दुनिया मेरे आगे: खंडित सच के दायरे

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दूसरा पहलू भी है जो आज इस समस्त सूचना तंत्र पर हावी होता नजर आ रहा है, जहां सोशल मीडिया में निरंतर गढ़ी जाती ये छवियां सोचने और विचारने की जगह खत्म कर रही हैं।

सोशल मीडिया से उचित दूसरी भी जरूरी।(फोटो-सोशल मीडिया)

निशा नाग

हाल ही में किसी ने मुझे कहा- ‘मालूम है, ये जो मांग चल रही है कि शिक्षा महंगी कर दी है और हम उसे वहन नहीं कर सकते। ये सब फिजूल की बात है। जेएनयू के विद्यार्थी तो महंगी बाइकों पर घूमते हैं और ब्रांडेड कपड़े पहनते हैं। …मैंने अभी-अभी फेसबुक पर देखा।’ यह बात उच्च शिक्षित एक महिला ने मुझसे कही तो चौंकना स्वाभाविक था। दरअसल, सामान्य विद्यार्थियों के साथ जेएनयू में पढ़ने वाले ऐसे विद्यार्थी भी बड़ी संख्या में हैं जो दूरदराज के क्षेत्रों से आते हैं और वे बेहद निम्न आय वर्ग के परिवारों के बच्चे होते हैं। वे अक्सर अपनी पीढ़ी के पहले ऐसे विद्यार्थी होते हैं जो उच्च शिक्षा का सपना पूरा कर रहे होते हैं। मैंने उन्हें ट्यूशन पढ़ा कर भी अपना खर्च चलाते हुए देखा है। और जेएनयू की तो पहचान ही मोटे कपड़े और फक्कड़पने से है। कुछ लोग अगर ब्रांडेड कपड़े पहनते हैं तो उसका सरलीकरण ठीक नहीं। यह धारणा ठीक वैसी ही है कि अगर दिल्ली में कुछ लोगों के पास महंगी फेरारी कार है तो समूची दिल्ली में रहने वालों के पास भी है।

सवाल है कि आभासी संसार के गढ़े गए प्रचार को पढ़े-लिखे और वयस्क लोग सहजता से स्वीकार कर रहे हैं तो उस आम अल्पशिक्षित और अशिक्षित जनता के बारे में क्या कहा जाए जिसे कभी विचार और विश्लेषण करने की क्षमता तक पहुंचने ही नहीं दिया गया। सोशल मीडिया पर ‘आॅगमेंटिड रियलिटी’ या संवर्धित वास्तविकता पर आज कभी-कभार चर्चा होने लगी है। संवर्द्धित वास्तविकता आभासी संसार की वह प्रतिछवि है जो वास्तविकता को स्वरचित कल्पना में लपेट कर प्रस्तुत करती है और छवियों की वास्तविकता को खत्म कर देती है। दुख को अति दुख और हास को अतिहास में इस तरह प्रतिवर्तित करती है कि वास्तविकता उसके भीतर कहीं दब कर रह जाती है और आम जन उस बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत की गई बात को ही सच मान लेता है। जबकि वास्तविकता का अंश उसमें कहीं बहुत थोड़ा होता है। यानी अपने-अपने राम की तरह अपना-अपना सच यहां भी काम करता है। किन्हीं विशेष परिस्थितियों की तो बात ही छोड़िए, आम घटनाओं पर भी इसका गहरा प्रभाव दिखाई दे रहा है और आम जन इसके घेरे में आते दिखाई दे रहे हैं।

आधुनिक समाज की एक प्रमुख गतिविधि निरंतर नई-नई छवियों को निर्मित करना और उनका उपभोग करते रहना है। धीरे-धीरे वास्तविकता की ये गढ़ी गई छवियां ही वास्तविकता को निर्धारित करने लगती हैं। इन दी हुई छवियों के आधार पर हम वास्तविकता के बारे में अपनी अवधारणाएं बनाने लगते हैं। ये छवियां वास्तविकता को लेकर हमारी जरूरतों का अनुकूलन और नियंत्रण करने लगती हैं। सोशल मीडिया में वास्तविक संसार को प्रतिसंसार में गढ़ने वाली फोटोग्राफी के साथ ही इसका खतरा दिखाई देने लगा था।

सन 1960 में सूजन सौंटेंग की पुस्तक प्रकाशित हुई ‘आॅन फोटोग्रॉफी’। इस पुस्तक में उन्होंने यह स्थापित किया कि किसी घटना के बारे में दिखाए गए फोटोग्राफ के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वह हजारों शब्दों से भी अधिक प्रभावशाली होता है। जबकि सच्चाई यह है कि ‘क्षण में कैद एक चित्र वास्तविकता का एक टुकड़ा हमें देता है। लेकिन वह टुकड़े को संपूर्णता का पर्याय बना देना चाहता है। हम कैमरे की आंख से ही सब कुछ को देखते हैं। कौन इसे दिखा रहा है? कौन इस पूरे दृश्य प्रपंच का सूत्रधार है, इसे अक्सर नहीं जान पाते’। यही स्थिति आज वायरल होती छवियों दृश्यों और एमएमएस के बारे में है। यह सही है कि सोशल मीडिया ने सूचना का लोकतंत्रीकरण और ज्ञान का सुलभ स्रोत उपलब्ध कराया है, लेकिन इसका

दूसरा पहलू भी है जो आज इस समस्त सूचना तंत्र पर हावी होता नजर आ रहा है, जहां सोशल मीडिया में निरंतर गढ़ी जाती ये छवियां सोचने और विचारने की जगह खत्म कर रही हैं। वास्तविकता का अपने लिए अनुकूलन करती ये छवियां कहीं न कहीं वास्तविकता को निरर्थक बना रही हैं। यहां तक कि यह वास्तविकता को एक गल्प में बदल रही हैं। इस तरह की छवियां वास्तविकता के सत्य और सातत्य को खंडित करती हैं। यह अनायास नहीं है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आम जनता को दिखाने के लिए तानाशाह हिटलर या भारत में ब्रिटिश सरकार ने जो वृत्तचित्र बनाए थे, वह अपना पक्ष जनता के सामने रखने के लिए ‘मैनीपुलेशन’ यानी तथ्यों को मनमाने तरीके से तोड़ना-मरोड़ना था। उन्होंने उस समय जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए वृत्त-चित्रों और प्रोपेगेंडा का सहारा लिया।

आभासी छवियों के इस संसार में वस्तु की छवि जब तैयार होती है तो वह जैसे उस वस्तु को अपने नियंत्रण में कर लेना चाहती है और वह छवि ही वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करने लगती है। प्रश्न यह उठता है कि कहीं हमारे समाज का यह आॅनलाइन प्रतिबिंब, जो अक्सर तात्कालिक प्रतिछवियों द्वारा निर्मित होता है, हमें इतना प्रभावित तो नहीं कर लेगा कि विचार-विमर्श किए बिना हम इस पर विश्वास करने लगेंगे और यह समांतर आभासी दुनिया ही हमें संचालित करने लगेगी!

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