चौपाल: मेहनताने का हक

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सन 1991 में निर्वाह मजदूरी अधिकार की अवधारणा सामने आई, लेकिन वर्तमान में विकासशील देशों में भी मजदूर वर्ग न्यूनतम आय से भी अभी बहुत दूर है। 1947 से अब तक वर्तमान परिस्थितियों में भी हालत वही बनी हुई है।

1947 से अब तक वर्तमान परिस्थितियों में भी हालत वही बनी हुई है।

मजदूर अधिनियम 2019 पर श्रम संहिता और मसौदा नियमों ने क्या भारत में पचास करोड़ से अधिक अनौपचारिक श्रमिकों के जीवन और आकांक्षाओं को विफल कर दिया है? संगठित क्षेत्रों में जिस तरह बैंक, स्कूल, बीमा जैसे संस्थानों में जो लोग श्रम कार्य में लगे हुए हैं, उन्हें समय पर वेतन मिलता है, बीमा जैसी सुविधाओं का लाभ मिल जाता है। वहीं असंगठित क्षेत्रों में वेतन-भत्ते, बीमा और कब काम पर जाना है, कब नहीं, कुछ निश्चित नहीं है। असंगठित क्षेत्र के मजदूर वर्ग के बच्चों के लिए सुविधाओं का घोर अभाव है। अधिकतम समस्या असंगठित क्षेत्र में है। इसमें तिरानबे फीसद जो कार्यशील जनसंख्या है, वह साठ फीसद सकल घरेलू उत्पादन में योगदान देता है।

सन 1991 में निर्वाह मजदूरी अधिकार की अवधारणा सामने आई, लेकिन वर्तमान में विकासशील देशों में भी मजदूर वर्ग न्यूनतम आय से भी अभी बहुत दूर है। 1947 से अब तक वर्तमान परिस्थितियों में भी हालत वही बनी हुई है। उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण के हिसाब से अभी भी ग्रामीण क्षेत्र में वर्तमान में तिरासी रुपए प्रतिदिन और शहरी क्षेत्र में एक सौ चौंतीस रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मिल रहा है। वहीं दिल्ली में यह न्यूनतम वेतन 14,842 प्रतिमाह है और केरल में यह छह सौ रुपए प्रतिदिन। इन राज्यों की स्थिति बेहतर है।

सही है कि इस अधिनियम से कुछ फायदे भी समाज में होंगे। इस अधिनियम के जरिए लैंगिक आधार पर एक समान कार्य या एक प्रकृति वाले काम के लिए वेतन और भर्ती के मामले में लैंगिक भेदभाव को खत्म कर दिया गया है। अब एक जैसे काम के लिए महिलाओं को भी उतना ही वेतन मिलेगा, जितना एक पुरुष को दिया जाता है। मजदूर अधिनियम 2019 में वेतन वर्तमान में 9750 रुपए महीने, वहीं 375 रुपए प्रतिदिन कर दिया गया है। इसमें शहरी क्षेत्र में आवासीय भत्ता 1430 रुपए न्यूनतम है। श्रम सुधारों की दिशा में यह एक बहुत बड़ा कदम है। श्रमिक वर्ग खुश रहेगा, तभी अर्थव्यवस्था आगे बढ़ेगी।
’करन कुमार खोईया, दिल्ली विवि

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