राजनीति: कितने बोझ हैं पालतू पशु

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बढ़ती शहरी आबादी के घनत्व को थामना आज मुश्किल हो गया है। फिर पशुओं पर किसी का ध्यान नहीं है। जबकि वे हमारे भोजन और रहन-सहन में सहायक हैं। हम अपने बीच पशुपालन में एक संतुलन नहीं बना पा रहे हंै। किसी-किसी क्षेत्र में अतिरिक्त उत्पादन हो रहा है, जिसका हम निर्यात कर सकते हैं। उस पर भी ठोस योजना का अभाव है। पालतू पशुओं को चारा-पानी उपलबध करा कर उनके स्वास्थ्य को बना कर ही उनकी संतति से लाभ पा सकते हैं। यह एक जीवन चक्र है, इसको नियमित बना कर ही विकास की सही राह पर चला जा सकता है।

गणना के आधार पर कुल पशु देश में साढ़े तिरेपन करोड़ हैं।

भगवती प्रसाद डोभाल

आज भारत की आबादी लगभग एक अरब पचीस करोड़ से ज्यादा है। इसे दूध की आवश्यकता है, शरीर ढकने के लिए गरम कपड़े चाहिए। आर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कंपोस्ट खाद की जरूरत है, जो हमारी पारंपरिक खेती के लिए इस्तेमाल होती है। वह भी पशुओं से प्राप्त होती है। प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए पशुओं का मांस खाया जाता है। यानी पशु हमारे जीवन के अभिन्न हिस्से हैं। मनुष्य के जंगल युग से सभ्य होने के साथ से ही हमारा पशुओं का साथ है। वे मित्र हैं और हमारे रक्षक भी हैं।

अगर 2017-18 के आंकड़े देखें तो दूध उत्पादन में भारत प्रथम स्थान पर था। इसका वार्षिक उत्पादन देश में 17 करोड़ 43 लाख टन रहा। संख्या के हिसाब से अंडे का उत्पादन 95 अरब 22 करोड़ रहा और 77 लाख टन मांस का उत्पादन किया गया। पशुधन का आउटपुट मूल्य कृषि और अन्य क्षेत्र की अपेक्षा 31.25 फीसद था। मछली उत्पादन लगभग एक करोड़ छब्बीस लाख मिट्रिक टन का रहा। चमड़े का उत्पादन महत्त्वपूर्ण है। इसका सबसे अधिक निर्यात किया जा रहा है। इसी तरह चार करोड़ पंद्रह लाख किलो ऊन का देश प्रति वर्ष उत्पादन कर रहा है। लेकिन जो पशु धन हमारे साथ है, उसकी गणना से पशुओं के अनुपात से हम आर्थिक उन्नति के एक पहलू को देख पाएंगे।

गणना के आधार पर कुल पशु देश में साढ़े तिरेपन करोड़ हैं। यह गणना देश के छह लाख साठ हजार गांवों और नवासी हजार शहरी वार्डों की है। इसके मुताबिक उन पशुओं की वृद्धि हुई है, जो हर दिन भोजन के लिए उपयोग में लाए जा रहे हैं। जबकि जिन्हें कृषि और अन्य कार्यों में उपयोग में लाया जा रहा है, उनका अनुपात घटता जा रहा है। जिन जानवरों का मांस के लिए उपयोग हो रहा है, उसकी संख्या में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। सिर्फ सूअरों के प्रजनन को छोड़ कर, जबकि इसके मांस का भी उपभोग होता है। इसी तरह अंडे और मुर्गी पालन में 2012 की अपेक्षा 2019 में 16.8 फीसद की वृद्धि हुई है। अगर राज्यवार इसका उत्पादन देखें तो बंगाल और आंध्र प्रदेश में 2012 की अपेक्षा इस वर्ष छियालीस और चौंसीस फीसदी की वृद्धि हुई है। भेड़ पालन में भी 2012 के मुकाबले 2019 में आबादी में बढ़ोतरी हुई है। इस समय कुल भेड़ों की संख्या सात करोड़ तैंतालीस लाख है, जबकि 2012 में यह संख्या छह करोड़ इक्यावन लाख थी। यह भी एक आर्थिक आधार है भेड़ पालने वालों का। इसमें 2012 के मुकाबले 2019 में चौदह फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। बकरी पालन में भी लोगों ने रुचि दिखाई। इस रुचि का खास कारण है। बकरी पालन मांस के साथ-साथ दूध उत्पादन में सहायक है।

पशुओं के प्रजनन में बहुत सारे राज्यों में कमी पाई गई है। ऊंटों की संख्या में सैंतीस फीसद से अधिक की गिरावट दर्ज हुई है। इसी तरह घोड़े, खच्चर और गधों की संख्या में लगभग बावन फीसद की गिरावट आई। गायों की संख्या में हल्की कमी आई है। इस पशुधन को पालने के लिए हमें पर्याप्त पानी की आवश्यकता है। यह जरूरी है स्वस्थ पशु जीवन धन को समृद्ध करने के लिए। इसी तरह घास की भी जरूरत होती है। पारिस्थितिकी के हिसाब से सबको स्वस्थ जीवित रहने के लिए हवा, पानी और भोजन आवश्यक है। पालतू पशुओं के लिए चारा बोना आवश्यक है। जंगली घास पर जंगली जानवर तो रह सकते हैं, पर पालतू जानवरों के लिए इस चारे को उगाना पड़ता है। इसके बीज भंडार की भी आवश्यकता होती है। हमारे देश में इनके पालन-पोषण की इतनी बड़ी व्यवस्था नहीं है। जंगलों में जानवरों को चरने के लिए छोड़ा जाता है। उनके जीवित रहने का जंगल ही साधन है। जंगल भी साल भर हरे-भरे नहीं रहते। बारिश के अभाव में तो सूखा पड़ जाता है। मवेशी जगह-जगह पेट भरने के लिए भटकते हैं।

पानी और घास के उत्पादन में इन जानवरों के लिए कितनी अर्थव्यवस्था की जरूरत है, उसका अनुमान भी शायद ही किसी ने किया हो। इस पर अध्ययन की आवश्यकता है। कितनी भूमि इनके लिए सुरक्षित रह पाएगी, वह भी भविष्य का विषय है। इस सबका नियोजन अभी हो जाना चाहिए। इस गणना में हमने पालतू कुत्तों और बिल्लियों को छोड़ रखा है। जबकि वे भी हमारे सहचर्य हैं। इन्हें भी भोजन की जरूरत पड़ती है।

अक्सर देखने में आता है कि देश की राजधानी दिल्ली के महानगरीय जीवन में पशु खुले घूमते हैं। वे सड़कों पर जगह-जगह भटकते हैं। कहीं-कहीं तो ट्रैफिक को बाधित करते हैं। इनके मालिक इन्हें लावारिसों की तरह बाजारों में छोड़ देते हैं और जब दूध लेने की जरूरत होती है, तब घरों में ले जाकर उनसे दूध दूहते हैं। दिल्ली के शहर से जुड़े ग्रामीण इलाकों में इस तरह आवारा गाएं चलती-फिरती रहती हैं। हाल ही उत्तराखंड में यह देखा गया कि गायों को जंगलों में छोड़ दिया गया था, जहां वे जंगली चीतों और बाघों का शिकार हो रही हैं। इसके अलावा, आजकल जंगली जानवर भी खूंखार हो गए हैं। उनके लिए भी जंगलों में भोजन की कमी है, इसलिए वे इंसानों पर झपट रहे हैं। पूरे उत्तराखंड में जंगली सूअरों से लेकर बंदर, भालू खेती-बाड़ी का नुकसान कर रहे हैं। इनका वैज्ञानिक अध्ययन तक नहीं हुआ कि क्यों इनकी प्रवृत्ति इतनी हिंसक हो रही हैं।

मोटी बात यह है कि जंगलों की कटाई-छंटाई सड़कें बनाने के लिए हो रही हैं। जो बचे जंगल हैं, उन पर मशीनें दौड़ रही हैं। यातायात भी ज्यादा हो गया है। इसलिए जंगली जानवर खाने की तलाश में गांवों और कस्बों में घूम रहे हैं। पलायन की मार से जो गांव बचे हंै, वहां पर हिंसक जंगली जानवरों का आतंक हो गया है। खेतीबाड़ी में उत्पादन घट गया है। कहने का आशय यही है कि बढ़ती शहरी आबादी के घनत्व को थामना आज मुश्किल हो गया है। फिर पशुओं पर किसी का ध्यान नहीं है। जबकि वे हमारे भोजन और रहन-सहन में सहायक हैं। हम अपने बीच पशुपालन में एक संतुलन नहीं बना पा रहे हंै। किसी-किसी क्षेत्र में अतिरिक्त उत्पादन हो रहा है, जिसका हम निर्यात कर सकते हैं। उस पर भी ठोस योजना का अभाव है।

पालतू पशुओं को चारा-पानी उपलबध करा कर उनके स्वास्थ्य को बना कर ही उनकी संतति से लाभ पा सकते हैं। यह एक जीवन चक्र है, इसको नियमित बना कर ही विकास की सही राह पर चला जा सकता है। हाल ही में गौरक्षक अभियान ने ऐसे पशुओं को खुला छोड़ दिया है, जिनका भार संभालना उस मालिक के बस में भी नहीं है जो उसे पाल-पोस, उससे सब कुछ निचोड़ कर खुला छोड़ने में विश्वास रखता है। उन्हीं लोगों की वजह से परेशानियां भी पैदा हो रही हैं। जो अब किसी तरह से किसान के काबिल मवेशी नहीं रहता है, उसका ठिकाना आवारा जीवन ही रह गया है। उस जीवन की देखभाल करने वाला कोई नहीं है। कभी ऐसे जानवरों को ‘स्लॉटर हाउस’ पहुंचाया जाता था, वहां उनके चमड़े, मांस के उपयोग के अलावा उनकी हड्डियों की खाद बनाई जाती थी जो कृषि उपज में सहायक होता था। उसका उपयोग अब नहीं हो पा रहा है। इसलिए सरकार के पास कोई ठोस नीति होनी चाहिए, जिससे उन जानवरों की जीवन पर्यंत सुरक्षा का भार वह उठाए और जब उनके जीवन का अंत प्राकृतिक रूप से आए, तब उन्हें शांत मृत्यु का रास्ता दे। हमारी पशुओं के साथ न्याय की प्रक्रिया भी सही होनी चाहिए। आखिर वे हमारे पूरक हैं।

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