परिसर का परिवेश

digamberbisht

गांधीजी द्वारा लगाया गया बुनियादी शिक्षा का बिरवा न सिर्फ गमलों तक सीमित रहा, बल्कि सुखा दिया गया। क्या युवा स्वप्न को पूरा करने में शिक्षण संस्थाओं की भूमिका अब केवल डिग्री देने तक सीमित रह गई है?

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय-जेएनयू (फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस फाइल फोटो)

शोभा जैन

बढ़ती आबादी के अनुपात में शैक्षिक संस्थाएं खोलना, उनमें शिक्षा का उत्कृष्ट वातावरण उपलब्ध कराना लंबे समय से सरकारों के लिए चुनौती है। इससे पार पाने के लिए निजी हाथों को शिक्षा संस्थान खोलने की छूट दी गई। इसका नतीजा यह हुआ कि शिक्षा महंगी होती गई। आम लोगों की पहुंच से दूर होती गई। निजी संस्थानों की नजीर लेकर सरकारी संस्थानों पर भी दबाव बनना शुरू हुआ कि वे उत्कृष्ट संसाधन जुटाएं। पर इसके लिए धन की व्यवस्था करने की जो जिम्मेदारी सरकारों पर है, वे उससे हाथ खींचने लगीं। इसी का नतीजा है कि तमाम कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शुल्क बढ़ाए जा रहे हैं। स्वाभाविक ही इसे लेकर कई जगह आंदोलन भी चल रहे हैं।

हमारे देश में धन की बर्बादी को विकास की लागत माना जाता है। खजाने में पैसे की आवक केवल और केवल एक नया सुविधा तंत्र रचती नजर आती है। इसका एक टुकड़ा शिक्षा के नाम पर डाल कर अपने जिम्मेदार होने का प्रमाण बताया जाता है। छिलके उतारे जाएं, तो सरकार पोषित अनेक शिक्षण संस्थानों के बजट और शिक्षा पर किए गए खर्च की वास्तविक परतें खुल कर सामने आएंगी। शिक्षा खर्च का भार उन युवाओं के कंधे पर डाला जा रहा है, जो अभी भार वहन करने के योग्य बनने की दौड़ में हैं। शायद इसीलिए युवा दिशाहीन होकर आमदनी के लघुपथ अपनाने पर विवश हो जाते हैं। हमारे देश में जब भी उपेक्षा और अपमान पर विमर्श होता है, तो दो विषय सर्वप्रथम उभर कर सामने आते हैं। पहला स्त्री और दूसरा शिक्षा। जहां स्त्री की समानता और उत्थान के वचन लिए और दिए जाते हैं, वहीं शिक्षा के अधिकार और सुविधाओं की बातें मंच पर दोहराई जाती हैं, बिना इस बात पर विचार किए कि अधिकार के साथ सहूलियत भी चाहिए।

एक तरफ हम ‘जागो भारत के युवा’ के नारे लगाते हैं और चाहते हैं कि वे अन्याय विरोधी बनें। एक ऐसा समाज हम अपने देश में चाहते हैं कि अगर कोई अध्यापक अपनी कक्षा में यह सवाल करे कि मैंने एक रुपए के चार सेब खरीदे और उन्हें चौगुने दाम पर बेचा, तो मुझे क्या मिलेगा? तो सारी कक्षा एक साथ एक स्वर में कह उठे कि आपको दो वर्ष का कारावास भी। मगर इस जवाब को सुनने के लिए जागरूक शिक्षार्थी के रूप में कीमत चुकानी होगी, वह क्या और कितनी, यह बड़ा सवाल है।

हमारे पास जो समाज है, उसकी परिभाषा समाजशास्त्र के किसी कोश में नहीं। बढ़ती महंगाई ने हर बुनियादी जरूरत की चीज की कीमत बढ़ा दी। कीमत इतनी कि उसमें ‘मूल्य’ दिखाई ही नहीं पड़ते। शिक्षा, जिसमें मूल्यों की खोज जारी है, इस महंगाई से अभिशप्त है। और हम इसी के दम पर भारत के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण की कल्पना करते हैं। देश के युवा अपनी किसी भी ‘असहमति’ को विरोध, फिर विद्रोह में बदलते, कभी-कभी प्रतिशोध की अग्नि में स्वयं की आहुति दे देते हैं। यह शिक्षा इन्हें दे क्या रही है, सिवाय डिग्री के?

आजादी के बाद भारत सरकार द्वारा गठित शिक्षा आयोग ने कहा था कि भारत का भविष्य उसकी कक्षाओं में निर्मित हो रहा है, पर इस निर्माण की कीमत क्या है? हाल ही में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में फीस बढ़ाए जाने पर विवाद गरमाया हुआ है। कैसा लगता है, जब इस तरह का परिवेश देश के युवाओं के सामने निर्मित होता है, जब उन्हें अपने बुनियादी अधिकारों की सहूलियत के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जिसमें छात्रों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। ये छात्र अगर इस संघर्ष में हार गए, तो इन्हें वैसे भी घर लौटना ही पड़ेगा, इसलिए छात्रों के पास लड़ने के अलावा अब कोई विकल्प नहीं बचा है। गांधीजी ने कहा था कि ‘शिक्षा में मनुष्य में निहित उसके सर्वश्रेष्ठ को बाहर लाने की क्षमता है।’ पर यहां असहमति के बदले युवा विद्यार्थियों का रोष, आक्रोश, और विरोध बाहर निकल कर आ रहा है। यह सर्वश्रेष्ठ तो नहीं। शिक्षा, जिसे देश के भविष्य पर एक निवेश की तरह माना जाता है, अपनी ही संभावनाओं से संघर्ष कर रही है।

भारत में शिक्षा निशुल्क हो, यह एक स्वप्न है। जिस देश के मंत्री, विधायक, सांसद और हर वह नेता, जो सीधे प्रशासन से जुड़ा है, सुविधाओं के सागर में डुबकी लगाता है। सुविधाएं भी ऐसी कि पेट का पानी तक न हिले। बावजूद इसके, उनके खजाने में प्रति माह मोटा वेतन जाता है। मुफ्त घर, बिजली, टेलीफोन आदि सुविधाएं मुहैया हैं। ऐसे में उन दिहाड़ी मजदूरों के बच्चे या स्वयं दिहाड़ी मजदूर विद्यार्थी, जिनके लिए कीमतों का बढ़ना किसी दैवीय प्रकोप से कम नहीं, जिनकी सालाना कमाई ही सवा लाख से ऊपर नहीं, सुविधाएं तो उनके लिए किसी सुखद स्वप्न की तरह हैं, क्या शिक्षा
बजट बढ़ाने की त्वरित मांग नहीं करता? सामाजिक असमानता की खाई को गहराता यह मुद्दा केवल अच्छी शिक्षा के अधिकार की नहीं, सहूलियत की भी मांग करता है।
दरअसल, फीस बढ़ाने का असर सभी शिक्षण संस्थाओं पर होगा। मौलाना आजाद ने नेहरू से कहा था कि अगर हमें पढ़ा-लिखा हिंदुस्तान रचना है, तो शिक्षा का बजट भी उतना कर दीजिए जितना सेना का बजट है। मगर हमने शिक्षा के बजाय शस्त्र को, अक्षर के बजाय अणु शस्त्र को ज्यादा महत्त्वपूर्ण माना। हर जगह शिक्षा की यही स्थिति है। गांधीजी द्वारा लगाया गया बुनियादी शिक्षा का बिरवा न सिर्फ गमलों तक सीमित रहा, बल्कि सुखा दिया गया। क्या युवा स्वप्न को पूरा करने में शिक्षण संस्थाओं की भूमिका अब केवल डिग्री देने तक सीमित रह गई है? पीएचडी के दौरान शोधार्थियों के साथ होने वाला व्यवहार और वे नाजायज शर्तें, जो अक्सर सामने ही नहीं आती, इनकी परतें खोली जाएं, तो शिक्षा स्वयं शर्मसार हो जाएगी।

सरकार द्वारा वित्त पोषित शिक्षण संस्थानों का करोड़ों का बजट होने के बावजूद उनकी दशा इतनी दयनीय है कि अध्ययन कक्ष से लेकर शौचालय तक का उपयोेग किसी दंड भोगने की तरह लगता है। उस पर कभी फीस तो कभी भाषा के विवाद से जूझना युवाओं की समय और ऊर्जा दोनों की बर्बादी है। बेहतर हो कि शिक्षा विवादों का पुलिंदा न बन कर दफ्तर, संस्थागत खर्चों, प्रशासनिक गुत्थी से बाहर आकर जन, जमीन से जुड़ कर अपना विकास करे, अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पालक, अभिभावक और विद्यार्थी स्वयं को गिरवी रख कर अपनी उच्च शिक्षा का स्वप्न पूरा करेगा। विचारणीय है कि जिस प्रकार भोजन बनाते समय रसोई में गृहणी की मन:स्थिति का प्रभाव भोजन के स्वाद के साथ भोजन ग्रहण करने वाले के आचार-विचार पर पड़ता है, ठीक वैसे ही कक्षा में जिस मन:स्थिति से शिक्षा परोसी जाती और जिस तनाव भरी मन:स्थिति वह ग्रहण की जाती है, आक्रमता और विरोध उसी से उपजता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

<!–

–>

Uttarakhand News Latest and breaking Hindi News , Uttarakhand weather, Places to visit in Uttarakhand जानने के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें ।
Next Post

खूबसूरत साड़ी अवतार में लोगों का दिल जीत रहीं सलमान खान की 'रज्जो', देखें तस्वीरें

साड़ी भारतीय संस्कृति से जुड़ा एक बेहद खास परिधान है। साड़ी एक ऐसा परिधान है जिसे पहनकर आप एक ही समय में सेंसेशनल और पारंपरिक दोनों लग सकती हैं। किसी भी लड़की के खास दिन के लिए साड़ी पहला पसंद साड़ी होती है। ये बात साबित करती है कि साड़ी […]