चौपाल: अनुशासन की कसौटी

digamberbisht

हमारे देश की राजनीति का स्तर इस हद तक गिर चुका है कि यहां अनुशासन तो किसी कोने में दुबका नजर आता है।

देश में अनुशासन का पालन करने को विचित्र निगाहों से देखा जाने लगा है।

राजनीति में अनुशासन की बात की जाए तो देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि ‘अनुशासन राष्ट्र का जीवन-रक्त है।’ सच पूछा जाए तो अनुशासन ही मानव सभ्यता के विकास की पहली सीढ़ी है, जिसके सहारे हमारा क्रमिक विकास संभव हुआ है। प्रकृति के समस्त कार्य-व्यापार किसी न किसी नियम से बंधे होते हैं। पृथ्वी नित्य नियम से अपनी धुरी पर घूमती है। जाड़ा, गरमी और बरसात हमेशा समय पर आते हैं। लेकिन अब यहां यह कहना उचित होगा कि देश में अनुशासन का पालन करने को विचित्र निगाहों से देखा जाने लगा है।

खासतौर पर हमारे देश की राजनीति का स्तर इस हद तक गिर चुका है कि यहां अनुशासन तो किसी कोने में दुबका नजर आता है। अगर यहां अनुशासन होता तो आज देश की राजनीति और राजनेता अवसरवाद के शिकार न होते और न ही बेतुकी बयानबाजी सत्ताधारियों और राजनेताओं से सुनने को मिलती। सरकारों को देशहित और जनहित के लिए कड़वे और कठोर फैसले जरूर लेने चाहिए। हालांकि सरकारों को ऐसे फैसले लेने से गुरेज करना चाहिए, जिससे देश को आर्थिक नुकसान हो या वह आमजन के लिए परेशानी बने। लोकतंत्र में जहां प्रधानमंत्री देश के नागरिकों के मतदान द्वारा चुना जाता है। वहीं अगर लोगों से किसी खास और मजबूरी वाले अनुशासन की अपेक्षा रखी जाती हो, तो वास्तव में उसे किसी न किसी रूप में लोकतंत्र पर आसन्न खतरे का संकेत समझा जा सकता है।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

आदर्श गांधी
हाल ही में एक सांसद प्रज्ञा ठाकुर द्वारा गांधीजी की हत्या को लेकर संवेदनशील और नकारात्मक बयान के चलते राजनाथ सिंह ने संसद में कहा कि महात्मा गांधीजी हमारे लिए आदर्श हैं। वे हमारे प्रेरणास्रोत हैं और हमेशा रहेंगे। अब प्रज्ञा ठाकुर ने भले ही माफी मांग ली हो, लेकिन यह देश के लिए खेद की बात हैं जिस महान व्यक्ति के स्मारक और मूर्तियां दुनिया के देशो में सम्मान के साथ बनाए जाते हैं, ताकि उनके आदर्श तत्त्वों और मूल्यों को उनके देश के भलाई के लिए अपनाया जा सके, वहीं अपने ही देश में गांधीजी के नाम पर विवाद उत्पन्न किया जा रहा है, जो निंदनीय है। गांधीजी को दुनिया में इसीलिए माना और याद किया जाता है कि वे अहिंसा, आत्मबल, संयम, उपवास, विश्वास, धैर्य,आत्मविश्वास, न्ष्ठिा, कर्तव्य, सादगी आदि गुणों को आत्मसात करके अपने जीवन को व्यतीत करते रहे। इसलिए देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के सामने उनकी सोच और जीवनशैली आदर्श मानी जाती है। यह दुर्भाग्य है कि देश में गांधीजी की मृत्यु स्वाभाविक नहीं हुई, बल्कि नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी। उसी हत्यारे को देशभक्त कहा जा रहा है।

गांधीजी ने राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, पर्यावरण आदि अनेक पहलू पर अपने विचार प्रकट किए, जिन्हें वास्तव में जमीन पर उतारने के लिए देश को प्रयास करना जरूरी है। देश में कुछ नेता और लोग अन्य नेताओं, क्रांतिकारियों, समाजसेवकों के विचार गांधीवादी विचारधारा से श्रेष्ठ मानते हैं, लेकिन किसकी विचारधारा श्रेष्ठ बताने के बजाय खुद के लिए और देश के कल्याण के लिए उन सभी अच्छी विचारधाराओं में से अच्छी और मानवीय बातें चुन कर लागू करना चाहिए।
’निशांत महेश त्रिपाठी, कोंढाली, नागपुर

राजनीति की दिशा
राजनीति को सीधे सरल रूप में परिभाषित करना हो तो यह वह व्यवस्था है, जो समाज को दिशा देने के साथ ही उसकी समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त करती है। आज राजनीति दिशाहीन होती जा रही है और नेता अवसरवादी। एक कहावत काफी प्रचलित है कि दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त हो सकता है। कोई बात जमी नहीं कि पार्टी बदली, क्योंकि दूसरा दल उसे लेने को तैयार खड़ा है। एक समय टिकट के दावेदार कम हुआ करते थे, मगर अब लाइन लगा कर खड़े रहते हैं। पार्टी बदलना और नई पार्टी बनाना तो खेल बन गया है।
’साजिद अली, चंदन नगर, इंदौर

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