदेश बना देने के बाद आतंकियों की कमर टूट जाएगी। लेकिन पिछले एक महीने में घाटी में जिस तरह से ट्रक ड्राइवरों को मारा गया और सुरक्षा बलों पर हमले हुए हैं, उनसे ये दावे हवा हो गए हैं। जाहिर है, आतंकियों की रणनीति अब व्यापारियों और बाहर के लोगों पर हमले की है। इस वक्त घाटी में ज्यादातर धंधे ठप पड़े हैं। कश्मीर में पिछले तीन महीने के दौरान दस हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कारोबारी नुकसान हो चुका है। ले-देकर कुछ उम्मीदें सेब व्यापारियों को बनी थीं और सरकार ने कारोबारियों को पूरी सुरक्षा मुहैया कराने का भरोसा भी दिया था। लेकिन कारोबारी हों या आमजन, सब असुरक्षित ही हैं।

बागों में सेब सड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें उठाने और मंडियों तक पहुंचाने का पुख्ता इंतजाम नहीं है। दहशतगर्दों ने जिस तरह ट्रक ड्राइवरों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है, उससे तो व्यापारियों के लिए और ज्यादा मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। इस समय कश्मीर में सेना और सुरक्षा बलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती आतंकियों के खात्मे की है। जब तक गांव-गांव में फैला आतंकियों का नेटवर्क तोड़ा नहीं जाएगा, आतंकियों का सफाया नहीं होगा। हालांकि इन दिनों जो आतंकी हमले हो रहे हैं, वे एक तरह से आतंकी संगठनों की हताशा का नतीजा भी हैं।

पिछले दिनों सेना ने जिन आतंकियों को पकड़ा है, उनकी निशानदेही पर कुछ आतंकी ठिकानों को नष्ट भी किया है। आतंकियों ने भूमिगत ठिकाने बना रखे हैं। ऐसे में इनका सुराग तभी मिल पाता है जब कोई आतंकी पकड़ में आता है और वह इनके बारे में जानकारी देता है। घाटी के ज्यादातर जिलों में खेतिहर मजदूर प्रवासी ही हैं जो लंबे समय से वहां काम कर रहे हैं। सवाल यह है कि अगर आतंकी हमलों के खौफ से कामगार घाटी छोड़ने लगेंगे तो कारोबार कैसे चलेगा।

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