किताबें मिलीं: प्रवास में आसपास

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उनके पात्र आसपास की रोजमर्रा की जिंदगी से संबंध रखते हैं और कथानक का ताना-बाना बुनते समय उसे स्वयं जीते हैं। वे निरे अपने लगते हैं और कहानी पढ़ते समय पाठक उनमें अपने आप को देखने लगता है।

प्रवास में आसपास

हंसा दीप के इस संग्रह की सभी कहानियां सहज और सरल भाषा में अपने आप में बहुत कुछ कह जाती हैं। अलग-अलग विषयों को लेकर लिखी गर्इं संग्रह की पंद्रह कहानियों में सामाजिक सरोकारों का दायरा काफी विस्तृत हुआ है। उनके पात्र आसपास की रोजमर्रा की जिंदगी से संबंध रखते हैं और कथानक का ताना-बाना बुनते समय उसे स्वयं जीते हैं। वे निरे अपने लगते हैं और कहानी पढ़ते समय पाठक उनमें अपने आप को देखने लगता है।

‘एक मर्द एक औरत’, ‘वह सुबह कुछ और थी’, ‘मुझसे कह कर तो जाते’, ‘बड़ों की दुनिया में’, ‘फालतू कोना’ आदि कहानियों में जहां व्यक्ति की सामान्य मानसिकता और बदलते सामाजिक रंग दिखाई देते हैं वहीं ‘उसकी औकात’ कहानी हमारे चारों ओर की उठा-पटक, कुर्सी के चारों तरफ मंडराते मौकापरस्त लोगों के दोगलेपन का पर्दाफाश करती है। ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों, सत्ताधारियों और उनके चमचों द्वारा कैसे जाल बिछाए जाते हैं। ऐसे ही चक्रव्यूह में फंसी मिस हैली को उनकी औकात बताने पर उतारू विभागीय अध्यक्ष मि. कार्लोस और उनकी कुर्सी के इर्द-गिर्द घूमते लोगों की कहानी है। कथ्य को सुंदर ढंग से विस्तार देते हुए लेखिका ने विषय पर अपनी पकड़ बनाए रखी है। ‘रुतबा’, ‘मधुमक्खी’ की तरह डंक मारती चापलूस आया हो, ‘अंततोगत्वा’ कहानी के मंदिर का ढोंगी पुजारी हो या फिर रिश्तेदारों की संवेदनहीनता से ‘भिड़ंत’, हंसा दीप के पात्र पाठक को बांधे रखने में सफल हुए हैं।
प्रवास में आसपास : हंसा दीप; शिवना प्रकाशन, पीसी लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर (मप्र); 250 रुपए।

समीक्षा का लोकतंत्र
समकालीन रचनात्मकता की पहचान और मूल्यांकन में समीक्षा की निर्णायक भूमिका होती है, लेकिन हिंदी में इस अनुशासन का ठीक-ठाक विकास नहीं हुआ। जो समीक्षाएं हिंदी में होती हैं, वे अक्सर मेरी-तेरी या इसकी-उसकी सराहना या निंदा में कैद होकर तत्काल दम तोड़ देती हैं। इनका दीर्घकालीन उपयोग नहीं के बराबर होता है। विज्ञान भूषण की समीक्षा केंद्रित यह किताब इस मायने में अलग है कि इसमें अभी-अभी वाली तात्कालिकता नहीं है और आग्रह और प्रयोजन के साथ किसी की निंदा-सराहना भी नहीं है। इसमें संकलित समीक्षाएं सहानुभूतिपूर्वक रचना को उसके पड़ोस से देखती-समझती हैं। खास बात यह है कि यहां रचना का निंदा या सराहना की अतियों में सरलीकरण नहीं है। यहां समीक्षक रचना के सकारात्मक पहलुओं पर अपने को एकाग्र कर और उनको तसल्ली तथा मनोयोग के साथ उजागर करता है। किताब में हमारी समकालीन रचनात्मकता के वैविध्य की बानगियां हैं। इसमें विष्णु प्रभाकर, मृदुला गर्ग, असगर वजाहत, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्पा, सूर्यबाला, काशीनाथ सिंह, नासिरा शर्मा, पल्लव, निशांत, प्रियदर्शन, जितेंद्र श्रीवास्तव, एकांत श्रीवास्तव, प्रेम कुमार और रूपेश कश्यप की किताबों की समीक्षाओं के साथ मुक्तिबोध और स्वयं प्रकाश की रचनात्मकता पर स्वतंत्र आलेख भी हैं। किताब की खासियत यह है कि इसमें पैट्रिक मोदियानो, सुन मी ह्वाग, रस्किन बांड और खुशवंत सिंह की किताबों के हिंदी अनुवादों की भी समीक्षाएं हैं। कृति और कृतिकार को तत्काल समझने-परखने के लिए समीक्षा के अनुशासन के सही और संतुलित उपयोग के कारण यह किताब हिंदी में अलग पहचान और जगह बनाती है।
समीक्षा का लोकतंत्र: विज्ञान भूषण; अमन प्रकाशन, 104-ए/80 सी, रामबाग, कानपुर (उप्र); 375 रुपए।

ऐसा देस है मेरा
प्रस्तुत व्यंग्य पुस्तक के लेखक प्रभात कुमार व्यंग्य के बारे में एक स्पष्ट और सार्थक दृष्टि रखते हैं। वे न केवल हास्य और व्यंग्य के बीच के अंतर को गहराई से समझते-परखते हैं बल्कि व्यंग्य में फूहड़ हास्य की बैसाखी को नकारते हैं। उनका मानना है कि हास्य व्यंग्य से अलग हो चुका है। इसी कारण उन्हें कवि सम्मेलन के लिफाफे ललचाते नहीं हैं। संकलन की रचनाएं पढ़ने पर लगता है कि व्यंग्य के प्रति उनकी जैसी सोच है, वैसा ही लिखने को प्रयत्नशील हैं।

प्रभात बहुत पहले से व्यंग्य लिखते रहे हैं। ‘संतोष उत्सुक’ नाम से इनके कई व्यंग्य कई पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। उन्होंने जीवन के लगभग हर विषय पर कलम चलाई है। सामाजिक अव्यवस्था हो या राजनैतिक विद्रूपता, उन्होंने बारीकी से समस्याओं को व्यंग्य के माध्यम से उठाया है। विवाह समारोह, रिसेप्शन, किट्टी पार्टी, वीआइपी कल्चर, चुनाव तंत्र, हिंदी दिवस जैसे थोथे आयोजन, जुगाड़ तंत्र, साहित्यिक सांस्कृतिक समारोह सब पर तीर-ए-नजर छोड़ा है। इस पुस्तक में चुनींदा व्यंग्यों का संकलन दिया गया है जो इनकी पैनी दृष्टि, उत्तेजक सोच, धारदार शिल्प का परिचायक है। व्यंग्यकार ने अपने आसपास से विषय उठा कर उन्हें व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया है।
ऐसा देस है मेरा : प्रभात कुमार; नीरजा बुक सेंटर, सी-32, आर्यनगर सोसायटी, प्लॉट-91, आईपी एक्सटेंशन, दिल्ली; 350 रुपए।

अश्याम
अक्सर इंसान कुछ यादों को लेकर जीवन में चलता रहता है। इस सफर में कुछ यादें छूट जाती हैं, तो कुछ साथ चले चलती हैं। साथ चलने वाली यादें किसी-न-किसी नए रूप में आपके सामने आती हैं। जीवन के अलग-अलग रास्तों पर कुछ लोग ऐसे मिल जाते हैं, जो अपनी छाप आपके जेहन पर छोड़ जाते हैं और ऐसा ही इस उपन्यास के मुख्यपात्र श्याम के साथ भी होता है जिसके जेहन में असलम खान- नाम से उसके बारे में कोई अंदाजा मत लगाइएगा, वैसे भी नाम सामाजिक परिवेश की दी हुई वह अमानत है जो इंसान को उसकी पहचान देकर धर्मों के दायरों में तकसीम करती है। जबकि सही मायने में आपका व्यक्तित्व ही आपकी असली पहचान बनाता है, जो सदा आपके साथ रहता है।

सपनों की परिभाषा यह है कि वह किसी न किसी से प्रेरित होते हैं और उन्हें देखते रहना, उनका पीछा करते रहकर जीवन में कुछ अच्छा कर पाने व कामयाबी हासिल करना यह सब हर व्यक्ति के लिए जरूरी है। श्याम के लिए गरीब बस्ती में रहते हुए अमीरों के खेल लॉन टेनिस को खेलने की प्रेरणा पाना और फिर उसे अपने सपनों में संजोकर हासिल करना इस कहानी को विशेष बनाता है। अक्सर मंजिल की राह पर जब मुश्किलों का सामना होता है तो इंसान हताश होकर या तो पीछे हट जाता है या फिर अपनी राह बदल लेता है। मगर श्याम ऐसा नहीं करता और हर मुश्किल के बावजूद हिम्मत से आगे बढ़ते हुए अपने मकसद में कामयाब होता चला जाता है। ऐसी बहुत सी घटनाएं और यादें हैं श्याम के जीवन से जुड़ी।
अश्याम : राकेश मढ़ोतरा; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 295 रुपए।

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