संपादकीय: किसका समाज

digamberbisht

सवाल है कि एक टोल प्लाजा के पास से शुरू हुई यह समूची घटना कितनी देर तक सड़कों के आसपास ही घटती रही और उस दौरान पुलिस किस मोर्चे पर सक्रिय थी?

मदद के बहाने वहां आए चारों आरोपियों ने युवती का सामूहिक बलात्कार किया था।

तेलंगाना के हैदराबाद में बीते बुधवार की रात एक पशु चिकित्सक युवती के सामूहिक बलात्कार और हत्या के बाद उसे जिंदा जला देने की घटना ने एक बार फिर समूचे देश को झकझोर दिया है। दूसरी ओर, इसके ठीक एक दिन पहले झारखंड के रांची में व्यस्त सड़क से बारह लोगों ने एक युवती का अपहरण कर सामूहिक बलात्कार किया। दोनों घटनाओं के बाद सक्रिय हुई पुलिस ने सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन सवाल है कि पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था किस हालत में थी कि आरोपियों को बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने में भी कोई हिचक नहीं हुई? हैदराबाद की घटना के संबंध में आई खबर के मुताबिक सड़क किनारे खड़ी की गई युवती की स्कूटी को पहले पंचर कर दिया गया। फिर मदद के बहाने वहां आए चारों आरोपियों ने युवती का सामूहिक बलात्कार किया और वहां से चालीस किलोमीटर दूर ले जाकर पेट्रोल डाल कर जला दिया। सवाल है कि एक टोल प्लाजा के पास से शुरू हुई यह समूची घटना कितनी देर तक सड़कों के आसपास ही घसटती रही और उस दौरान पुलिस किस मोर्चे पर सक्रिय थी?

करीब सात साल पहले दिल्ली में जब एक पैरामेडिकल छात्रा का सामूहिक बलात्कार और हत्या की घटना हुई थी, उस समय समूचे देश में इस अपराध के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया था। तब इस मसले पर गठित जस्टिस जेएस वर्मा समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा पर कानूनों को और सख्त बनाया गया। कई राज्यों में छोटी बच्चियों से बलात्कार के दोषियों को फांसी तक के कानूनी प्रावधान किए गए हैं। लेकिन तमाम कानूनी सख्ती के बावजूद इस अपराध पर काबू पाने की कोशिशें लगभग नाकाम दिखती हैं। इसी साल जुलाई में आई खबर के मुताबिक छह महीने में चौबीस हजार से ज्यादा बच्चियों के बलात्कार की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। दरअसल, एक गंभीर सामाजिक समस्या के रूप में बलात्कार के खिलाफ विचार और कानूनी पहलकदमियों की कमी नहीं रही है। लेकिन बलात्कार जैसे बेलगाम अपराध अपने आप में यह बताने के लिए काफी हैं कि एक ओर हमारा समाज स्त्रियों के प्रति अपेक्षित स्तर तक सभ्य और संवेदनशील नहीं हो सका है और दूसरी ओर सत्ता और प्रशासन इस मसले से निपटने में लगभग नाकाम रहे हैं।

यह बेवजह नहीं है कि तमाम सामाजिक चिंताओं और कानूनी कवायदों के बरक्स आज भी घर की दहलीज से बाहर निकलना महिलाओं को खौफ से भर देता है या फिर वे लगातार एक अनजान आशंका से गुजरती रहती हैं। हालांकि घर की चारदिवारी के भीतर वे कहां खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं! अनेक अध्ययन रिपोर्टों में यह उजागर हो चुका है कि बच्चियों से लेकर महिलाओं तक के यौन उत्पीड़न के ज्यादातर आरोपी उनके परिचित या संबंधी भी होते हैं। सवाल है कि जब घर के भीतर भी बच्चियां और महिलाएं असुरक्षित हैं तो बाहर एक ही तरह की मानसिकता वाले पुरुष समाज के बीच उनके महफूज होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है! क्या केवल कानूनी सख्ती से इस अपराध पर काबू पाया जा सकता है? जब तक सामाजिक विकास में पितृसत्तात्मक ग्रंथियों से बच्चों को मुक्त करने और स्त्री के अधिकारों का सम्मान करने की योजना पर केंद्रित विकास नीतियां लागू नहीं की जाएंगी, तब तक पुरुषों के भीतर की कुंठाएं महिलाओं के खिलाफ त्रासद घटनाओं को अंजाम देती रहेंगी!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

<!–

–>

Uttarakhand News Latest and breaking Hindi News , Uttarakhand weather, Places to visit in Uttarakhand जानने के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें ।
Next Post

राजनीति: कितने बोझ हैं पालतू पशु

Hindi News राजनीति राजनीति: कितने बोझ हैं पालतू पशु बढ़ती शहरी आबादी के घनत्व को थामना आज मुश्किल हो गया है। फिर पशुओं पर किसी का ध्यान नहीं है। जबकि वे हमारे भोजन और रहन-सहन में सहायक हैं। हम अपने बीच पशुपालन में एक संतुलन नहीं बना पा रहे हंै। किसी-किसी […]