उद्धव ठाकरे ने पलटा फडणवीस सरकार का बड़ा फैसला, गुजरात की कंपनी को दिया 321 करोड़ का ठेका रद्द

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सितंबर 2018 में हालांकि प्रिंसिपल अकाउंटेंट जनरल के कार्यालय ने एक ऑडिट में आपत्ति उठाई और आरोप लगाया गया कि “फर्म को अतिरिक्त व्यय का भुगतान किया गया था”।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे। (फोटो सोर्स: PTI)

महाराष्ट्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली पिछली सरकार के दौरान लिए गए एक बड़े फैसले को वर्तमान सरकार ने पलट दिया है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार ने जैसे ही कमान संभाली उसने गुजरात से संबंधित एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को मिला 321 करोड़ रुपये का ठेका रद्द कर दिया। इवेंट मैनेजमेंट कंपनी ‘अंतरराष्ट्रीय घोड़ा मेले’ का आयोजन करने वाली थी। अब यह कंपनी गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में घिर गई है।

26 दिसंबर, 2017 को राज्य-संचालित महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम (MTDC) लिमिटेड ने अहमदाबाद के ‘लल्लूजी एंड संस’ के साथ तुर्की के आधार पर नंदुरबार में सारंगखेड़ा दीपक समारोह के लिए कॉन्सेप्ट, डिजाइन, प्रबंधन और संचालन के लिए समझौता किया था। यह फर्म पहले कुंभ मेले और रण उत्सव के लिए काम कर चुकी थी। लेकिन इस साल 28 नवंबर को जिस दिन उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली नई शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस सरकार ने शपथ ली, राज्य के पर्यटन विभाग ने मुख्य सचिव अजय मेहता के आदेशों का पालन करते हुए अनुबंध को “तत्काल रद्द” करने का निर्देश दिया।

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पर्यटन विभाग के अंडर सेक्रेटरी एस लम्भेट ने बताया, “सरकार की मंजूरी के बिना ही समझौते और धंधे में मुनाफे की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। चूंकि यह केंद्र के मानदंडों के अनुसार नहीं है, इसलिए यह एक गंभीर वित्तीय अनियमितता है।”
एमटीडीसी इस आयोजन से जुड़ा हुआ है और यह हर साल दिसंबर में आयोजित किया जाता है। कहा जाता है कि यह भारत के सबसे पुराना घोड़ों का मेला है।

नवंबर 2017 में तत्कालीन मंत्री जयकुमार रावल की अध्यक्षता में एमटीडीसी के निदेशक मंडल ने आयोजन को व्यापक पैमाने पर बढ़ावा देने के लिए एक प्रस्ताव अपनाया। निगम ने उसी महीने एक इवेंट मैनेजमेंट एजेंसी का चयन करने के लिए एक टेंडर जारी किया और तीन बोली लगाने वालों में से लल्लूजी एंड संस का चुनाव किया। एमटीडीसी और फर्म के बीच की एग्रीमेंट के मुताबिक 2017-18 से 2026-27 तक महोत्सव के आयोजन और मार्केटिंग के लिए 321 करोड़ रुपये खर्च किए जाने थे। निगम ने इन दस वर्षों में ठेकेदार को VGF (Viability Gap Fund) के रूप में 75.45 करोड़ रुपये (टैक्स मिलाकर) देने की प्रतिबद्धता जाहिर की थी।

सितंबर 2018 में हालांकि प्रिंसिपल अकाउंटेंट जनरल के कार्यालय ने एक ऑडिट में आपत्ति उठाई और आरोप लगाया गया कि “फर्म को अतिरिक्त व्यय का भुगतान किया गया था”। इस साल मई में राज्य के प्लानिंग डिपार्टमेंट ने वीजीएफ जारी करने के कदम पर सवाल उठाते हुए परियोजना पर रोक लगा दी।

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