राजनीति: हैवानियत का सिलसिला

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जो भारतीय समाज कभी अपनी सहिष्णुता, सहृदयता और दयालुता के लिए जाना जाता था वह आज अपनी नृशंसता, हिंसा, दुष्कर्म और संवेदनहीनता से इंसानी रिश्तों और मानवीय मूल्यों को तार-तार कर रहा है। विडंबना है कि देश में बेटियों की सुरक्षा और सलामती के सैकड़ों कानून हैं, पुलिस प्रशासन तैनात है और त्वरित अदालतों का गठन हो रहा है, बावजूद इसके बेटियों पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा!

निर्भया गैंगरेप मामला, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो सोर्स -इंडियन एक्सप्रेस)

अरविंद जयतिलक

हैदराबाद में दुष्कर्म के बाद महिला डॉक्टर की नृशंस हत्या और उसके शव को जलाने की घटना से देश स्तब्ध, उद्वेलित और मर्माहत है। इस घटना ने 2012 के उस निर्भया कांड की याद दिला दी है जब देश उबल पड़ा था। तब केंद्र सरकार ने लोगों के गुस्से को देखते हुए यौन शोषण से जुड़े कानून में बदलाव के लिए जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में समिति गठित की और उनकी सिफारिशों पर कानून में बदलाव किया। उसके बाद बारह साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म के मामले में फांसी की सजा तय की गई। मगर देखा जा रहा है कि इसके बावजूद बेटियां दिन के उजाले में भी महफूज नहीं हैं। कड़े कानून के बावजूद बेटियों की अस्मत के लुटेरे हैवान आजाद हैं।

यह घटना महज कुछ शैतानों की दरिंदगी की बानगी नहीं है। यह सरकारी तंत्र और कानून-व्यवस्था की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा और धज्जियां उड़ाने वाली है। सत्ता और समाज भले इस घटना पर छाती पीटे, चीखे-चिल्लाए या आंसू टपकाए, लेकिन सवाल जस का तस है कि इससे क्या फर्क पड़ता है? फर्क तो तब पड़ता जब अपराधियों के मन में कानून को लेकर खौफ पैदा होता। फर्क तब पड़ता जब नुमाइंदे बेटियों की सुरक्षा और सलामती की गारंटी देते और बेहतर कानून-व्यवस्था का इंतजामात करते। फर्क तब पड़ता जब अदालतें गुनाहगारों को उनके किए की सजा देतीं। मगर ऐसा नहीं हो पा रहा है। मतलब साफ है कि सब कुछ औपचारिकता भर है। यही वजह है कि देश में प्रतिदिन पांच दर्जन से अधिक बच्चियों के साथ दुष्कर्म हो रहा है और सैकड़ों महिलाएं छेड़छाड़ का शिकार बन रही हैं। एक सच्चाई यह है कि अधिकांश मामलों में पुलिस पीड़ित पक्ष की रिपोर्ट ही दर्ज नहीं करती है और दूसरा यह कि लोक-लाज के कारण लोग मुकदमा दर्ज कराने से बचते हैं। यहां समझना होगा कि जब तक यौन उत्पीड़न के मामले में शत-प्रतिशत गुनहगारों को सजा नहीं मिलेगी या कानून की धीमी चक्की तेज नहीं होगी, तब तक बेटियों पर अत्याचार का सिलसिला थमने वाला नहीं है।

आंकड़ों पर गौर करें तो दुष्कर्म के मामलों में सजा की दर बेहद कम है। चिल्ड्रेन फाउंडेशन की ओर से बाल यौन उत्पीड़न पर जारी रिपोर्ट में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार विगत कुछ वर्षों में बच्चों के खिलाफ अपराध की घटनाओं में चौरासी प्रतिशत वृद्धि हुई है। जाहिर है कि कानून और पुलिस तंत्र अपना काम ठीक से नहीं कर रहा है। आंकड़े बताते हैं कि पुलिस को 2017 में 46,965 मामलों की जांच करनी थी। इनमें 14,406 मामले पहले से लंबित थे और 32,559 नए दर्ज हुए। पुलिस ने इनमें से 4364 केस बंद कर दिए और 28750 में चार्टशीट लगाई। बाकी 13,765 मामले लंबित छोड़ दिए। दुष्कर्म के बाद हत्या के मामलों में भी 2016 में एक सौ आठ मामले लंबित थे। 2017 में दो सौ तेईस नए मामले दर्ज हुए।

अदालतों की बात करें, तो 2017 में निचली अदालतों में दुष्कर्म के 1,46,201 मामले थे, जिनमें से 1,17,451 मामले लंबित थे। इनमें ट्रायल कोर्ट में सिर्फ 18099 मामलों में सुनवाई हो सकी। 5,822 यानी 32.2 प्रतिशत मामलों में ही दोष सिद्ध हुए। वर्ष 2016 में यौन अपराध से बच्चों के संरक्षण संबंधी कानून पोस्को के तहत 48060 मामले जांच के लिए दर्ज किए गए, जिनमें से सिर्फ 30851 मामले सुनवाई के लिए अदालत भेजे गए। यानी छत्तीस प्रतिशत मामले जांच के लिए लंबित रह गए। वर्ष 2014-16 के दौरान पोस्को के तहत सिर्फ तीस प्रतिशत दोष सिद्ध हुए। हालांकि राहत की बात यह है कि 2015 के मुकाबले छह प्रतिशत की वृद्धि हुई।

आंकड़ों पर गौर करें तो 2006 में यौन उत्पीड़न के मामले में सजा की दर 51.8 प्रतिशत, 2007 में 49.9, 2008 में 50.5 और 2009 में 49.2 प्रतिशत रही। यह रेखांकित करता है कि अदालतों में यौन शोषण से जुड़े मामलों की सुनवाई की गति बेहद सुस्त है और सजा की दर भी कम है। ऐसे में अपराधियों के मन में स्वाभाविक ही कानून को लेकर भय नहीं है। इन आंकड़ों से साफ है कि बलात्कार के अधिकतर मामलों में अपराधी सजा से बच निकल जा रहे हैं। महिलाओं पर होने वाले समग्र अत्याचारों में केवल तीस प्रतिशत गुनहगारों को सजा मिल पाती है। एनसीआरबी के रिपोर्ट के मुताबिक बाल यौन उत्पीड़न के लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अगर इसकी सुनवाई इसी गति से चलती रही तो 2018 तक के लंबित मामलों को ही निपटाने में तीन दशक लग जाएंगे।

राज्यवार आंकड़ों पर गौर करें तो पंजाब में लंबित मामलों को निपटाने में दो वर्ष, जबकि गुजरात, पश्चिम बंगाल, केरल, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में इनका निपटारा होने में साठ वर्ष से भी ज्यादा समय लग सकता है। वर्ष 2015 और 2016 में बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मात्र दस प्रतिशत मामलों की सुनवाई पूरी हो सकी है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार इस समय देश में डेढ़ लाख से अधिक बलात्कार के मुकदमे अदालतों में लंबित हैं। जब तक यौन उत्पीड़न मामले में सजा की दर में वृद्धि नहीं होगी अपराधियों के मन में खौफ पैदा नहीं होगा।

यहां यह भी गौरतलब है कि बेटियां सिर्फ सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर नहीं, बल्कि अपने घर-परिवार और रिश्ते-नातेदारों की जद में भी असुरक्षित हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो रिश्तेदारों द्वारा बलात्कार की घटनाओं में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई है। दुष्कर्म की घटनाओं में तकरीबन पंचानबे प्रतिशत मामलों में बेटियां दुष्कर्मी को अच्छी तरह जानती-पहचानती हैं, लेकिन उसके खिलाफ अपना मुंह खोलने से डरती हैं।

यूनिसेफ की रिपोर्ट ‘हिडेन इन प्लेन साइट’ से उजागर हो चुका है कि भारत में पंद्रह से उन्नीस साल की उम्र की चौंतीस प्रतिशत बेटियां ऐसी हैं, जो अपने साथी के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा झेलती हैं। इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि पंद्रह से उन्नीस साल तक की उम्र वाली सतहत्तर प्रतिशत बेटियां यौन हिंसा का शिकार हुई हैं। इसी तरह पंद्रह से उन्नीस साल की उम्र की लगभग इक्कीस प्रतिशत बेटियां पंद्रह साल की उम्र से ही हिंसा झेल चुकी हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन लड़कियों की शादी नहीं हुई, उनके साथ शारीरिक हिंसा करने वालों में पारिवारिक सदस्य, मित्र, जान-पहचान के व्यक्ति और शिक्षक होते हैं।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष तथा वाशिंगटन स्थित संस्था ‘इंटरनेशनल सेंटर पर रिसर्च आॅन वुमेन’ (आईसीआरडब्ल्यू) के आंकड़ों से भी जाहिर हो चुका है कि भारत में दस में से छह पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी या प्रेमिका के साथ हिंसक व्यवहार किया है। रिपोर्ट के मुताबिक बावन प्रतिशत महिलाओं ने स्वीकार किया कि उन्हें किसी न किसी तरह की हिंसा का सामना करना पड़ा है। इसी तरह अड़तीस प्रतिशत बेटियों ने घसीटने, पिटाई, थप्पड़ मारे जाने तथा जलाने जैसे शारीरिक उत्पीड़नों का सामना करने की बात स्वीकार की है। जाहिर है कि उदार और संवेदनशील कहा जाने वाला भारतीय समाज अब पूरी तरह संवेदनहीन बन चुका है। जो भारतीय समाज कभी अपनी सहिष्णुता, सहृदयता और दयालुता के लिए जाना जाता था वह आज अपनी नृशंसता, हिंसा, दुष्कर्म और संवेदनहीनता से इंसानी रिश्तों और मानवीय मूल्यों को तार-तार कर रहा है। विडंबना है कि देश में बेटियों की सुरक्षा और सलामती के सैकड़ों कानून हैं, पुलिस प्रशासन तैनात है और त्वरित अदालतों का गठन हो रहा है, बावजूद इसके बेटियों पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा!

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