दुनिया मेरे आगे: ज्ञान की घुमक्कड़ी

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अगर हम एक लंबी यात्रा पर थोड़ी संजीदगी के साथ निकलें तो हम पाएंगे कि हमने इतना कुछ बिना पढ़े ही जान सीख लिया है, जिसके लिए शायद हमें कई किताबों को पढ़ने की जरूरत होती।

शायद इंसान इतनी आजादी खोना नहीं चाहता। (Source: Thinkstock Images)

घनश्याम कुमार देवांश

आज के समय में जब हवाई जहाज हमें दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने में कुछ घंटों में ही पहुंचा देते हैं तो पीछे मुड़ कर देखने पर यकीन नहीं होता कि कभी ऐसा वक्त रहा होगा कि यात्रा के लिए लोगों के पास साइकिल तक नहीं होती थी। आखिर साइकिल भी आधुनिक युग की देन है। जमीन पर घोड़े और ऊंट और पानी में नावों से ही काम चलाना पड़ता था। वह भी तमाम मुसीबतों और दिक्कतों का सामना करते हुए। लेकिन यह भी कमाल की बात है कि इंसान घूमने के मामले में इतना जुनूनी रहा है कि उसने सुख-सुविधाओं की तो बात ही क्या, साधनों के अभाव की भी रत्ती भर परवाह नहीं की। हिमालय की दुर्गम यात्रा करने वालों, सुदूर एशिया और अफ्रीका के रहस्यों को खोजने वालों और भूमध्यसागर के तूफानों से टकराने वाले हजारों-लाखों यात्रियों ने अपनी जान तक गंवा दी होगी, लेकिन उनके कदम रुके नहीं। इस तरह दुनिया के लोगों ने जाना कि धरती के अलग-अलग हिस्सों में क्या है।

लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी इंसान हमेशा से घुमक्कड़ ही रहे हैं। अधिकतर लोगों ने अपने इलाके से बाहर निकलना कभी पसंद नहीं किया। इसके पीछे उनकी भीरुता भी रही और डर भी। जाहिर है, किसी नए अनजान जगह की यात्रा पर निकलना एक जोखिम उठाना ही है। न जाने वहां के लोग कैसे हों, वहां के जीव-जंतु कैसे हों, वहां की जलवायु कैसी हो! और खाना-पीना और पहनावा तो एक समस्या है ही, क्योंकि जब भी हम किसी नई जगह पर जाते हैं तो हमें उस स्थान के हिसाब से ही पहनना-ओढ़ना पड़ता है और उस इलाके में पाई जाने वाली साग-सब्जियों और अनाजों पर ही निर्भर होना पड़ता है। शायद इंसान इतनी आजादी खोना नहीं चाहता। लेकिन कुछ पाने के लिए हमें कुछ खोना भी पड़ता है। अगर हम अपनी चारदिवारी में मिलने वाली सभी सुख-सुविधाओं, सुरक्षा और आराम को छोड़ कर बाहर नहीं निकल पाएंगे तो हम बाहर घूमने के आनंद से हमेशा ही वंचित रह जाएंगे।

तो बाहर घूमने जाया ही क्यों जाए? उधर-उधर घूमने या भटकने से आखिर हमें हासिल क्या होगा? इससे हमारे जीवन में या औरों के जीवन में क्या कोई बदलाव आएगा? आइए हम इसपर विचार करें। जब हम कहीं घूमने निकलते हैं तो हमें बहुत सारी नई चीजें देखने को मिलती हैं। और हम जितनी ही दूर जाते हैं उतनी ही अलग अलग तरह की चीजें हमारी निगाहों से गुजरती हैं। जैसे कि हम पाते हैं कि वहां घर और मकान अलग-अलग तरह के हैं। लोगों की भाषाएं अलग हैं और वे अलग-अलग परम्पराओं से जुड़े हुए हैं। उनके व्यवहार और तीज त्योहारों में भी हमें काफी भिन्नता देखने को मिलती है। लोगों के कपड़ों में भी हमें बड़ा अंतर दिखाई देता है। नए इलाकों में रहने वाले जानवरों, कीटों और पक्षियों में भी काफी भिन्नता पाई जाती है। यहां तक कि मौसम और जलवायु में भी हमें बहुत बदलाव नजर आता है।

अगर हम एक लंबी यात्रा पर थोड़ी संजीदगी के साथ निकलें तो हम पाएंगे कि हमने इतना कुछ बिना पढ़े ही जान सीख लिया है, जिसके लिए शायद हमें कई किताबों को पढ़ने की जरूरत होती। उदाहरण के लिए, अगर हम कश्मीर की एक लंबी यात्रा पर निकलें और वहां के लोगों से मिलते-जुलते कुछ दिन वहां रहें तब ऐसे में हमें वहां कितना कुछ जानने को मिलेगा, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। उस इलाके में कृषि यानी खेती कैसे की जाती है और किस-किस तरह के फल-फूल वहां पाए जाते हैं, वहां के किसानों की समस्याएं क्या हैं, वहां के युवा क्या सोचते हैं और भविष्य में क्या करना चाहते हैं आदि।

इसके अलावा, वहां के मौसम और जलवायु के बारे में न केवल हम जान सकते हैं, बल्कि उसे गहराई से अनुभव भी कर सकते हैं। वहां के लोगों के जरिए हम उस इलाके की संस्कृति और मान्यताओं के बारे में भी काफी कुछ जान सकते हैं। उनके कपड़े-गहने, रहने के तौर-तरीके, उनकी रोज की जिंदगी की बारीकियां आदि बहुत कुछ है जो हमें ज्ञान और समझ के मामले में अधिक संपन्न कर सकता है। हर इलाके का अपना एक लोकरंग भी होता है। वहां का नृत्य, गायन, वाद्य, नाट्यशैलियां, काव्य और साहित्य, चित्रकला आदि बहुत कुछ हमें वहां के वातावरण में इधर-उधर बिखरा नजर आएगा और जिसे हम खुद देख कर अनुभूत कर सकते हैं। इन सब चीजों के बारे में जानना जाहिर है, हमारे ज्ञान में बहुत कुछ जोड़ सकता है। हां, यह सही है कि इस तरह से घूमने में भी एक सजगता और गंभीरता की जरूरत होती है। वरना संभव है कि हम पूरी दुनिया देख आएं और लौट कर यह कहें कि कुछ खास नहीं देखा। तो क्या अब आप नई यात्रा पर जाने के लिए तैयार हैं?

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