चौपाल: बेमानी सोच

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कानूनी प्रक्रिया में देर क्यों होती है, इस देरी को कैसे खत्म किया जाए, इस पर सांसदों को मंथन करना चाहिए। केवल कानून कड़ा कर देने और विरोध प्रदर्शनों से पुरुषों की हैवानियत नहीं रुकने वाली।

जया बच्चन के साथ ही विभिन्न दलों के राजनेताओं ने इस घटना की निंदा की। (फोटोः वीडियो स्क्रीनशॉट)

सांसद और विधायक सिर्फ जनप्रतिनिधि ही नहीं होते, वे नियम बनाने वाले और देश चलाने वाले भी होते हैं। इसलिए उन्हें अपना हर वक्तव्य काफी सोच-समझ कर देना चाहिए। राज्यसभा सांसद जया बच्चन ने सोमवार को संसद में यह कहा कि जिन्होंने हैदराबाद की पशु चिकित्सक से बलात्कार कर उसे जला दिया, उनका मॉब लिंचिंग कर दिया जाना चाहिए। सही है कि जया बच्चन क्रोधित थीं, इसलिए ऐसा कह दिया होगा। मगर उन्हें मॉब लिंचिंग में लगे लोगों की तरह का जैसा बयान देने से बचना चाहिए था। क्या उन्हें नहीं मालूम यह देश कानून और संविधान के प्रावधानों से चलता है? ऐसे में तो अजमल कसाब को भी तुरंत मार देना चाहिए था! मगर ऐसा नहीं किया गया। हमारा देश कोई मध्ययुगीन बर्बरता वाला समाज नहीं है।

हां, कानूनी प्रक्रिया में देर क्यों होती है, इस देरी को कैसे खत्म किया जाए, इस पर सांसदों को मंथन करना चाहिए। केवल कानून कड़ा कर देने और विरोध प्रदर्शनों से पुरुषों की हैवानियत नहीं रुकने वाली। शिक्षा और संपन्नता का विस्तार से भी यह नहीं रुकने वाला है। इसे रोकने के लिए समाज को पितृसत्तात्मक ग्रंथियों और पुरुष वर्चस्व को खत्म करना होगा और इसके लिए व्यापक कार्यक्रम चलाने होंगे।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

मुश्किल में रेल
संपादकीय ‘महंगा परिवहन’ (4 दिसंबर) पढ़ा। आम जनता के लिए सस्ता और सुगम साधन है रेल, लेकिन रेलवे लगातार राजस्व की तंगी से जूझ रहा है। बढ़ते व्यय के अनुपात में आय में वृद्धि नहीं हुई है। रेलवे की सौ रुपए की कमाई के लिए 98.44 रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। डर है कि कहीं रेलवे का भी निजीकरण न हो जाए। निजीकरण शब्द जो कुछ वर्ष पहले लगभग विशेष मामलों में ही सोचा जाता था, वह अब धीरे-धीरे आम होने लगा है। सरकार को चाहिए कि वे सरकारी सेवाओं को चलाने और बचाने के लिए प्रयास करे। रेलवे को पटरी पर लाने के प्रयास समय की महती आवश्यकता है।
’साजिद अली, चंदन नगर, इंदौर

समस्या की जड़
हैदराबाद में एक युवती से बलात्कार और जला कर हत्या पर पूरे देश में आक्रोश के साथ संसद में भी महिला सुरक्षा को लेकर सरकार पर उबाल है। सवाल है कि अगर बलात्कारियों के खिलाफ फांसी की सजा को नियमित कर दिया जाता है तो क्या पुरुष के मन में महिला को लेकर गंदगी और अपराध समाप्त हो जाएगा। यह सच है कि देश में अपराध कम हो सकते हैं, लेकिन फिर भी महिला सुरक्षित नहीं महसूस सकती है, क्योंकि बलात्कार करने की घिनौनी सोच पुरुष के मन में आमतौर पर बना रहता है। इससे मुक्ति कैसे मिलेगी? लड़कों को मनुष्य बनाने के लिए पाठ्यक्रम से लेकर जागरूकता के स्तर पर जो भी किया जा सकता है, किया जाना चाहिए।
’रुमा सिंह, मोतिहारी

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