तीरंदाज: मर्यादा की हदें दोनों तरफ

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जरूरी है कि आचरण की शर्तें दोनों पक्षों पर एक तरह से ही लागू हों। यह सर्वविदित है कि पुरुष प्रवृत्ति आखेट की है। इस प्रवृत्ति को पूर्णतया समाप्त तो फिलहाल नहीं किया जा सकता है, पर क्रमबद्ध तरीके से उस पर अंकुश लगा कर समाप्ति की ओर जरूर हांका जा सकता है।

आचरण की शर्तें दोनों पक्षों पर एक तरह से ही लागू हों।

अश्विनी भटनागर

कुछ समय की शांति के बाद ‘# मीटू’ ने पलटवार कर दिया है और ट्विटरवासी फिर से उद्वेलित हो उठे हैं। लगभग दो साल पहले एक महिला ने अपने यौन उत्पीड़न को लेकर ट्विटर पर अपनी आपबीती साझा की थी और उसके बाद उत्पीड़न की शिकायतों की बाढ़ सोशल मीडिया पर आ गई थी। कई दर्जन महिलाओं ने बड़ी हिम्मतऔर बेबाकी से दुनिया को बताया था कि किस तरह नामी-गिरामी पुरुषों ने अपने पद और वरीयता की धौंस के बल पर उनके साथ आपत्तिजनक आचरण किया था और किस तरह से इन उत्पीड़ित महिलाओं ने उस व्यथा को सहा था।

उस समय पुरुष प्रधान व्यस्था में सार्वजनिक रूप से एतराज करने की हिम्मत नहीं हुई थी, पर जब एक आवाज बुलंद हुई, तो सभी को लगा था कि चुप बैठना ऐसी भीषण स्थिति में विकल्प नहीं हो सकता है। इसके खिलाफ आवाज उठाने में ही सर्वहित है। पीड़ित महिलाओं के ट्विटर और अन्य माध्यमों पर बताई गई आपबीती की वजह से लगभग हर व्यवसाय से जुड़े प्रभावशाली पुरुष सरेआम लज्जित ही नहीं हुए थे, बल्कि कई तो कोर्ट कचहरी की चपेट में भी आ गए थे। कुछ नामचीन पुरुषों ने शिकायत कर्ताओं को दबाने के लिए उन पर मानहानि का मुकदमा भी दायर कर रखा है।

वैसे, यौन उत्पीड़न और उससे थोड़ा आगे यौन शोषण हमारे समाज का बड़ा सच है। यह अभी तक एक झीने से परदे की ओट में था- इसे सब देख रहे थे, पहचान रहे थे, हो सकता है उसके बारे में ‘गॉसिप’ करके भोंडे मजाक भी बनाते थे, पर उसको नजरअंदाज कर रहे थे। हमारा व्यवहार चिरपरिचित पितृसत्तात्मक सामाजिक तंत्र के अनुसार था। कोई शर्मिंदा नहीं था और न ही कोई स्थिति में सुधार लाने के लिए कुछ करना चाहता था। वैसे इस विषम स्थिति के दोषी सिर्फ पुरुष नहीं थे, पर महिलाओं का एक वर्ग भी था, जो अपनी सहेलियों/ बहनों का साथ देने के बजाय उत्पीड़न की व्यवस्था में अपनी सक्रिय हिस्सेदारी निभा रहा था।

कुल मिला कर उत्पीड़न की स्थिति भयावह थी और जब कुछ जांबाज महिलाओं ने अपनी व्यथा साझा की, तो पहले हम हतप्रभ रह गए थे और फिर लगातार दबाव के चलते शोषण कर्ताओं पर गाज गिरने लगी थी। ऐसा लगा था कि पितृसत्तात्मक व्यस्था को बड़ा धक्का लग गया है और सम्यक और न्याय संगत दौर बस अब शुरू होने ही वाला है।

पिछले दिनों ऐसी उम्मीद पर पानी फिरता एक बार फिर लगने लगा जबकि कथित उत्पीड़नकर्ता ने सोशल मीडिया पर शोषित महिला के साथ हुई अपनी बातचीत को सार्वजनिक कर दिया था। इन संदेशों को पढ़ कर एक बार तो सारे ‘# मीटू’ आंदोलन पर शक होने लगा था। उनके द्वारा जारी किए गए मैसेज बेहद ही आत्मीय थे। वे बेहद कामुक भी थे। समझ में नहीं आ रहा था कि जब एक स्त्री और एक पुरुष एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते भी नहीं हैं, तो उन्हें इस प्रकार की बातचीत में उलझने की जरूरत क्या थी। मैसेज के पूरे क्रम में महिला पूरी उत्तेजना से अपनी कामुक भावनाओं का प्रसार कर रही थी। पुरुष उसका अपने हिसाब से उपयोग कर रहा था।

कौन सही है या कौन गलत, या फिर कब और कैसे इन दोनों में मतभेद हुआ या प्रेमालाप यौन प्रताड़ना की हद तक कब पहुंच गया, कहना कठिन है। सारे तथ्य अभी हमारे ेसामने नहीं हैं और शायद कभी सामने आएंगे भी नहीं। पर इस प्रकरण से एक अति महत्त्वपूर्ण सवाल उठा है- खुले डीएम (डायरेक्ट मैसेज) पर बंद कमरों वाली बातें क्यों हो रही थीं? दो लगभग अनजान व्यक्ति अपनी कामुक अभिव्यक्ति को वायरल मीडिया पर बेलगाम क्यों कर रहे थे? वैसे आज की तारीख में मर्यादा की बात करना पुराणपंथी लगता है, पर इस अति-आधुनिक युग में भी क्या भावनात्मक और कामुक आचरण की सीमाएं निर्धारित नहीं होनी चाहिए? शायद यह बात आज के संदर्भ में बेतुकी लगें, पर अगर एक पर कामुक भावावेश शुरू हो जाता है, तो कौन किस हद तक बह जाएगा, इसका पूर्वनिर्धारण क्या संभव है? हां, कंसेंट (सहमति) होना आवश्यक है, पर भावावेश की तरलता पर पत्थर की लकीर कैसे खींची जाएगी? और वह भी ऐसी लकीर, जो सिर्फ एक पक्ष की क्षणिक मर्जी के अनुसार हो? दूसरे शब्दों में, क्या कामावेश से ग्रसित पुरुष अपने को तुरंत सात्विक पुरुष के अवतार में तब्दील कर सकता है? अपेक्षा कुछ ऐसी ही की जा रही है कि मर्द अभी की हां है और अभी की ना जैसी दोनों क्षणभंगुर स्थितियों में अपना संतुलन बनाए रखे। पर क्या ऐसा संतुलन आम व्यक्ति के वश में है?

वैसे क्योंकि यहां मामला आचरण का है, इसलिए यह जरूरी है कि आचरण की शर्तें दोनों पक्षों पर एक तरह से ही लागू हों। यह सर्वविदित है कि पुरुष प्रवृत्ति आखेट की है। इस प्रवृत्ति को पूर्णतया समाप्त तो फिलहाल नहीं किया जा सकता है, पर क्रमबद्ध तरीके से उस पर अंकुश लगा कर समाप्ति की ओर जरूर हांका जा सकता है। ‘# मी टू’ जैसे आंदोलन एक साहसिक कदम हैं, जो इस प्रक्रिया को दिशा देते हैं। उनको किसी भी दशा में पथ भ्रष्ट नहीं होना चाहिए।

पर साथ ही फोन और लैपटॉप पर खुली खिड़कियों के बारे में भी हमें सोचना होगा। ताक-झांक से अगर हमें बचना है या फिर जबरन प्रवेश को हमें रोकना है, तो ऐसा करना होगा कि अगर ये खिड़कियां बंद नहीं हो सकती हैं, तो इन पर निश्चित मर्यादा का पर्दा जरूर पड़ा होना चाहिए। इस संदर्भ में महिलाओं को, ‘# मीटू’ की तरह, एक और पहल करनी होगी और कड़े फैसले करने होंगे। हद तक जाने की आवश्यकता और फिर उस हद से कदम पीछे खींच लेने की जरूरत पर गंभीरता से विचार करना होगा।

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