चौपाल: बेटी बचाओ

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अभी तक ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कहते थे, अब ‘बेटी बचाओ बेटी छिपाओ’। उसके बाद भी यहां के नेता-अभिनेता शान से कहते हैं कि भारत अपनी भारतीय संस्कृति को फिर से प्राप्त कर रहा है।

भरे समाज में बहनों-बेटियों के खिलाफ यौन हिंसा की जा रही है। प्रतीकात्मक तस्वीर।

आजकल बहुत सारे नेताओं का कहना है कि भारत फिर भारतीय संस्कृति के गौरवशाली इतिहास को प्राप्त कर रहा है… भारत विश्व गुरु बनेगा। क्या अतीत में भी हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति ऐसी ही थी? क्या उस समय भी महिलाओं और छोटी बच्चियों के साथ ऐसी ही अमानवीय घटनाएं होती थीं? धर्मग्रंथों के मुताबिक तो रावण ने भी सीता के साथ कभी ऐसा दुर्व्यवहार करने के बारे में नहीं सोचा। हमने जो पढ़ा है, उसके मुताबिक तो महिलाओं को पूजनीय माना जाता था। यहां तक कि कथा के मुताबिक भगवान राम को भी अपना अश्वमेध यज्ञ को पूरा करने के लिए सीता की सोने की मूर्ति रखनी पड़ी थी। गार्गी जैसी महान विदुषी को भी अपना ज्ञान सिद्ध करने के लिए पुरुषों से शास्त्रार्थ करना पड़ा था।

दरअसल, तब महिलाओं को पुरुषों के बराबर का अधिकार था और एक आज का समय है, जहां तीन साल की बच्ची भी जिस्म के भूखे दरिंदो से नहीं बच पाती है। अभी तक बेटियों का पैदा होना मुश्किल था और अब बेटियों का जिंदा रहना। अभी तक ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कहते थे, अब ‘बेटी बचाओ बेटी छिपाओ’। उसके बाद भी यहां के नेता-अभिनेता शान से कहते हैं कि भारत अपनी भारतीय संस्कृति को फिर से प्राप्त कर रहा है। कुछ लोग आज के दौर की तुलना में रामराज्य की बात करते हैं। क्या ऐसा ही था राम राज्य, जहां महिलाएं स्वतंत्र होकर विचरण करती थीं, जहां बच्चियों को घर की लक्ष्मी समझा जाता था? रावण ने सीता का अपहरण मात्र ही किया था और उसी वजह से उसका अंत हुआ।

आज भरे समाज में बहनों-बेटियों के खिलाफ यौन हिंसा की जा रही है, मासूम बच्चियों तक से बलात्कार किया जा रहा है और सजा बहुत कम मिल पा रही है। हमारा संविधान और इसकी गरिमा बनी रहे। लेकिन इस समस्या पर ध्यान देना हमारा फर्ज है। संविधान का निर्माण लोकतंत्र की रक्षा के लिए किया गया था, लेकिन उस लोकतंत्र में रहने वाली बेटियां ही सुरक्षित नही है, तो कैसा लोकतंत्र!अब किसी नेता का यह कहना शोभा नही देता की भारत अपनी पुरातन संस्कृति को प्राप्त कर रहा है… भारत मे राम-राज्य आएगा। पहले आप अपने देश की बेटियों की रक्षा करना सीखें। तब देश के आगे बढ़ने के बारे में सोचा जा सकेगा।
’अरिमर्दन सिंह चौहान, शाहजहांपुर, उप्र

संकट के सामने
इस पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों का मनुष्य द्वारा अपनी हवस और लालच के वशीभूत होकर इतना जबर्दस्त दोहन और इसके साथ-साथ इतना प्रदूषण किया गया है कि अब इस धरती का धैर्य चुक रहा है। वह इसके प्रतिरोधस्वरूप कभी तूफान, कभी अतिवृष्टि, कभी सुनामी, कभी मौसम असंतुलित करके मनुष्य प्रजाति को बार-बार चेतावनी दे रही है। पता नहीं कितनी बार दुनिया के तमाम देशों के राष्ट्राध्यक्षों द्वारा इस असंतुलन को ठीक करने के लिए वैश्विक जलवायु सम्मेलन हो चुके, लेकिन कुछ देशों का राष्ट्रीय और आर्थिक स्वार्थ इन सम्मेलनों के उद्देश्य पर पानी फेर देते हैं।
विचारणीय है कि जब इस तरह के असंतुलन से यह धरती विनष्ट होगी, तो वे भी उस लपेटे में जरूर आ जाएंगे, जो आज इन अपरिहार्य सम्मेलनों से बिदक कर अलग सुर अलाप रहे हैं। इसलिए अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर संपूर्ण मानव मात्र के हित की सोच पर विचार कर ही कोई निर्णय करना चाहिए। समूची मानवता मैड्रिड में होने जा रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन की सफलता की मंगलकामना कर रही है।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

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