बाख़बर: विचारधारा का अंत

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इसके बाद सबके कैमरे मुंबई के शिवाजी मैदान के शपथ समारोह में तैनात हो गए और मंच पर कौन कहां बैठा, कहां न बैठा, इसकी गणना करते रहे। एंकर डीएमके के स्टालिन के आने से चौंके तो मुकेश अंबानी के सपरिवार आने और फडणवीस के आने से भी चौंके!

एनसीपी प्रमुख शरद पवार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो सोर्स: द इंडियन एक्सप्रेस)

सोनिया ने सेक्युलरिज्म समर्पित किया! शिवसेना ने गोडसे और सावरकर को समर्पित किया! भाजपा ने अजित पवार के नौ मामले समर्पित किए! सब सत्ता की खातिर, क्योंकि सत्ता सबसे बड़ी सेक्युलर है! पूरे सप्ताह एक से एक जादुई खबरें! मीडिया पल-पल बर्बाद! अगले पल क्या होगा?किसी को नहीं मालूम! सब चकित! कोई दिल्ली, कोई मुंबई, कोई शरद पवार के घर, तो कोई मातोश्री में! कच्ची-पक्की हजार बाइटें! हजारों गप्पें! कौन सच? कौन झूठ? कौन अर्धसत्य? कौन पूर्ण असत्य? कौन किसे चूना लगा रहा है और कौन है, जो प्रेमपूर्वक लगवाए जा रहा है? किसी को नहीं मालूम! सीन ‘हाइपर-रीयल’ थे : इधर शरद पवार सोनिया से मिलने वाले हैं, कि उधर अहमद पटेल शरद से मिल रहे हैं और उद्धव ठाकरे से मिल कर ‘न्यूनतम साझा कार्यक्रम’ बना रहे हैं, कि एंकर पूछते फिर रहे हैं कि क्या सोनिया और सेना के बीच शरद पवार समझौता करा सकते हैं?

इधर भाजपा प्रवक्ता कहते कि सेना-एनसीपी-कांग्रेस का गठबंधन ‘अपवित्र’ है। जनादेश का अपमान है! हमारे पास बहुमत है। उधर सेना वाले दावा करते कि सीएम शिवसेना का ही बनेगा। जल्द सेना-एनसीपी-कांग्रेस की ‘महा अघाड़ी’ सरकार शपथ लेगी और उद्धव सीएम बनेंगे! इसी रस्साकशी में शरद ने पहला झटका दिया। अजित को एनसीपी के नेता पद से हटाया और भाजपा का खेल खत्म कर दिया। एंकर कहते रहे कि अजित को एनसीपी से निकाला क्यों नहीं?
क्या इस क्वालिटी के ‘ट्रोजन हॉर्स’ को कभी कोई निकालता है?

घटना विकास किसी कॉमिक थ्रिलर की तरह इतना तेज और मजेदार दिखा कि एंकर रिपोर्टर चर्चक तक आनंद लेने लगे। शरद-सोनिया-उद्धव की एक से एक सयानी चालों के आगे वे स्वयं नतमस्तक थे! एक एंकर ने पूछा कि असली चाणक्य कौन? अमित शाह या शरद पवार? और सबने माना कि शरद पवार! शरद पवार! असंभव को संभव करने वाले शरद पवार! शरद के दुश्मन भी मानते रहे कि उनसे अधिक कूट-राजनीतिज्ञ दूसरा नहीं!

एक रोज फिर खबरें तेजी से टूटने लगीं : शिवसेना के एमएलए होटल से अब निकले, कि एनसीपी के एमएलए होटल से अब निकले, कि कांग्रेस के एमएलए होटल से अब निकले। कभी तोड़ा-तोड़ी की अफवाहें गरम होतीं, कभी ठंडी पड़ जातीं कि एनसीपी टूटेगी कि कहीं बीजेपी ही तो न टूट जाएगी! एनसीपी के तीन गायब कि तीस गायब, कि जो गायब थे वे सब शाम तक शरद की शरण में, कि बचा एक वह भी कहां जाएगा और देखा गया कि आखिरी दिन अजित भाई का स्वागत सुप्रिया सुले विधान सौंध में खुशी खुशी कर रही हैं। जिस परिवारवाद को पांच साल से कोसा जा रहा है, उसी ने कथित एंटी परिवारवादियों को धूल चटाई! सब एंकर एक सुर से बोलने लगे कि सुप्रिया सुले ने कमाल किया- कमाल किया, कि शरद ने कठोरता, तो सुप्रिया मृदुता से दिन-रात काम किया, कि ‘ट्रोजन हॉर्स’ समेत सभी एक एक कर वापस आ गए!

एक एंकर ने फरमाया कि अगर शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस तीन दिन में तय कर लेते तो अजित न जाते। दूसरे ने कहा कि अब भी क्या बिगड़ा है? होगा वही जो शरद चाहेंगे!यही हुआ! एंकर समझते रहे कि वे ही देश की राजनीति को चलाते हैं। विशेषज्ञ समझते रहे कि वही हैं जो राजनीति की रग-रग पहचानते हैं और कुछ चैनलों में हमेशा ‘फिक्स’ हरकारे समझते रहे कि वे हर एक को लज्जित कर सकते हैं और कांग्रेस को तो जब चाहे निरुत्तर का सकते हैं, लेकिन अंतत: ऐसे सभी तीरंदाज अपना-सा मुंह लेकर रह गए! अंत में उस एक पोस्टर ने उनको समझाया कि यह है ‘अबकी बार शिवसेना-पवार-सोनिया की सरकार!

जब ‘शिवसेना-पवार-सोनिया की सरकार’ बन चली तो एक एंकर ने लाइन दी कि यह ‘विचारधारा का अंत’ है। सोनिया ने सेक्युलर छोड़ा। शिवसेना ने गोडसे सावरकर छोड़ा। ‘प्राग्मेटिज्म’ की जय! ‘पै्रक्टीकलिटी’ की जय! ‘व्यवहारवाद’ की जय! एक एंकर ने चिंता की कि ‘कामन मिनीमम प्रोगाम’ में ‘सेक्युलर’ तो है, लेकिन ‘गोडसे-सावरकर’ नहीं हैं! क्या शिवेसना ने हिंदुत्व को ही सरेंडर कर दिया है? एक पत्रकार ने मुंडी हिलाई कि हां, फिलहाल ऐसा ही है! भारत की आगामी राजनीति पर इसके दूरगामी असर होने वाले हैं।

इस बीच लोकसभा की बहस में जब डीएमके के सांसद ए. राजा गोडसे के हलफनामे को उद्धृत कर रहे थे तो साध्वी प्रज्ञा ने उनको चीखते हुए टोक दिया कि आप इस तरह से देशभक्तों का नाम नहीं ले सकते। गोडसे प्रज्ञा के लिए ‘देशभक्त’ हो गए! विपक्ष ने शोर किया कि भाजपा गोडसे को लेकर अपनी पोजीशन साफ करे! तब भी संघ/ भाजपा के प्रवक्ता प्रज्ञा के ‘गोडसेवाद’ को डिफेंड करने चैनलों में आ जुटे और गोडसे की विचारधारा पर ‘स्वतंत्र डिबेट’ करने की लाइन देने लगे!

लेकिन लोकसभा में विपक्षी सदस्यों और चैनल चर्चाओं में बढ़ते धिक्कार को देख अगले रोज भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष नड््डा ने प्रज्ञा के ‘गोडसेवाद’ को ‘कंडेम’ किया और भाजपा की संसदीय समिति की मीटिंगों से भी वंचित करके राजनीतिक क्षति की पूर्ति की! इसके बाद सबके कैमरे मुंबई के शिवाजी मैदान के शपथ समारोह में तैनात हो गए और मंच पर कौन कहां बैठा, कहां न बैठा, इसकी गणना करते रहे। एंकर डीएमके के स्टालिन के आने से चौंके तो मुकेश अंबानी के सपरिवार आने और फडणवीस के आने से भी चौंके! उद्धव ने छत्रपति शिवाजी महाराज की मूर्ति के चरण छूकर शपथ ली। बाकी छह मंत्रियों ने भी ऐसा ही किया! इस तरह अपनी राजनीति में ‘विचारधारा का अंत’ हुआ। यह ‘अंत’ डेनियल बेल की 1960 की किताब ‘द एंड आॅफ आइडियोेलोजी’ वाला नहीं है, बल्कि इक्कीसवीं सदी वाला कांगे्रसी ब्रांड का देसी ‘एंड आॅफ आइडियोलोजी’ है!

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