प्रसंग: गांधी और रवींद्रनाथ

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दूसरी तरफ गांधी भी दक्षिण अफ्रीका में फिनिक्स, टॉल्सटॉय जैसे आश्रम तो भारत में साबरमती, सेवाग्राम जैसे आश्रमों की स्थापना कर आश्रमवासी जीवन पद्धति को सामने लाते रहे। गांधी ने भी अपने आश्रमों में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा को ही रखा।

श्रीभगवान सिंह

स्वभावगत विरोधी प्रवृत्ति के आधार पर साहित्य और राजनीति को या फिर साहित्यकार तथा राजनीतिज्ञ के मेल को असंभव-सा माना जाता रहा है। पर बींसवी सदी में गांधी और रवींद्रनाथ के आपसी गहरे अंत:संबंधों ने साहित्य और राजनीति के सुंदर समवाय का उदाहरण प्रस्तुत कर इसे संभव कर दिखाया।
लगभग बीस वर्षों तक मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ रंगभेद, नस्लभेद के आधार पर गोरी सरकार द्वारा किए जा रहे अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध सत्याग्रह-संग्राम चला कर न केवल भारत, बल्कि विश्व में प्रसिद्ध हो चुके थे। दूसरी तरफ 1913 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर रवींद्रनाथ विश्वकवि के रूप में समाद्धृत हो चुके थे। अपने-अपने कार्यों से ये दोनों ही एक-दूसरे को सम्मोहित कर रहे थे।

यही कारण था कि जब 9 जनवरी, 1915 को गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत आए, तो वे उसी साल फरवरी में करीब एक महीना तक अपने साथियों के साथ रवींद्रनाथ के सान्निध्य में शांति निकेतन में ठहरे रहे। इस दौरान दोनों ही एक-दूसरे के कार्यों तथा विचारों को परखते रहे और अपने बीच एक सामान्य भारतीय मनोभूमि और चित्तवृत्ति की उपस्थिति पाकर वे एक-दूसरे के समीप होते गए। परस्पर वैचारिक समरूपता का ही परिणाम हुआ कि गांधी रवींद्र को ‘गुरुदेव’ कहने लगे तो रवींद्र गांधी को ‘महात्मा’।

एक-दूसरे के प्रति आदर-भाव से इतने ओत-प्रोत होने के बावजूद न महात्मा ‘गुरुदेव’ के अंध शिष्य बने रहे, न रवींद्र ‘महात्मा’ के अंधभक्त। देशहित और विश्व हित से जुड़े ऐसे कई मुद्दे थे, जिन्हें लेकर दोनों में वैचारिक टकराव भी होते रहे। इनके बीच जबर्दस्त वैचारिक टकराव तब सामने आया जब 1920 में गांधी ने पूरे देश में ब्रिटिश शासन को अपदस्थ कर स्वराज्य के लिए असहयोग आंदोलन छेड़ दिया। इस आंदोलन के दौरान गांधी देश में घूम-घूम कर सरकारी नौकरियों तथा शिक्षण संस्थानों का परित्याग करने, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने की जोरदार गुहार लगाने लगे।

परिणामस्वरूप उस समय देश के जाने-माने बैरिस्टरों ने वकालत छोड़ दी, विद्यार्थियों ने सरकारी विद्यालयों-महाविद्यालयों का परित्याग कर दिया और जनता विदेशी वस्तुओं की होली जलाने लगी। ऐसे कार्यों से विश्वकवि का चित्त उद्विग्न हो उठा और इसमें उन्हें अंधराष्ट्रवाद का जहर दिखाई पड़ने लगा। इसके प्रतिरोध में उनका एक लेख ‘सत्य का आह्वान’ नाम से ‘मार्डन रिव्यू’ नामक पत्रिका के अक्तूबर अंक में छपा। इस लेख में रवींद्रनाथ ने भारत की दीर्घकालीन सहिष्णुता, तितिक्षा, उदात्तता की परंपराओं का उल्लेख करते हुए विदेशी वस्तुओं को जलाने जैसे कार्य को अंधराष्ट्रवाद का लक्षण बताया। गांधी द्वारा मशीनों के बदले चरखे को अपनाए जाने के तर्क को अव्यावहारिक, प्रगतिविरोधी बताया। यानी रवींद्र गांधी की असहयोग-रणनीति से पूरी तरह सहमत नहीं थे।

रवींद्रनाथ की असहमतियों का उत्तर देते हुए गांधी ने ‘यंग इंडिया’ के तीन अक्तूबर 1921 के अंक में ‘महान प्रहरी’ नाम से लेख लिखा, जिसमें उन्होंने राष्ट्रवाद, विश्वहित तथा चरखे को लेकर रवींद्रनाथ द्वारा उठाई गई शंकाओं का निराकरण करते हुए बताया कि कैसे चरखे को अपना कर करोड़ों देशवासियों को रोजगार दिया जा सकता है, देश को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाया जा सकता है और स्वावलंबी होकर ही भारत स्वराज्य के योग्य हो सकता है।
इन दो महान विभूतियों की आपसी असहमति में भी जिस उच्च धरातल पर एक-दूसरे के प्रति आदर और सम्मान के भाव व्यक्त हुए हैं, वही तो किसी की महानता के लक्षण होते हैं।

चरखे या विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को लेकर रवींद्र गांधी की सफलता के प्रति जरूर सशंकित थे, पर देशहित के अन्य मुद्दों पर वे गांधी का समर्थन करने में पीछे नहीं रहे। उल्लेखनीय है कि जब अगस्त, 1932 में ब्रिटिश सरकार ने अस्पृश्यों को पृथक निर्वाचन मंडल देने की घोषणा कर डाली, तो गांधी ने इसके प्रतिरोध में 20 सितंबर, 1932 से यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया, जिससे पूरा देश हिल उठा। देश के बड़े-बड़े नेता गांधी और आंबेडकर के बीच समझौता कराने के लिए दौड़-धूप करने लगे। रवींद्रनाथ भी शांति निकेतन में शांत होकर बैठे नहीं रह सके और गांधी को समर्थन देने पूना पहुंच गए।

वहां की एक सार्वजनिक सभा में भाषण करते हुए रवींद्रनाथ ने कहा- ‘‘आज हम युगों से चली आई दासता के उस बोझ को, जिसने मानवता का तिरस्कार किया, उन झुकी हुई पीठों से उतारने में, जो इस कालिमा के शिकार केवल अपने जन्म के कारण हुए, महात्मा जी के दिव्य कार्य में दृढ़ संकल्प होकर सहयोग दें। हम केवल भारत की नैतिक गुलामी की जंजीरों को नहीं तोड़ रहे हैं, बल्कि समस्त मानवता का भी पथ प्रदर्शित कर रहे हैं। हम अन्याय को चुनौती दे रहे हैं, चाहे वह जिस रूप में जहां कहीं हो कि वह हमारी अंतरात्मा की उस चिरंतन पुकार का उत्तर दे, जो महात्माजी ने हमारे जीवन में प्रस्थापित की है।’’

रवींद्रनाथ और गांधी की जीवन दृष्टि में यह सादृश्यता भी थी कि दोनों ही पश्चिमी शिक्षा से बखूबी परिचित होने के कारण उसे भारत की दीर्घकालीन चित्तवृत्ति के अनुरूप कल्याणकारी नहीं मानते थे। कोलकाता में अंग्रेजी शिक्षा के विशालकाय विश्वविद्यालयी भवनों के होने के बावजूद रवींद्रनाथ ने 1901 में कोलकाता से दूर बोलपुर के वन प्रांत में भारत की आश्रमवासी परंपरा में शिक्षा के लिए शांति निकेतन की स्थापना की, जहां मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया गया। दूसरी तरफ गांधी भी दक्षिण अफ्रीका में फिनिक्स, टॉल्सटॉय जैसे आश्रम तो भारत में साबरमती, सेवाग्राम जैसे आश्रमों की स्थापना कर आश्रमवासी जीवन पद्धति को सामने लाते रहे। गांधी ने भी अपने आश्रमों में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा को ही रखा।

इस संबंध में गांधी ने जो एक अनोखा काम किया वह था राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को पढ़ने-जानने को समर्थन देना। भारत आकर वे राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का प्रचार करने लगे। 1918 में इंदौर हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष बनाए जाने पर उन्होंने पत्र लिख कर रवींद्रनाथ से भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के संबंध में मंतव्य मांगा था, जिसका उत्तर देते हुए उन्होंने लिखा- ‘‘अंत:प्रांतीय व्यवहार के लिए निश्चय ही हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।’’ यही नहीं, गांधी की प्रेरणा से रवींद्र हिंदी सीखने लगे और उन्होंने अप्रैल 1921 में काठियावाड़ में अपना पहला हिंदी भाषण दिया।

यह भी उल्लेखनीय है कि रवींद्रनाथ और गांधी दोनों के ही चिंतन, जीवन-बोध का मुख्य आधार भारतीय वांग्मय रहा। वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत के सार तत्व को गांधी ने भी ग्रहण किया और रवींद्रनाथ के जीवन दर्शन में भी यही पाथेय स्वरूप रहे। ‘गीतांजलि’ के संबंध में गांधीजी कहा करते थे कि उसमें उपनिषदों का निचोड़ है।

जाहिर है, कुछेक मतभेदों के बावजूद रवींद्रनाथ और गांधी के बीच परस्पर पूरकता का जीवन-बोध ही प्रमुख था। इसे प्रसिद्ध निबंधकार कुबेरनाथ राय ने अत्यंत सुविचारित ढंग से रखा है जो गौरतलब है- ‘‘गांधीजी और रवींद्रनाथ दोनों का मौलिक उद्देश्य था जीवन को बढ़ती हुई यांत्रिक जटिलता, असहजता और अऋजुता से मुक्त करके उसे पुन: सहज, सरल और निर्मल रूप में प्रतिष्ठित करना। आधुनिक शिक्षा-प्रणाली हमारे आंतरिक जीवन को और अधिक विखंडित, असहज और जटिल करती है। इसी से गांधीजी, रवींद्रनाथ दोनों ने विश्वविद्यालय मुक्त शिक्षा की कल्पना की थी। रवींद्रनाथ का श्रीनिकेतन और गांधीजी की बुनियादी तालीम तथा मातृभाषा पर जोर दोनों इस दिशा में समान चिंतन के फल हैं। दोनों की शिक्षा संबंधी परिकल्पना एक-दूसरे से मेल खाती है।… यही कारण है कि गांधीजी और रवींद्रनाथ दोनों ‘दो’ होते हुए भी एक ही तरह का जीवन ‘आश्रम जीवन’ जिए और जीने का उपदेश दे गए।’’

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