जन्नत से दूर और सपनों के करीब

digamberbisht

हर युवा का अपना संघर्ष होता है, पढ़ाई-लिखाई और करिअर बनाने का रास्ता आसान नहीं होता। बेहतर शिक्षा के लिए अपने घरों को छोड़ना पड़ता है। इस बार हम बात कर रहे हैं उस जमीन से जुड़ी युवाओं से जिसे धरती के स्वर्ग का खिताब मिला है। किस तरह अपने सपने पूरे करने की तैयारियों में जुटी हैं कश्मीर की लड़कियां।

कश्मीरी लड़कियों को बाहर निकलने पर कई परेशानियां झेलनी पड़ती हैं।

मीना

दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया से एमफिल कर रहीं सफुरा कहती हैं कि दिल्ली मेरे लिए घर जैसा है। कश्मीर से बाहर निकले हुए 14 साल हो गए, लेकिन अब तीज-त्योहार पर या फिर किसी खास मौके पर वहां जाती रहती हूं। सफुरा कहती हैं कि मैं शक्ल से दिखने में कश्मीरी नहीं लगती हूं, पर मेरी जो बाकी सहेलियां हैं वे वैसी दिखती हैं। उन्हें कई बार अपने रंग-रूप की वजह से ‘टार्गेटेड’ होना पड़ता है। मूल रूप से किश्तवाड़ की रहने वाली सफुरा कहती हैं कि दूसरे राज्य में जाने का मतलब हमारे लिए ‘कल्चरल शॉक’ हो जाता है। अपनी एक जैसी भाषा, जमीन और खाने को छोड़कर बाहर निकलना हमारे लिए सबसे बड़ी दिक्कत होती है। सफुरा कहती हैं कि कश्मीरी लड़कियों को बाहर निकलने पर अपने चेहरे, रूप, रंग और भाषा की वजह से परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। जब वे यहां आती हैं तब उन्हें मौसम के बदलने से, जनसंख्या का ज्यादा होना जैसी समस्याएं झेलनी पड़ती हैं।

सफुरा कहती हैं कि जब लड़कियां कश्मीर से बाहर निकलती हैं तो उन्हें आजादी मिलती है जिसे वे एंजॉय करती हैं। वे महसूस करती हैं कि कश्मीर में लड़कियां अपने घरों में मूव भी नहीं कर सकती हैं। पर यहां आप रात में 12 बजे घूमो, पब में जाओ या इंडिया गेट जाओ…कहीं भी घूमो, कोई रोकने वाला नहीं है। पर कश्मीर में आप एक किलोमीटर भी बाहर निकलती हैं तो आपसे दस सवाल पूछे जाते हैं। वहां के हालात के कारण शाम छह बजे के बाद घर से बाहर नहीं निकल सकतीं। वैसे कश्मीर लड़कियों की स्वतंत्रता को लेकर बहुत प्रगतिशील हैं। लोग वहां लड़कियों को पढ़ाना चाहते हैं। यहां तक अब वहां के बकरवाल और गुर्जर समुदाय की लड़कियां भी कई किलोमीटर तक पढ़ने जाती हैं। कश्मीर का शैक्षिक ग्राफ बढ़ा है।

सफुरा बताती हैं कि कश्मीर में सुबह नमकीन चाय पी जाती है और यहां मीठी। वहां पोहा नाश्ते में नहीं खाया जाता। यहां तक कि मैं जब पहली बार जामिया पढ़ने आई थी तब कैंटीन में नाश्ते में पोहा मिला था। मैं देखकर समझ ही नहीं पा रही थी कि ये क्या है। पर धीरे-धीरे सब चीजों को समझा। किश्तवाड़ के अपने अनुभवों को साझा करते हुए सफुरा कहती हैं कि वहां सब कुछ घर में बनाया जाता है। वाटर सिस्टम है। वहां रोज शाम में रोज रिश्तेदार आते रहते थे, अपनापन लगता था। अब सबको याद करती हूं। सफुरा कहती हैं कि मैं वो अपनापन छोड़ना नहीं चाहती और कश्मीर वापस जाना चाहती हूं। सफुरा यह भी कहती हैं कि कश्मीर की लड़कियां पढ़ना चाहती हैं लेकिन परिस्थितियां उनके अनुकूल नहीं होतीं। तो ऐसी जगहों से जब लड़कियां बाहर निकलती हैं तो उनके दिमाग में वो संघर्ष रहता है। तो ऐसे में मुझे लगता है कि जब लड़कियां कश्मीर से बाहर निकलती हैं तो हालात सामान्य मिलते हैं। हमें थोड़े समय बाहर आने का जो समय मिला है उससे अनुभव लेते हैं। उस वक्त को जीते हैं। खुद को पहचानते हैं। विवादास्पद जगहों से निकली लड़कियों के लिए कई बार बाहर निकलना अच्छा लगता है। क्योंकि वो बाहर निकलकर ही पढ़ सकती हैं। उन्हें कुछ समय के लिए यहां की अपनी सामान्य जिंदगी को बेहतर तरीके से जीना चाहिए।

छब्बीस साल की रूही, केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब से एलएलएम कर रही हैं। वे कहती हैं कि कश्मीर से बाहर लोगों ने भ्रांतियां पाल रखी हैं कि वहां की लड़कियां पढ़ती नहीं हैं। लेकिन हमें ये कभी नहीं लगा कि कश्मीर में लड़कियों को बहुत बांध कर रखा गया हो। हम खुद चार बहनें हैं और उनमें से कुछ सरकारी नौकरी कर रही हैं तो कुछ पढ़ रही हैं। आपको जीवनसाथी चुनने की आजादी, आपकी अपनी आजादी, कश्मीर में रहना चाहो या नहीं रहना चाहो, संपत्ति का मामला हो, सभी में उन्हें आजादी है। मैं खुद एक कानून की छात्रा हूं, तो मैंने खुद अदालत में जाकर दो-तीन महीने प्रैक्टिस की है। तो हमने वहां भी ऐसा महसूस नहीं किया कि आपको काम नहीं करने दिया जा रहा है या आपके एक महिला होने के नाते जितने भी अधिकार हैं सब रख लिए जाते हैं। ये हर परिवार पर निर्भर करता है कि कैसे कोई अपने परिवार में लड़कियों को ट्रीट करता है। पर बतौर कश्मीरी मैं ये कहूंगी कि कश्मीरी लड़की के पास बहुत आजादी है। वो कहती हैं कि अगर कश्मीर में लड़कियों को आजादी नहीं होती तो आज मैं बाहर पढ़ नहीं रही होता। वे कहती हैं कि कश्मीर में कुछ तत्त्वों की वजह से हमें पढ़ने के लिए बाहर निकलना पड़ता है। बाकी कोई भी अपने रिश्तेदार, घर-परिवार को छोड़ना नहीं चाहता। साथ ही रूही कहती हैं कि पंजाब के लोग भी बहुत सपोर्टिव हैं। यहां पढ़ने-लिखने में हमें कोई दिक्कत नहीं होती।

रिया कश्मीरी पंडित हैं और अभी स्नातक की पढ़ाई पूरी की है। वे कहती हैं कि हम कश्मीरी प्रवासी हैं। जब मैं पैदा हो गई थी तब हम नोएडा आ गए थे। रिया बताती हैं कि जब वे अपने दादा-दादी से कश्मीर के बारे में सुनती हैं तो पता चलता है अब कश्मीर बहुत बदल गया है। जैसा कश्मीर उनके समय में था अब वैसा नहीं है। वे कहती हैं कि आज अगर मुझसे कोई पूछता है कि आप कहां से हो और मैं कहती हूं कश्मीर से तो लोगों का जवाब होता है कि अच्छा आप कश्मीरी मुसलिम हो। ऐसे में रिया का सवाल होता है कि क्यों कश्मीर सुनने पर आपको कश्मीरी पंडित नहीं बोला जाता। रिया मानती हैं कि जितनी अपनी आजादी का आनंद मैं उठा पाती हूं वैसे कश्मीर की बेटियां नहीं उठा पातीं।

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