संपादकीय: खुदकुशी का दायरा

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महानगर लोगों में बेहतर और खुशहाल जीवन के सपने रोपते हैं। इसी आकर्षण में बहुत सारे लोग गांव और अपने छोटे कस्बे को छोड़ कर महानगरों की तरफ भागते हैं। हर कोई चाहता है कि वह अपने परिवार को अच्छी जिंदगी बसर करने का अवसर उपलब्ध कराए।

परिवार समेत की खुदकुशी, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो सोर्स – इंडियन एक्सप्रेस)

महानगरों में बढ़ते असुरक्षाबोध, अवसाद, कुंठा और जीवन के प्रति तंगनजरी को लेकर चिंताएं बहुत पहले से प्रकट की जाती रही हैं, पर अब ये स्थितियां भयावह स्तर तक पहुंच गई लगती हैं। कारोबार में घाटा, प्रेम में मिली विफलता, पारिवारिक कलह आदि के चलते खुदकुशी की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। दिल्ली से सटे गाजियाबाद में पांच लोगों की मौत इसका ताजा प्रमाण है। गौरतलब है कि गाजियाबाद में रहने वाले एक कारोबारी ने पहले अपने दो किशोर बच्चों की हत्या की, फिर अपनी एक कर्मचारी और पत्नी के साथ आठवीं मंजिल से छलांग लगा कर खुदकुशी कर ली। शुरुआती जांच में पता चला है कि कारोबारी को पिछले कुछ दिनों से अपने धंधे में घाटा उठाना पड़ रहा था और उसके करीब दो करोड़ रुपए एक रिश्तेदार ने दबा लिए थे। खुदकुशी से पहले लिखे नोट में कारोबारी ने यह बात बताई है। हालांकि इस मामले की छानबीन चल रही है और इससे जुड़े अन्य तथ्यों की जानकारी अभी सामने आनी है, पर इससे यह सवाल एक बार फिर गाढ़ा हुआ है कि महानगरों में आखिर कैसे ऐसी स्थितियां बनती गई हैं कि लोगों में संघर्ष का साहस छीजता गया है और वे जीवन से हार कर सपरिवार खुदकुशी जैसे कदम उठा लेते हैं।

महानगर लोगों में बेहतर और खुशहाल जीवन के सपने रोपते हैं। इसी आकर्षण में बहुत सारे लोग गांव और अपने छोटे कस्बे को छोड़ कर महानगरों की तरफ भागते हैं। हर कोई चाहता है कि वह अपने परिवार को अच्छी जिंदगी बसर करने का अवसर उपलब्ध कराए। इसलिए अनेक लोग उद्यम शुरू करते हैं। हालांकि उद्यम और व्यापार में उतार-चढ़ाव के जोखिमों से सब वाकिफ होते हैं और इस तरह नुकसान से पार पाने के लिए पहले से तैयार भी रहते हैं। पर पिछले कुछ सालों से व्यापार में घाटे और कर्ज का बोझ बढ़ने की वजह से खुदकुशी की घटनाएं बढ़ी हैं। यह प्रवृत्ति केवल बड़े नुकसान उठाने वाले व्यापारियों में नहीं, छोटे और खुदरा व्यापार करने वालों में भी देखी गई है, जो अक्सर बहुत आसानी से अपना धंधा बदल लेने को तैयार रहते हैं। निश्चित रूप से इसके लिए देश की व्यापारिक स्थितियां जिम्मेदार हैं, पर इसमें सामाजिक बेपरवाही और संवेदनात्मक संकुचन भी कम जिम्मेदार नहीं है। यह ठीक है कि पिछले कुछ समय से देश में कारोबारी स्थितियां अच्छी नहीं हैं, बहुत सारे लोगों को अपने धंधे बंद करने पड़े, कई कारोबारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, बहुत सारे लोगों का रोजगार छिन गया है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि इससे पार पाने के लिए उन्होंने जीवन समाप्त करने का रास्ता ही चुना।

आत्महत्या की प्रवृत्ति अचानक नहीं पनपती। लंबे समय के अवसाद, तनाव, संत्रास अपमान के भय आदि से गुजरने के बाद ही कोई व्यक्ति इस तरफ कदम बढ़ाता है। इसलिए अगर कोई पूरे परिवार के साथ खुदकुशी का फैसला करता है, तो जाहिर है कि साथ के सभी लोग इस प्रक्रिया से गुजर रहे होंगे। गाजियाबाद की ताजा घटना से पहले भी कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। जब कोई व्यक्ति ऐसी स्थितियों से गुजर रहा होता है, तो उसमें आस-पड़ोस, रिश्तेदार, दोस्त, सहकर्मी आदि उसे उनसे बाहर निकालने का प्रयास करते हैं। मगर हैरानी की बात है कि अब समाज अपनी यह भूमिका क्यों नहीं निभा पा रहा है! इस चिंताजनक स्थिति से निपटने के लिए सरकार के स्तर पर कारगर उपाय जुटाने की दरकार है।

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