कहानी: मटरमाला

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पीछे आ रहे वाहन वालों ने तो लड़कों को उनके गले से जंजीर खींचते हुए भी देखा होगा। पर उनकी मदद को कोई नहीं रुका था, न ही किसी ने लड़कों का पीछा किया।

उषा महाजन

बैंक की सीढ़ियां उतर, वे दाएं-बाएं देखते हुए सड़क पार करने को बढ़ी ही थीं कि ‘आंटी जी’ की आवाज सुन, एकदम पीछे मुड़ीं। वे कुछ समझ पातीं, इससे पहले ही ‘खचाक’! स्कूटर सवार दो लड़कों में से पीछे वाले ने उनके गले की सोने की जंजीर झटके से खींच ली। आंखें फाड़े, उन्होंने कोशिश कर चीखा, पर तब तक तो वे दूर निकल चुके थे। सड़क पार करते ही उनकी कॉलोनी का फाटक था। शायद गेट नंबर चार के दरबानों ने तो उनकी चीख सुनी भी होगी। पीछे आ रहे वाहन वालों ने तो लड़कों को उनके गले से जंजीर खींचते हुए भी देखा होगा। पर उनकी मदद को कोई नहीं रुका था, न ही किसी ने लड़कों का पीछा किया।
पसीने से तरबतर, हांफते हुए वे अपने दरवाजे तक पहुंचीं। कांपते हाथों से ताले के छेद में चाबी घुमाती वे लगभग बेहोश होने को थीं कि रोली की तालियों की आवाज ने उन्हें चौंका दिया, ‘दादीमां आ गई, दादीमां आ गई।’
‘तू अभी तक सोई नहीं? तेरी मम्मी ने कितनी बार कहा है तुझे, स्कूल से आकर, खाना खाकर थोड़ा रेस्ट करना, फिर खेलना, पढ़ना।’ हल्के से झिड़कते हुए उन्होंने रोली से आंखें चुराने की कोशिश की।
‘दादीमां, आप रो रहे हो, दादीमां?’ उनकी कांपती टांगों से लिपटते हुए, रोली एकटक उनके चेहरे को देख रही थी।
बच्ची को बाहों में भरते हुए वे धम्म से बिस्तर पर बैठीं और सचमुच ही सिसक-सिसक कर रोने लगीं। बच्ची भी रुआंसी सी हो, अपने नन्हे हाथों से उनके गाल सहलाते, आंखें पोंछते, पूछने लगी, ‘क्या हुआ दादीमां, आपको क्या हुआ दादीमां?’
बच्ची को कस कर अपने से लिपटाती, वे हिचकियां भरते बुदबुदाने लगीं, ‘पुत्तर, दो गुंडे लड़कों ने मेरे गले से मेरी कंठी झपट ली और मैं कुछ न कर सकी। मैं कुछ न कर …’
बच्ची हतप्रभ-सी उनको देखती रही और किसी सोच में डूब गई। फिर एकदम ही जैसे उसे कुछ सूझा, ‘दादी, दादी, आप रोओ मत, अच्छी दादी की तरह बिल्कुल चुप हो जाओ। मैं पापा से कह कर आपको नई कंठी दिला दूंगी। पापा मेरी सब बातें मान जाते हैं। आने दो पापा को। आज ही…’
‘नहीं रोली, नहीं!’ वे फिर फफक पड़ीं, ‘कैसे लाएगा तेरा पापा, मेरी कंठी? ये मेरे ब्याह पर चढ़ाई थी, मेरी सास ने। लॉकेट पर तेरे दादा जी का नाम खुदा था।’
रोली का नन्हा मन जितना समझ सकता था, उसके बावजूद वह इतना जान गई थी कि दादीमां उस वक्त बेहद कष्ट में थीं। दादी को किस तरह उनकी इस स्थिति से बहला कर बाहर लाए, वह इसी सोच में डूब गई। थपकियां देकर उन्हें चुप कराती, वह सहसा रसोई घर की ओर दौड़ी। और कुछ ही देर में सधे कदमों से चलती, हाथों में ट्रे लिए लौटी, ‘दादीमां, देखो मैं आपके लिए चाय बना कर लाई हूं।’
अपनी तंद्रा से जागते हुए वे एकदम कांपीं, ‘हाए नी, तूने गैस जलाई?’
‘नहीं दादी, मैं तो माइक्रोवेव में गरम करके लाई हूं आपकी चाय। देखो न। बहुत अच्छी बनी है। आप कहते हो न कि आप सब चीजों के बिना रह सकते हो, पर चाय के बिना नहीं रह सकते। तो पी लो न चाय।’
उन्होंने बच्ची को जोरों से अपने सीने से भींच लिया। उनके मुरझाए चेहरे पर एक अजब-सी मुस्कान उभरी और पत्ती तैरती ठंडी चाय को वे चुस्कियां लेते पी गर्इं।
लैंडलाइन फोन की घंटी बजी, तो रोली ही दौड़ कर उठाने गई। डगमगाते कदमों से, फोन की तरफ दौड़ने में किसी तरह उसका मुकाबला करने की कोशिश करती, वे चिल्लार्इं, ‘रोली, मम्मी को मेरी कंठी का मत बताना। वह दफ्तर में परेशान हो जाएगी।’ पर रोली ने तो रिसीवर उठाते ही पहली बात वही बता दी मम्मी को।
शाम को बेटा-बहू दोनों साथ ही लौटते थे घर। बहू का दफ्तर दूर था, गाड़ी वही ले जाती थी। जाते हुए विनय को रास्ते में छोड़ती और लौटते में ‘पिकअप’ कर लेती थी।
अगर रोली की बात सच भी हुई, तो भी वे अपने बच्चों पर फालतू खर्च का बोझ नहीं डालने वाली। क्या करना था इस उम्र में नई कंठी लेकर! दुख तो बहुत हुआ ही होगा उन दोनों को। अब नई कंठी का और बोझ उन पर डालने का तो वे सोच भी नहीं सकती थीं। यह तो रोली अभी बच्ची है। बेचारी क्या जाने कि आज के जमाने में लोग कैसे अपना घर चलाते हैं।
ट्रिंग ट्रिंग… घंटी बजी थी। तो आ गए थे विनय और सुनीता। उन्होंने उठ कर दरवाजा खोला। उनकी तरफ निरपेक्ष-सी नजर डालती, बिना कुछ कहे-सुने सुनीता अपने बेडरूम की ओर बढ़ी और पर्दा सरकाती भीतर हो ली।
पीछे-पीछे ही विनय भी आ पहुंचा था। कार की चाबी साइडरैक पर रखे कटोरे में डाल, वह सोफे पर धम्म से बैठ गया और जूतों के फीते खोलने लगा, ‘मां, आपको किसने कहा था दोपहर के वक्त बैंक जाने को? जब देखो तब आप बैंकों के चक्कर लगाती रहती हो! पुलिस में एफआईआर तो लिखा दी न आपने? पुलिस स्टेशन तो पास ही था!’ जूतों को कोने में सरकाते हुए वह एक ही रौ में बोलता गया था।
‘फार्म 15 एच जमा करने गई थी बेटा।’ रुआंसी-सी हुई वे बोलीं, ‘एफआईआर लिखाने से क्या वापस आ जानी थी मेरी कंठी?’
‘मिलती नहीं, तो भी क्राइम का एक केस तो दर्ज होता! ऐसे ही लोग दर्ज नहीं कराते मामले और पुलिस कहती है कि उनके इलाके में अपराध नहीं बढ़े।’
उसकी बात बिना सुने ही वे चाय बनाने के लिए रसोईघर की ओर बढ़ गर्इं।
चाय की ट्रे खाने की मेज पर रख वे बेटा-बहू को बुलाने के लिए उनके कमरे की ओर बढ़ी ही थीं कि कानों में जैसे सीसा ही पिघल गया हो। सुनीता बोल रही थी और विनय चुपचाप सुन रहा था, ‘मैंने सोचा था मांजी यह चेन मुझे दे देंगी, लेकिन वे तो अपने सारे गहनों पर सांप की तरह बैठी हुई हैं। कुछ बैंक के लॉकर में डाल रखा है, कुछ खुद पर लादे हुए हैं। अब कहीं इनकी चूड़ियों के लिए कोई इनके हाथ ही…’
गुस्से और दुख से उनका पोर-पोर दहकने लगा।
नहीं उतारेंगी वे अपनी चूड़ियां। आएगा कोई छीनने, तो खुद उतार कर पकड़ा देंगी उसको। पर इसे तो नहीं ही देंगीं, इस घुन्नी को। सामने कुछ नहीं कहती, पीठ पीछे कान भरती रहती है, खसम के। और बेटा उनका भी, पूरा झुड्डू है। उसकी ही सुनेगा। सही-गलत की भी पहचान नहीं। कभी जी होता है खुल कर, चिल्ला-चिल्ला कर कह दें वे सब कुछ। सारी भड़ास निकाल लें मन की। पर, वे अपने बेटे से इतना डरती क्यों हैं!
निकाल देंगे क्या घर से! पर घर तो उन्हीं के नाम पर है। पूरी लिखा-पढ़ी के साथ। दूरदर्शिता थी इसके पापा की, जो अपने जीते-जी वसीयत करा गए और रजिस्टर भी करा गए कि उनके मरने के बाद इस घर का और बैंक में जमा सारे पैसे का मालिकाना उनकी पत्नी का था और उसके मरने के बाद बेटे और बेटी का बराबर-बराबर।
इन्हें तो इतना भी सब्र नहीं कि उनके ऊपर जाने का इंतजार कर लें। कोई न कोई बहाना कर एफडी तुड़ाने को कहते रहेंगे। उन्होंने भी समझदारी की कि सारा पैसा बैंक की सीनियर सिटीजन स्कीम में लगा दिया और पोस्ट आॅफिस की मासिक आय वाली स्कीमों में।
वे तो अब इतना तंग आ गई थीं इनको झेलते-झेलते और दिन-रात की तनातनी से कि जी में आता था कि कह दें कि अपना अलग इंतजाम कर लें। पर कभी कह नहीं पातीं। पता नहीं क्यों अकेले पड़ने के डर से वे कांप उठती हैं। इन दोनों का साथ छूटने के डर से नहीं, रोली से बिछुड़ने के डर से। स्कूल से लौट कर उन्हीं के साथ तो रहती थी बच्ची दिन भर। उन्हीं के साथ सोती भी थी। ये दोनों शाम को जब तब निकल जाते। रोली तो उन्हीं के साथ रहती तब भी।
हां, जब मम्मी-पापा दफ्तर से आते, तब जरूर दौड़ पड़ती उनके कमरे में। और मां-बाप दोनों ही बारी-बारी गोद में बिठा दिन भर की बातें पूछते, लाड़ लड़ाते।
उन्हें भी न जाने क्यों कान लगा कर सब कुछ सुनने और तांकझांक करने की आदत हो गई थी।
‘पापा, आपको पता है- दादीमां के गले से दो गंदेवाले लड़कों ने उनकी कंठी खींच कर छीन ली। दादीमां दौड़ नहीं पाती न। इसलिए वे लेकर भाग गए। दादीमां रो रही थीं। मैंने बोला आप रोओ मत दादीमां, मेरे पापा आपको नई वाली कंठी ले देंगे। मेरी वाटर बाटल गुम हुई थी तो आपने नई ले दी थी ना!’
विनय की आवाज नहीं आई थी। बहू ही भड़की थी, ‘हम क्यों लेकर दें? उनसे बोल जाकर अपने बैंक के लॉकर से निकाल लाएं दूसरी। और वह भी कोई खींच कर ले जाएगा…’
रोली रुआंसी-सी हो कमरे में लौट आई थी और अपनी गुड़ियों से खेलने लगी थी। घर में लगभग सन्नाटा-सा छाया रहा था, पूरी शाम।
दिन में खाना बना कर वे रख देती थीं। गर्म करके लगाना सुनीता का काम था। रात के खाने से पहले रोली अपना बचा हुआ होमवर्क करती और फिर अपना स्कूल बैग ठीक करती। पर आज तो अपने क्राफ्ट की चीजों की उथल-पुथल ही करती जा रही थी तब से। जो ढूंढ़ रही थी, वह मिला, तो ऐसे फुदकी जैसे कोई खजाना ही हाथ आ लगा हो, ‘दादी आप बाहर जाओ। अपना सीरियल देखो न। मुझे अपना काम करना है। आप डिस्टर्ब करोगे।’
अपनी बेइंतहा उदासी में भी वे हंस पड़ी थीं।
बस इसी बच्ची के कारण तो जुड़ी हुई थीं वे इनसे, इन निकम्मे बेटा-बहू से।
‘अरी रोली, तू तो पढ़ नहीं रही है! यह क्या कर रही है, सारा तामझाम बिखेरे?’ पल भर को अपना गुस्सा, दुख और आवेश भुलाते हुए वे रोली की ओर बढ़ी ही थीं कि रोली ने अपनी चीजें छिपाते हुए, उनकी ओर मुंह करके कहा, ‘दादी जी, प्लीज इधर मत आना। सीक्रेट है। आप आए, तो मैं आपसे एकदम कट्टी। कभी नहीं बोलूंगी।’
‘अच्छा बाबा’, और वे कमरे से बाहर हो लीं।
खाना खाने के बाद भी रोली अपने उसी काम में जुटी रही थी और उनको हिदायत थी कि वे दूसरी तरफ मुंह करके बत्ती जले जले ही सो जाएं।
‘तुझे नहीं सोना क्या? कल स्कूल है तेरा। सो जा अब आके। ऐसा भी क्या जरूरी काम कर रही है!’
उन्होंने हल्के से फटकारा, तो बोली, ‘आपको क्या? बहुत जरूरी काम है। कहा न, आप उस तरफ मुंह करके सो जाओ।’
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उनकी जंजीर खिंचने की खबर जंगल की आग की तरह पूरे मुहल्ले में फैल गई थी। प्रेस वाली कपड़े लेने आई तो घूरती रही उनको, ‘बीबी जी, आपका सूना गला अच्छा नहीं लगता। नकली ही पहन लो कोई चैनी। दो ढाई सौ रुपए में मिल ही जाएगी। यहीं बिग बजार से ले लो न। बहुत मिलती हैं वहां। जैन बीबी जी तो वही पहनती हैं आजकल। उनकी चैन भी तो खिंच गई थी पिछले साल, बी-टेन बजार के ठीक सामने। मंदिर जा रही थीं बेचारी। अच्छा बीबी जी, थाने में रपट लिखाई आपने?’
‘थाने में रपट लिखाने से क्या होना था, शांति! मेरी कंठी वापस तो नहीं आ जानी थी।’
‘ठीक कहते हो, बीबी जी। जैन बीबी जी गई थी थाने रपट लिखाने, अपने साहब के साथ। घंटों बैठा कर रखा उनको, तिस पर भी नहीं लिखी। बोले- कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने पड़ेंगे, अगर एफआईआर लिखाई तो। तब बेचारे लौट आए।’
बेटी को भी शायद विनय ने ही खबर की होगी। उसका भी फोन आया, ‘मम्मा, मैं तो चेन वेन पहनती ही नहीं हूं। मेरे पास दो-दो चेनें पड़ी हैं। जब आऊंगी दिल्ली, तो लेती आऊंगी आपके लिए।’
‘अरे नहीं, बेटा। मुझे चाहिए ही नहीं।’
‘अरे मम्मी, आपकी ही दी हुई हैं। कोई कुछ नहीं कहेगा।’
लाचार-सी हो, वे बात बदलने लगीं, ‘काम कैसा चल रहा है आजकल रोहित का? पिछले साल से तो अच्छा ही है बिजनेस का माहौल आजकल… अच्छा बेटा, रोली की बस का टाइम हो गया। फिर करूंगी फोन तुझे…’
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रोली को इतना उत्साहित, घर में घुसने को इतना आतुर पहले कभी नहीं देखा था उन्होंने? दरवाजा खोलते ही झट घुस गई अपने कमरे में।
‘दादीमां, दादीमां, आपको जब तक मैं न बुलाऊं, तब तक आप कमरे में मत आना। ठीक है!’
‘नहीं, बिलकुल ठीक नहीं है। पहले कपड़े बदल ले। खाना खा ले, फिर खेल में लगना, समझी…’ उन्होंने कुछ झल्ला कर कहा।
दरअसल, सुबह से ही उनका मूड कुछ ठीक नहीं चल रहा था। बेटा बिना नजर मिलाए ही, ‘अच्छा मां’ कह कर निकल गया था। सुनीता ने तो उतनी भी जहमत नहीं उठाई। अपनी ही धुन में दरवाजा पीछे से खींच कर बंद किया और चल दी दफ्तर के लिए। आखिर कितना सह सकती थीं वे! रह लेंगी अकेली। दुनिया में हजारों औरतें अकेली रहती हैं। अपने ही घर में वे उनकी गुलाम बन कर नहीं रह सकतीं अब और।
इसके बाद अगर दोनों में से किसी ने भी बेइज्जती की उनकी, तो साफ कह देंगी कि वे अपने रहने का अलग इंतजाम कर लें। घर तो आखिर उनका है यह। ले जाएं रोली को भी साथ। रह लेंगी वे उसके बिना भी। नाहक ही वे भ्रम पाले हुए थीं। रोली से भी अपना लगाव अब धीरे-धीरे कम कर लेंगी वे।
वे चिल्लार्इं, ‘रोली, आ जाओ खाना खाने। मैं और बैठ नहीं सकती यहां, तेरी राह देखती। थकी पड़ी हूं मैं। मुझे भी तो आराम करना है।…’ यह क्या हो गया था उन्हें? बच्ची भी आखिर क्या समझ पाएगी कि उनके मन में क्या चल रहा था। कुछ आर्द्र से स्वर में उन्होंने फिर पुकारा, ‘रोली, अब तो आ ही जाओ खाना खाने। कबसे बुला रही हूं।’
अबकी बार रोली चली ही आई, हाथ पीछे किए, कुछ छिपाए, धीरे-धीरे, मटकते-मटकते हुए, ‘आती हूं, आती हूं, दादीजी!’
मुस्कुराते हुए वह उनकी कुर्सी के पीछे जाकर खड़ी हो गई और बोली, ‘दादीमां, प्लीज मुंह उधर ही रखना। और दोनों आंखें बंद कर लेना अपनी। आपके लिए बड़ी सरप्राइज की चीज है।’
वे कुछ कहतीं-पूछतीं, उसके पहले ही रोली ने उछल कर उनके गले में कुछ डाल दिया और फुदक कर सामने आई और उनकी कुर्सी की बांह को अपने दोनों नन्हे हाथों से थाम उन्हें ऐसे देखने लगी जैसे किसी नई-नवेली दुल्हन को पहली बार देख रहा हो कोई, ‘दादीमां, आप कितनी प्यारी लग रही हो, एकदम स्वीटीपाई। आपकी वाली कंठी से तो कितनी ज्यादा सुंदर है न ये मेरी बनाई वाली कंठी? है न?’
वे कभी बच्ची को देखतीं, कभी अपने गले में पड़ी प्लास्टिक के रंग-बिरंगे मनकों/ मोतियों की मटरमाला को।
कुर्सी पीछे खिसका, उन्होंने रोली को उठा अपनी गोद में बैठा लिया और अपनी छाती से भींचते हुए, चुंबनों से उसकी गालें भर दीं, ‘हाय नी मेरी बच्ची, हाय नी मेरी लाडो… हाय नई मेरी जान… तो यही वाला क्राफ्ट का काम तू कल रात भर करती रही, मुझे बत्ती जले जले ही सुला कर?’
बरसात में निकली धूप की तरह उनका मुस्कराता चेहरा अविरल बहते आसुंओं से सराबोर हो रहा था।

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