योग दर्शन: त्रिगुणातीत और कर्म फल

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प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ में ये तीनों गुण या फिर तीनों में से दो गुण या एक गुण अवश्य होता है। जो जीव जिस गुण का अधिक उपयोग करता है, वह उसी के जैसा होता जाता है। ये तीनों आत्मा को बंधन में डालते हैं और तीनों ही गुण अनादि हैं।

प्रकृति का मूल सत्व, रजस, तमस है।

डॉ. वरुण वीर

अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानाम् पूरयोध्या।
तस्यां हिरण्य: कोश: स्वर्गो ज्योतिषावृत:॥ (अथर्ववेद)
परमात्मा द्वारा बनाया गया यह शरीर ही स्वर्ग है। जहां आठ चक्र और नौ द्वार हैं। इसी शरीर को आत्मा यानी देवताओं का निवास स्थान स्वर्ग कहा गया है। इसीलिए इस शरीर को अयोध्या कह कर देवता पुकारते हैं। संपूर्ण सृष्टि का निर्माण मनुष्य के लिए परमपिता परमात्मा ने किया है। इसी शरीर के आधार पर आत्मा अपने कर्मों के अनुसार सुख-दुख, स्वर्ग नरक भोगता है। स्वर्ग तथा नरक कहीं और नहीं, बल्कि इसी जीवन में देखने और भोगने को मिलते हैं। जीवन में अगर आनंद, उत्साह, निर्भयता, संतोष बना रहे, तो यही स्वर्ग है और अगर हिंसा, कलह, आलस्य, द्वेष, घृणा, अज्ञान आदि जीवन में है तो यही नर्क है। जीवन को स्वर्ग बनाने के लिए प्रकृति के तीनों गुणों को जानना जरूरी है, क्योंकि यही मनुष्य के कर्मों का आधार होते हैं। प्रकृति के तीन गुण- सत्व रजस तमस हैं।
मनुष्य की मानसिक स्थिति कभी एक जैसी नहीं रहती है। कभी सत्व गुण रजस तथा तमस को दबा कर रहता है, कभी रजस गुण सत्व तथा तमस को दबा कर और कभी तमस गुण सत्व तथा रजस गुण को दबा कर व्यवहार करता है। जब जिस समय जो गुण प्रभावशाली रहता है, आत्मा उसी दिशा में कर्म करती है।

प्रकृति का मूल सत्व, रजस, तमस है। गुणातीत होने पर मनुष्य मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। सभी मनुष्यों में ये तीनों गुण विद्यमान होते हैं, लेकिन कभी कोई गुण प्रबल होता है, तो कभी कोई गुण प्रधान होता है। तीनों एक साथ तथा एक ही मात्रा में कभी नहीं होते हैं। जो मनुष्य जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही जन्म मिलता है। कर्म तीन प्रकार के होते हैं सात्विक, राजसी तथा तामसी। प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ में ये तीनों गुण या फिर तीनों में से दो गुण या एक गुण अवश्य होता है। जो जीव जिस गुण का अधिक उपयोग करता है, वह उसी के जैसा होता जाता है। ये तीनों आत्मा को बंधन में डालते हैं और तीनों ही गुण अनादि हैं।

तत्र सत्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानध॥ (गीता)
सत्व गुण निर्मल होने के कारण प्रकाशक तथा रोगों से मुक्त है। सत्व गुण सुख तथा ज्ञान की आसक्ति में बांधने वाला है। राष्ट्र पर विपत्ति आ रही हो, देश में चारों ओर हाहाकार मचा हो, सारी व्यवस्थाएं चरमरा रही हों, लूटपाट, भ्रष्टाचार, हिंसा, तथा जनता पर अत्याचार हो रहा हो, लेकिन कोई प्रभु के भजन का आनंद उठा रहा हो, भक्ति रस में डूबा हुआ हो तथा राष्ट्र उत्थान के लिए कुछ
नहीं करता हो, तब यह है ज्ञान में आसक्ति। अंतिम लक्ष्य तो राष्ट्र तथा धर्म रक्षा करते हुए मनुष्य के दुखों को दूर करना है।
एक समय था जब सारा राष्ट्र भक्ति काल में डूब रहा था और विदेशी आक्रमणकारी भारत देश को रौंदने में लगे हुए थे। ऐसी सात्विक भक्ति का क्या अर्थ रह जाता है जब राष्ट्र ही सुरक्षित न रह पाए। जब राष्ट्र ही सुरक्षित नहीं रह पाएगा तब कैसे धर्म तथा संस्कारों की रक्षा होगी। साध्य प्रतिपक्षि-साधने पक्षपात: आसक्ति ज्ञान प्राप्ति जैसे सात्विक कर्म में हो तो भी वह आसक्ति ही है। यह है सुख संग तथा ज्ञान संग में बंधन। सत्वं सुखे संजयति सत्व गुण शांतिमय सुख के रास्ते में मनुष्य को जीत कर कर्महीन बना देता है। सत्व भी बंधन का कारण है। अच्छे पुण्य कर्मों का संचय सुख कारक है, लेकिन जन्म के बंधन में डालने वाला है। अच्छा शरीर, उत्तम परिवार, शिक्षित संतान, हितैषी बंधुओं, समृद्धिशाली जीवन, ईश्वर भक्ति तथा जीवन में ईश्वर के प्रति समर्पण सभी फल सात्विक कर्मों का परिणाम है। परम लक्ष्य में साधक तो हो सकते हैं, लेकिन विवेक पूर्वक तथा अनासक्त भाव से न होने से बंधन का कारण होते हैं। लेकिन रज् तथा तम् को त्याग कर सत्व गुण को ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि तमस से श्रेष्ठ रजस तथा रजस से श्रेष्ठ सत्व गुण है। अंत में सत्व को भी त्याग कर गुणातीत होना परमात्मा के साक्षात्कार में सहायक होता है।

लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पृहा
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥ (गीता)
रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, सदा कुछ करते रहने की इच्छा, एक काम समाप्त हुआ कि दूसरा कार्य आरंभ कर देना, अशांति और महत्त्वाकांक्षा का प्रबल होना रजोगुण का लक्षण है।
रजोगुण का फल दुख बंधन है। सुख अवश्य मिलता है, लेकिन उस सुख की सीमा होती है। सुख समाप्त होने पर राग उत्पन्न हो जाता है, जो द्वेष का कारण बनता है। मुख्य रूप से रजस गुण ही जीवन में उत्तेजना तथा निरंतर कर्म करने की प्रेरणा देता रहता है। यह गुण मनुष्य को शांति से बैठने नहीं देता और न ही आलस्य आने देता है। समस्त संसार में जो भी चमक, तृष्णा, हलचल, लोकेषणा तथा वितेषणा दिखाई देती है वह रजस गुण के कारण ही है। आरंभ में रुचिता, धैर्य त्याग, असत कर्मों का ग्रहण, निरंतर विषयों की सेवा में प्रीति, पांचों ज्ञानेंद्रिया जब अपने-अपने विषय में जाती हैं, तब राग उत्पन्न होकर उन्हें भोगती हैं। निरंतर भोगों को भोगने के कारण मन, बुद्धि सभी कुछ उसी के अनुसार कर्म करते हैं और वही आगे चल कर कर्मफल के रूप में हमें भोगने पड़ते हैं। अगर फल अच्छा लगता है तो उसके प्रति राग हो जाता है। बार-बार उसे भोगने की इच्छा होती है और अगर मन दुखदाई होता है, तब द्वेष के कारण घृणा पैदा हो जाती है। इसलिए राजसिक कर्म भी अनासक्ति भाव से ही भोगना चाहिए अन्यथा क्लेश का कारण होता है।

अप्रकाशोडप्रवृतिश्च प्रमादो मोह एव च
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।। (गीता)
सोचने पर भी तत्व ज्ञान का प्रकाश न होना, कार्य करने में प्रवृत्ति न होना, सदैव आलस्य तथा काम को टालने की प्रवृत्ति रखना और अगर काम किया भी तो लापरवाही से करना और मूढ़ता वश करना तमस के बढ़ने पर यह सब पैदा होने लगते हैं। हिंसा, आलस्य, क्रोध, मूर्खता, ईर्ष्या, चुगली आदि कर्म तमस की श्रेणी में आते हैं। अज्ञान का पैदा होना तथा उससे निकलने की चेष्टा न करना तम का भयंकर रूप है। योग मार्ग में दोनों गुण रजस, तमस बाधक हैं। सत्व गुण योग मार्ग में साधक है, लेकिन वह भी बंधनकारी है। उसमें सुख का बंधन है-

गुणानेतानतीत्य त्रीनदेही देहसमुद्भवान्
जन्ममृत्युजरा दु:खै विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥ (गीता)
शरीर में विद्यमान सत्व, रजस, तमस इन तीनों गुणों को पार करके जो जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे को दुख नहीं मानता तथा इन तीनों गुणों से छूट कर परमपिता परमात्मा के प्रेम में डूब कर अमृत रस पीता है। गुणातीत होने पर ही परमात्मा का साक्षात्कार आत्मा द्वारा संभव है, अन्यथा जन्म मृत्यु के चक्कर में पड़कर जीव सदा इस लोक में आता जाता रहता है तथा योग का उद्देश्य आत्मा से परमात्मा का योग नहीं हो पाता है।

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