मंदी को रोकेगी खेती

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पिछले तीस सालों के दौरान बार-बार देखा गया है कि कृषि उत्पादन राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास पर काफी हद तक असर डालता और निर्माण के पैमाने और गति को प्रत्यक्ष रूप से निर्धारित करता है। जब भी फसल खराब हुई है, तो उसके तत्काल बाद हल्के और भारी औद्योगिक उत्पादन में भारी कमी आई है।

पारंपरिक क्षेत्रों में चावल की खेती और अधिक बढ़ानी होगी।

निरंकार सिंह

वैश्विक अर्थव्यवस्था की सुस्ती का मुकाबला करने के लिए उद्यमियों ने कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के साथ-साथ इसको आधुनिक बनाने पर जोर दिया। सिंचाई पर भी ध्यान देने की बात कही गई है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कृषि आज भी हमारी अर्थव्यवस्था का मूलाधार है। देश के किसान उसकी आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। इसलिए देश के राजनीतिक और इसके आर्थिक विकास के लिए कृषि की स्थिति हमेशा महत्त्वपूर्ण रही है। यह आधुनिकीकरण के दौरान भी महत्त्वपूर्ण रहेगी। यह सवा अरब लोगों का पेट भरती है। हल्के उद्योग के लिए कच्चे माल की जरूरतों की सत्तर फीसद आपूर्ति, औद्योगिक उत्पादों के लिए बाजार प्रदान और निर्माण के लिए धन जमा करती है। पिछले तीस सालों के दौरान बार-बार देखा गया है कि कृषि उत्पादन राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास पर काफी हद तक असर डालता और निर्माण के पैमाने और गति को प्रत्यक्ष रूप से निर्धारित करता है। जब भी फसल खराब हुई है, तो उसके तत्काल बाद हल्के और भारी औद्योगिक उत्पादन में भारी कमी आई है। उसके बाद जब कृषि की हालत सुधरी, तो औद्योगिक उत्पादन दुबारा बढ़ना शुरू हो गया।

अगर हम कृषि के विकास और आधुनिकीकरण के लिए बड़े पैमाने पर कोशिश नहीं करते हैं, तो समूची अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है और यह नाकाम भी हो सकता है। कृषि के विकास को प्राथमिकता देने का मतलब है कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में सबसे पहले खेती-बारी को प्रमुखता देनी चाहिए और फिर हल्के उद्योग तथा उसके बाद भारी उद्योग पर जोर देना चाहिए। पर आज हमारी खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर है। इसलिए कभी सूखे का तो कभी बाढ़ का संकट पैदा हो जाता है। उधर किसान कभी खाद, तो कभी डीजल के संकट से जूझता रहता है। इसलिए खेती में निवेश बढ़ाने की जरूरत है। इसके साथ-साथ सिंचाई सुविधा भी बढ़ाई जानी चाहिए। हमारा देश आज और आगे भी गेहूं और चावल का प्रमुख उत्पादक और उपभोक्ता बना रहेगा। इसलिए उनके उत्पादन को बढ़ाने के लिए कदम उठाने पड़ेंगे। गेहूं की पैदावार के क्षेत्र को और अधिक व्यापक बनाने के उद्देश्य से पूर्वी उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पूर्व के राज्यों में अधिक मात्रा में गेहूं की पैदावार करनी होगी। संकर चावल की विधि को अपना कर, पारंपरिक क्षेत्रों में चावल का उत्पादन और अधिक बढ़ाना होगा।

मध्य भारत में मोटे अनाज के उत्पादन में वृद्धि करके अन्य उत्पादों की पैदावार को भी बढ़ाना होगा, ताकि वे आंशिक रूप से गेहूं और चावल की जरूरत को कम कर सकें। अनाज की प्रौद्योगिकी को अधिक विकसित करके इस क्षेत्र को इतना अधिक महत्त्वपूर्ण बनाना होगा, ताकि वह लगातार तेजी से बढ़ती हुई मांग के अलावा, निर्यात योग्य मोटा अनाज भी उत्पादित कर सके। मध्य भारत को सब्जियों और फलों का उत्पादन केंद्र बनाया जाए और यह कोशिश भी की जाए कि ये कम कीमत पर लोगों को उपलब्ध हो सकें। इससे गेहंू और चावल की खपत पर भी असर पड़ेगा और ऐसा ही प्रयास, जाड़े के दिनों में बड़े पैमाने पर हिंद-गंगा क्षेत्र में किया जाना चाहिए। आलू टैपियोका (कसावा) और शकरकंदी जैसी गांठदार फसलों को और ज्यादा उगाया जाए और उन्हें कम कीमत मुहैया कराई जाए। इस बात पर ज्यादा जोर देने की जरूरत है।

देश में दालों की कमी है, मगर प्रोटीन की नहीं। अगर हर व्यक्ति पचास ग्राम का औसत भी रखा जाए तो सवा अरब आबादी वाले देश के लोगों को दो सौ बीस लाख टन प्रोटीन की जरूरत होगी। एक सौ दस लाख टन उच्च कोटि की जरूरत दूध, अंडों, मछलियों और मांस आदि से पूरी कर देंगे और ढाई सौ लाख टन अनाजों, दालों, तिलहन, फलों, सब्जियों और अन्य स्रोतों से पूरी हो सकेगी। लेकिन लोगों की खाने की आदतों को ध्यान में रखते हुए, दालों की मांग को उच्च वरीयता देकर पूरा करना पड़ेगा। चूंकि सब्जियों और फलों की खपत भविष्य में बढ़ेगी, इसलिए हर क्षेत्र में कृषि के उपयुक्त जलवायु की आवश्यकताओं और आर्थिक दृष्टि से उचित लाभ को ध्यान में रखते हुए सही विकल्प का चुनाव करना पड़ेगा। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए कोल्ड स्टोरेज और दूर-दूर तक फासला तय करने वाले परिवहन की व्यवस्था भी महत्त्वपूर्ण होगी।

देश के ग्रामीण परिवार, खासकर भूमिहीन और छोटे तथा सीमांत किसान पशुपालन को आय के पूरक स्रोत के रूप में अपनाते हैं। इस व्यवसाय में अर्द्धशहरी, पर्वतीय, जनजातीय और सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सहायक रोजगार मिलता है, जहां केवल फसल की उपज से ही परिवार का गुजर-बसर नहीं हो सकता। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के अनुमान के अनुसार चालू मूल्य पर मछली और पशुपालन क्षेत्र का कुल योगदान वर्ष 2008-09 के दौरान तीन लाख दस हजार आठ सौ इक्यानबे करोड़ रुपए था। उस वर्ष सकल घरेलू उत्पाद में इन क्षेत्रों का योगदान 4.1 प्रतिशत था। विश्व में सबसे अधिक मवेशी भारत में हैं। दुनिया की कुल भैंसों का सत्तावन प्रतिशत और गाय-बैलों का चौदह प्रतिशत भारत में है।

पशुपालन और डेयरी विभाग द्वारा 16 अक्तूबर, 2019 को पशुधन जनगणना की जारी गई रिपोर्ट के अनुसार भारत की पशुधन आबादी 2012 की तुलना में 4.6 प्रतिशत बढ़ कर तिरपन करोड़ सत्तावन लाख अस्सी हजार हो गई है। भारत में बीते पांच सालों में गायों की संख्या अठारह प्रतिशत बढ़ कर 14.51 करोड़ हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार देश में भैंसों की संख्या इस दौरान मात्र एक प्रतिशत बढ़ी है। नवीनतम गणना के मुताबिक बकरियों की संख्या दस फीसद बढ़ कर 14.9 करोड़ हो गई है। सुअर की संख्या बारह फीसद घट कर 90.6 लाख है। रिपोर्ट के अनुसार देश में 2019 में गधों की संख्या इकसठ प्रतिशत घट कर एक लाख बीस हजार रह गई, जबकि ऊंटों की संख्या सैंतीस प्रतिशत घट कर ढाई लाख रह गई है। 2019 में कुक्कुट की संख्या करीब सत्रह प्रतिशत बढ़ कर पचासी करोड़ अठारह लाख दस हजार हो गई है। पिछली गणना की तुलना में इस साल स्वदेशी मादा मवेशियों की संख्या में दस फीसद की वृद्धि हुई है। देश में फिलहाल कुल घोड़े और टट््टू 3.4 लाख हैं, जो पिछली गणना के मुकाबले 45.6 फीसद कम हैं।

देश की लगातार बढ़ती आबादी की (पशुओं से प्राप्त होने वाली) प्रोटीन की आवश्यकताएं पूरा करने में दूध, अंडा और मांस के रूप में खाद्य भंडार में पशुपालन क्षेत्र जबर्दस्त योगदान कर रहा है। देश में फिलहाल प्रोटीन की प्रति व्यक्ति दैनिक उपलब्धता लगभग 11.3 ग्राम है, जबकि इसका विश्व औसत 29 ग्राम है। पर बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए बढ़ते बच्चों और शिशुओं को दूध पिलाने वाली माताओं के पोषण-स्तर को बनाए रखने के लिए देश में प्रोटीन की उपलब्धता में कम से कम दोगुनी बढ़ोतरी होनी चाहिए। राष्ट्र के पुनरुद्धार के लिए सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता पर निर्भर रहना काफी नहीं है। हमें अपनी पूरी सहमति के साथ अर्थव्यवस्था का विकास करना चाहिए। अपने कृषि, पशुपालन उद्योग और राष्ट्रीय प्रतिरक्षा को आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी से लैस करना चाहिए।

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